
भारतीय रेलवे ने पटरियों की मजबूती और रेल यात्रा को पूरी तरह सुरक्षित बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी तकनीकी कदम उठाया है। अब तक पटरियों की ऊपरी सतह और जोड़ों की जांच अल्ट्रासोनिक डिवाइसेज और ट्रैक पेट्रोलिंग के जरिए की जाती रही है, लेकिन अक्सर पटरियों के नीचे बिछी गिट्टियों (बैलास्ट) और मिट्टी की अंदरूनी परतों में दबी दरारें व खोखलापन नंगी आंखों से दिखाई नहीं देता। इसी अदृश्य खतरे को जड़ से खत्म करने के लिए रेलवे अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (RDSO) और रेलवे बोर्ड ने अत्याधुनिक ‘ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार’ (Ground Penetrating Radar – GPR) प्रणाली को बड़े पैमाने पर लागू करने की रूपरेखा तैयार की है। यह हाई-फ्रीक्वेंसी रडार सिस्टम एक तरह से रेलवे ट्रैक का ‘एक्स-रे’ कर जमीन के भीतर कई मीटर गहराई तक दबे हर एक फॉल्ट का डिजिटल मैप तैयार कर देता है।
ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक: जानिए कैसे पटरियों के नीचे ‘एक्स-रे’ की तरह झांकेगा यह सिस्टम
ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार एक उन्नत भू-भौतिकीय (Geophysical) नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग तकनीक है। यह प्रणाली विद्युत-चुंबकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) के सिद्धांत पर काम करती है। जब किसी विशेष निरीक्षण वाहन या ट्रैक रिकॉर्डिंग कार पर लगे जीपीआर एंटेना से उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगें जमीन के नीचे भेजी जाती हैं, तो वे मिट्टी, गिट्टी, कंक्रीट स्लीपर और उप-परतों (Subgrade) से टकराकर वापस लौटती हैं।
विभिन्न पदार्थों की विद्युत चालकता (Dielectric Permittivity) अलग-अलग होती है। जब तरंगे किसी खोखले स्थान (Cavity), पानी के रिसाव, अत्यधिक नमी, टूटी हुई गिट्टी या ढीली मिट्टी से टकराती हैं, तो उनके परावर्तन के समय और तीव्रता में बदलाव दर्ज होता है। सिस्टम का कंप्यूटर इन सिग्नलों को डिकोड कर स्क्रीन पर पटरियों के आंतरिक ढांचे की स्पष्ट 2D और 3D क्रॉस-सेक्शनल इमेज बना देता है। इसके चलते रेलवे इंजीनियरों को बिना पटरियों को हटाए या गिट्टी की खुदाई किए ठीक-ठीक पता चल जाता है कि ट्रैक के नीचे किस स्थान पर और कितनी गहराई पर संरचनात्मक कमजोरी मौजूद है।
ट्रेनों की तेज रफ्तार और डिरेलमेंट रोकने में क्यों गेमचेंजर साबित होगी यह तकनीक
भारतीय रेलवे के नेटवर्क पर वंदे भारत एक्सप्रेस, गतिमान और राजधानी जैसी सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों के साथ-साथ भारी मालगाड़ियों का संचालन तेजी से बढ़ रहा है। 130 से 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाली ट्रेनों के लिए ट्रैक की निचली परत यानी फॉर्मेशन का पूरी तरह मजबूत होना अनिवार्य है। यदि गिट्टियों के नीचे की मिट्टी कमजोर हो या बारिश के कारण जलभराव से कीचड़ ऊपर आने लगे (मड पंपिंग), तो भारी दबाव पड़ने पर ट्रैक में अप्रत्याशित ढलान या धंसाव आ सकता है, जो ट्रेन के बेपटरी (Derailment) होने का सबसे बड़ा कारण बनता है।
जीपीआर प्रणाली के उपयोग से ऐसी सभी संभावित दुर्घटनाओं को समय रहते टाला जा सकता है। यह रडार निम्नलिखित मुख्य समस्याओं की पहचान पहले ही कर लेता है:
