
भारतीय चुनावी प्रणाली, मतदाता अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ी देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से एक बहुत ही राहत भरी और बेहद महत्वपूर्ण कानूनी खबर सामने आ रही है। देश के कई राज्यों में चल रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी एसआईआर (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद वोटर लिस्ट को हमेशा के लिए ‘फ्रीज’ कर दिया जाता है और नए नाम नहीं जुड़ सकते। इस भ्रम को पूरी तरह दूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण जारी किया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने का मतलब यह कतई नहीं है कि मतदाता सूची फ्रीज हो गई है। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से यदि किसी का नाम गलती से हट गया है, तो वह शख्स चुनाव में नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि तक अपने नाम को दोबारा जुड़वा सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद मतदाताओं को क्या राहत मिलने वाली है और चुनाव आयोग को कोर्ट ने क्या निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण: SIR पूरा होने का मतलब वोटर लिस्ट का फ्रीज होना नहीं
केरल, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया और उससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने यह अहम फैसला सुनाया है। अदालत के इस स्पष्टीकरण से स्पष्ट हो गया है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का उद्देश्य नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करना नहीं, बल्कि सूची को पारदर्शी और त्रुटिमुक्त बनाना है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष विभिन्न पक्षों द्वारा समय-सीमा बढ़ाने की मांग उठाई गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि समय बढ़ाने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भारतीय कानून के तहत मतदाता सूची में नाम जुड़वाने, संशोधन करवाने और नाम हटवाने की प्रशासनिक प्रक्रिया निरंतर रूप से चलती रहती है। अदालत ने भरोसा दिलाया कि किसी भी वैध मतदाता को उसके लोकतांत्रिक अधिकार से महरूम नहीं रहने दिया जाएगा।
नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख तक जोड़े जा सकते हैं नाम
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू ने अदालत को जानकारी दी कि एसआईआर की प्रक्रिया संपन्न होने के बाद भी आम नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आधिकारिक तौर पर आवेदन कर सकते हैं। नियम के मुताबिक, किसी भी चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने (Nomination Filing) की अंतिम तिथि तक मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया वैध रूप से जारी रहती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से किसी तकनीकी या प्रशासनिक भूलवश कट गए थे, उनके पास अभी भी पूरा मौका है कि वे निर्धारित फॉर्म भरकर अपने नाम दोबारा सूची में दर्ज करवा सकें। इस व्यवस्था से देश भर के लाखों ऐसे मतदाताओं को बड़ी राहत मिली है, जो अपने मताधिकार के छिन जाने को लेकर चिंतित थे।
चुनाव आयोग ने स्वीकार की गड़बड़ियां, दोषी अधिकारियों पर होगी सख्त कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर मुद्दा भी सामने आया। निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने खुद अदालत के समक्ष इस बात को स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानीय अधिकारियों द्वारा ‘फॉर्म 7’ (जो नाम हटाने या आपत्ति दर्ज करने के लिए होता है) को स्वीकार करने में भारी प्रशासनिक गड़बड़ियां और लापरवाही बरती गई थी।
चुनाव आयोग के वकीलों ने अदालत को आश्वस्त किया कि इस प्रकार की अनियमितताओं को सुधारने के लिए आयोग ने पहले ही कई सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। आयोग ने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की लापरवाही के कारण पात्र मतदाताओं के नाम सूची से प्रभावित हुए हैं, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह खुली छूट दी है कि वे आयोग के सामने अपनी आपत्तियां और गड़बड़ियों के सुबूत सीधे तौर पर रख सकते हैं।
केरल मामले में सीपीएम की दलील और चुनाव आयोग से मांगा गया विस्तृत हलफनामा
केरल राज्य का हवाला देते हुए वकील जी. प्रकाश के माध्यम से सीपीएम (CPM) ने अदालत में पक्ष रखा कि वहां फरवरी में ही एसआईआर का काम पूरा हो चुका था और उसी पुरानी सूची के आधार पर विधानसभा चुनाव भी संपन्न हुए, लेकिन इसके बावजूद लगभग 24 लाख मतदाता अभी भी मतदाता सूची से बाहर हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सीपीएम से उन सभी प्रभावित मतदाताओं का पूरा विवरण और डेटा उपलब्ध कराने को कहा है, जो समयाभाव या अन्य कारणों के चलते अपने फॉर्म जमा नहीं कर पाए थे, ताकि चुनाव आयोग उन मामलों की व्यक्तिगत रूप से जांच कर सके। इसके अलावा, एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने आरोप लगाया कि केरल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर योग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इन तमाम गंभीर शिकायतों को ध्यान में रखते हुए शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सभी बिंदुओं और नोट पर अपना विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करे, ताकि चुनावी पारदर्शिता को पूरी तरह से सुनिश्चित किया जा सके।
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