मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर का अचानक तेहरान दौरा: क्या ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल होगा ईरान? अमेरिका-ईरान तनाव के बीच मिडिल ईस्ट में मची भारी कूटनीतिक खलबली

पश्चिम एशिया की धधकती सियासत और युद्ध के मुहाने पर खड़े खाड़ी देशों के बीच एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और सैन्य हलचल देखने को मिल रही है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख (चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज) फील्ड मार्शल आसिम मुनीर एक उच्चस्तरीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल के साथ अचानक ईरान की राजधानी तेहरान पहुंच रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इस दौरे की पुष्टि करते हुए इसे क्षेत्रीय सुरक्षा, शांति और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम बताया है।

यह इस वर्ष आसिम मुनीर का तीसरा ईरान दौरा है, लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात के मद्देनजर इस यात्रा को सामान्य से कहीं अधिक संवेदनशील और रणनीतिक माना जा रहा है। एक तरफ जहां अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका है और वाशिंगटन तेहरान पर इतिहास के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोपने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक ‘मक्का रक्षा समझौते’ ने पूरे मुस्लिम जगत के शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। ऐसे नाजुक समय में मुनीर का तेहरान पहुंचना यह साफ संकेत देता है कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ा वैश्विक समझौता आकार ले रहा है।

क्या है ‘मक्का रक्षा समझौता’ जिसने बदल दिया शक्ति संतुलन?

हाल ही में सऊदी अरब के मक्का शहर में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच एक त्रिपक्षीय रक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ नाम दिया गया है। इस समझौते की सबसे खास बात इसका पारस्परिक रक्षा सिद्धांत (Mutual Defense Clause) है, जो पश्चिमी सैन्य गठबंधन ‘नाटो’ के बहुचर्चित ‘अनुच्छेद 5’ (Article 5) की तर्ज पर तैयार किया गया है।

इस क्लॉज के तहत यह तय किया गया है कि यदि तीनों सदस्य देशों में से किसी एक पर भी कोई बाहरी सैन्य या सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा और तीनों देश मिलकर उसका सैन्य जवाब देंगे। इस समझौते में तीनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करना, संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा विनिर्माण और सेना कमांडरों की नियमित संयुक्त बैठकों का प्रावधान किया गया है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह गठबंधन किसी खास देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय संप्रभुता और सुरक्षा कवच को मजबूत करने के लिए बनाया गया है।

क्या ईरान भी बनेगा इस नए गठबंधन का हिस्सा? मिला औपचारिक न्योता

आसिम मुनीर के तेहरान दौरे के बीच सबसे बड़ा सनसनीखेज मोड़ तब आया जब यह रिपोर्ट सामने आई कि ईरान को भी इस नए त्रिपक्षीय सुरक्षा गठबंधन ‘मक्का समझौते’ में औपचारिक रूप से शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। लेबनान के प्रमुख प्रसारक अल-मायदीन और ईरानी संसद की समाचार एजेंसी के प्रमुख मेहदी रहीमी के अनुसार, तेहरान को यह प्रस्ताव मिल चुका है और ईरानी नेतृत्व इस पर गंभीरता से समीक्षा कर रहा है।

ईरान दशकों से इस बात की वकालत करता रहा है कि फारस की खाड़ी और पश्चिम एशिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल क्षेत्रीय देशों के हाथों में होनी चाहिए, न कि बाहरी पश्चिमी ताकतों जैसे अमेरिका के नियंत्रण में। यदि शिया बहुल ईरान इस समझौते का हिस्सा बन जाता है, जिसमें पहले से सुन्नी बहुल महाशक्तियां सऊदी अरब, तुर्की और परमाणु संपन्न पाकिस्तान शामिल हैं, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित ‘इस्लामिक सैन्य ब्लॉक’ बनकर उभरेगा। इससे सऊदी अरब और ईरान के बीच सदियों पुरानी ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता पूरी तरह समाप्त हो सकती है।