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बैलास्ट क्लीनीनेस इंडेक्स (गिट्टियों की सफाई): समय के साथ पटरियों के नीचे की गिट्टियां टूटकर चूरा बन जाती हैं, जिससे ट्रैक की लचीलापन सोखने की क्षमता खत्म होने लगती है। जीपीआर तुरंत बता देता है कि किस हिस्से में गिट्टी की गहरी सफाई (Deep Screening) की जरूरत है।
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अदृश्य कैविटी और खोखलापन: बारिश के पानी से मिट्टी बह जाने के कारण बने खोखलेपन की सटीक लोकेशन और गहराई को उजागर करना।
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अंडरग्राउंड ड्रेनेज व सीलन की स्थिति: ट्रैक के नीचे पानी जमा होने की स्थिति का पहले से पता लगाना ताकि मानसून में ट्रैक धंसने का खतरा न रहे।
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सबग्रेड लेयर की मोटाई और मजबूती: पटरियों को सहारा देने वाली मूल जमीन की लोड-बेयरिंग क्षमता का लगातार वैज्ञानिक मूल्यांकन करना।
पारंपरिक मैनुअल जांच से कई गुना आगे: जीपीआर इंस्पेक्शन कार से रियल-टाइम 3D डेटा मैपिंग
अब तक रेलवे में गैंगमैन और ट्रैक मैन पैदल चलकर चाबियों, गेज स्केल्स और पोर्टेबल अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्टर (USFD) से पटरियों की ऊपरी सतह व फ्रैक्चर की जांच करते रहे हैं। हालांकि यह प्रक्रिया पटरियों के स्टील की जांच के लिए उपयोगी है, लेकिन पटरियों के नीचे दबे फाउंडेशन की जांच करने में यह पूरी तरह असमर्थ थी।
रेलवे द्वारा अपनाई जा रही जीपीआर आधारित स्वचालित निरीक्षण कारें 100 से 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते हुए भी निरंतर डेटा रिकॉर्ड कर सकती हैं। यह कार जीपीएस (GPS) जियो-टैगिंग के साथ हर एक मीटर के ट्रैक का डेटा सीधे केंद्रीय सर्वर को भेजती है। जहां भी मानकों से विचलन या कोई खतरनाक विसंगति पाई जाती है, वहां सिस्टम तुरंत अलार्म जनरेट करता है। इससे ट्रैक रखरखाव टीमों को बिना किसी अनुमान के सीधे उसी सटीक लोकेशन पर पहुंचकर तुरंत मरम्मत कार्य (Targeted Maintenance) करने की सुविधा मिलती है।
भविष्य की रेल सुरक्षा: एआई आधारित एनालिसिस और प्री-एम्प्टिव मेंटेनेंस का नया दौर
भारतीय रेलवे अब रिएक्टिव मेंटेनेंस (हादसे या खराबी के बाद सुधार) की जगह प्रिडिक्टिव और प्री-एम्प्टिव मेंटेनेंस (खराबी पैदा होने से पहले ही निवारण) की कार्यशैली पर आगे बढ़ रहा है। जीपीआर से प्राप्त विशाल डेटा का विश्लेषण करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग किया जा रहा है।
एआई पावर्ड सॉफ्टवेयर पिछले वर्षों के डेटा से तुलना कर यह अनुमान लगा सकता है कि अगले 6 महीनों में ट्रैक का कौन सा हिस्सा कमजोर हो सकता है। इससे ट्रैक मेंटेनेंस मशीनों (बीसीएम, टैंपिंग मशीन आदि) को आवश्यकता के अनुसार पहले से तैनात किया जा सकता है। रेलवे ने नई दिल्ली-हावड़ा, नई दिल्ली-मुंबई, गोल्डन क्वाड्रिलेटरल और ईस्टर्न-वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) जैसे अत्यधिक व्यस्त और संवेदनशील रूट्स पर इस तकनीक के नियमित उपयोग की योजना को उच्च प्राथमिकता दी है।
चलती ट्रेनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का यह समावेश भारतीय रेलवे को वैश्विक मानकों वाले आधुनिक और सुरक्षित रेल नेटवर्क की श्रेणी में मजबूती से स्थापित करता है।
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