अमेरिका-ईरान तनाव, ट्रंप के कड़े प्रतिबंध और होर्मुज की जंग

मुनीर का यह दौरा उस समय हो रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए घोषणा की है कि जो भी देश ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक या कूटनीतिक जीवनरेखा (Lifeline) देगा, उसे भारी प्रतिबंधों और आर्थिक परिणामों का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन ईरान पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने जा रहा है ताकि उसकी तेल अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पंगु बनाया जा सके। इसके जवाब में ईरान ने सख्त चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल निर्यात को रोका गया, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से किसी भी अनाधिकृत तेल टैंकर को गुजरने नहीं देगा।

दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। ट्रंप द्वारा होर्मुज पर अमेरिकी प्रभुत्व जताने के बयानों के बाद ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रेजाई ने दो टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका फारस की खाड़ी में अपने दबदबे के बाद वाले दौर (Post-American Era) में आ चुका है। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि अमेरिका ईरान को वेनेजुएला की तरह तबाह करना चाहता था, लेकिन ईरानी जनता की एकता और प्रतिरोध ने इस षड्यंत्र को नाकाम कर दिया।

यमन के हूती विद्रोही और लाल सागर में शिपिंग सुरक्षा का मुद्दा

पाकिस्तानी सेना प्रमुख की बातचीत के एजेंडे में यमन के हूती विद्रोहियों का मुद्दा भी शीर्ष पर रहेगा। तेहरान समर्थित हूती लड़ाकों द्वारा लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों पर किए जा रहे लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री व्यापार को बुरी तरह बाधित कर दिया है।

सऊदी अरब और तुर्की दोनों चाहते हैं कि हूती हमलों पर लगाम लगाई जाए ताकि क्षेत्रीय समुद्री व्यापार को सुरक्षित किया जा सके। पाकिस्तान इस मामले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के प्रशासन से यह आश्वासन लेने की कोशिश कर रहा है कि मक्का समझौते के तहत समुद्री मार्गों की सुरक्षा की गारंटी दी जाए और हूती हमलों को सीमित किया जाए।

मिस्र और बांग्लादेश की संभावित एंट्री: तेजी से बढ़ रहा गठबंधन का दायरा

मक्का समझौते का प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहने वाला है। तुर्की और सऊदी अरब ने इस गठबंधन के दरवाजे अन्य मित्र देशों के लिए भी खुले रखे हैं। अफ्रीकी महाद्वीप की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक मिस्र (Egypt) का नाम इस गठबंधन के अगले संभावित सदस्य के रूप में तेजी से उभर रहा है।

इसके अलावा, दक्षिण एशिया से बांग्लादेश ने भी इस समझौते में शामिल होने को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने आधिकारिक बयान में कहा कि ढाका ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ और संतुलित विदेश नीति पर काम कर रहा है तथा अपने राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर इस तरह के रक्षा समझौतों पर विचार कर सकता है। यदि मिस्र और बांग्लादेश भी इस गठबंधन का हिस्सा बनते हैं, तो यह गठबंधन एशिया से लेकर अफ्रीका और यूरोप के मुहाने तक फैल जाएगा।

पाकिस्तान की दोहरी कूटनीति: मध्यस्थ की भूमिका या बड़ा भू-राजनीतिक जोखिम?

पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में एक बेहद जोखिम भरा लेकिन चतुर खेल खेल रहा है। एक ओर इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच टूटे हुए अंतरिम शांति समझौते को बहाल करने के लिए मुख्य ‘मध्यस्थ’ (Mediator) के रूप में काम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर एक नया समानांतर सुरक्षा ब्लॉक खड़ा कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आसिम मुनीर को वाशिंगटन से भी एक सीमित हरी झंडी (Green Light) मिली हुई है ताकि वे तेहरान के साथ संचार का चैनल खुला रख सकें और सीधे युद्ध की स्थिति को टाल सकें। हालांकि, यदि ट्रंप प्रशासन अपने नए कड़े प्रतिबंध लागू करता है, तो पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ रक्षा और ऊर्जा समझौते आगे बढ़ाना और एक ही समय पर अमेरिका व ईरान दोनों को साधे रखना आसान नहीं होगा।

आने वाले 48 घंटे मध्य पूर्व के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं। तेहरान की बंद कमरों की बैठकों में यह तय होगा कि ईरान पश्चिमी दबाव के खिलाफ एक नया ‘इस्लामिक सैन्य गठबंधन’ चुनता है या फिर यह क्षेत्र एक और बड़े और विनाशकारी टकराव की आग में झोंक दिया जाएगा।

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