
हर साल मानसून का मौसम आते ही नेपाल की खूबसूरत वादियां चीख-पुकार और मलबे के ढेर में तब्दील हो जाती हैं। काठमांडू की बागमती नदी का उफान हो या फिर सिंधुपालचोक और तराई के इलाकों में मची तबाही, सवाल एक ही उठता है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को समेटे यह देश बार-बार पानी में क्यों डूब जाता है? पहली नजर में यह केवल अत्यधिक बारिश का नतीजा लगता है, लेकिन जमीन की गहराई और आसमान की बदलती गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि नेपाल की त्रासदी के पीछे भूगर्भीय बनावट, जलवायु परिवर्तन और इंसानी भूलों का एक घातक चक्रव्यूह काम कर रहा है।
हिमालय की युवा बनावट और टेक्टोनिक प्लेटों की निरंतर हलचल
नेपाल जिस भूभाग पर स्थित है, वह दुनिया की सबसे नई और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यूरेशियन प्लेट और भारतीय टेक्टोनिक प्लेट के आपस में टकराने से बने हिमालय की ऊंचाई आज भी बढ़ रही है। इस निरंतर दबाव के कारण यहां की चट्टानें अत्यधिक कमजोर, भुरभुरी और गतिशील हैं। जब भी मूसलाधार बारिश होती है, तो पानी इन कच्ची चट्टानों और मिट्टी के अंदर रिसकर दबाव बनाता है, जिससे पहाड़ों के बड़े-बड़े हिस्से ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। यह भूस्खलन नदियों के प्राकृतिक बहाव को रोककर अस्थायी कृत्रिम झीलें बना देता है, और जब इन झीलों की दीवारें टूटती हैं, तो निचले इलाकों में अचानक जलप्रलय (फ्लैश फ्लड) आ जाता है।
बादलों का फटना और माइक्रो-क्लाइमेट का बदलता मिजाज
नेपाल की भौगोलिक संरचना बेहद जटिल है। दक्षिण के मैदानी तराई इलाकों से लेकर उत्तर के ऊंचे बर्फीले शिखरों तक की ऊंचाई कुछ ही किलोमीटर के दायरे में तेजी से बदलती है। जब बंगाल की खाड़ी से उठने वाली मानसूनी हवाएं इन ऊंची पहाड़ियों से टकराती हैं, तो ‘ओरोग्राफिक लिफ्ट’ के कारण अत्यधिक घने बादल बनते हैं। पिछले कुछ दशकों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते बादलों के फटने (क्लाउडबर्स्ट) की घटनाओं में भारी इजाफा हुआ है। कुछ ही घंटों में सैकड़ों मिलीमीटर बारिश होने से संकरी पहाड़ी नदियां प्रचंड वेग से उफनती हैं और अपने रास्ते में आने वाले गांवों, पुलों और सड़कों को बहा ले जाती हैं।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): पहाड़ों के ऊपर छिपा हुआ टाइम बम
नेपाल के ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में हजारों हिमनद (ग्लेशियर) मौजूद हैं। तेजी से बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ये ग्लेशियर पिघल रहे हैं और इनके मुहाने पर विशाल बर्फीली झीलें बन रही हैं। इन झीलों के किनारे किसी पक्की चट्टान के नहीं, बल्कि बर्फ और मलबे (मोरेन) के कमजोर बांध होते हैं। जब अत्यधिक पानी या भूकंप के झटके से ये मोरेन टूटते हैं, तो अरबों लीटर पानी और लाखों टन मलबा एक साथ नीचे की तरफ दौड़ता है। इसे ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ यानी GLOF कहा जाता है। यह पानी रास्ते में आने वाली हर नदी के जलस्तर को अचानक कई मीटर तक बढ़ा देता है, जिससे संभलने का मौका तक नहीं मिलता।
अनियंत्रित विकास, अवैज्ञानिक सड़कें और नदियों पर अतिक्रमण
प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानव जनित गलतियों ने इस संकट को कई गुना विकराल बना दिया है। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में बिना किसी भूगर्भीय सर्वे के अंधाधुंध सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है। भारी बुलडोजरों और विस्फोटकों के इस्तेमाल से पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानें कमजोर हो चुकी हैं। इसके अलावा, काठमांडू घाटी समेत प्रमुख शहरों में नदियों के बाढ़ क्षेत्रों (फ्लडप्लेन) पर अवैध बस्तियां और कंक्रीट के ढांचे खड़े कर दिए गए हैं। जब पानी को बहने के लिए उसका स्वाभाविक रास्ता नहीं मिलता, तो वह रिहायशी कॉलोनियों में घुसकर तबाही मचाता है। पारंपरिक जल निकासी प्रणालियों का नष्ट होना भी शहरी बाढ़ का एक प्रमुख कारण बन चुका है।
ट्रांस-बाउंड्री असर: भारत के मैदानी इलाकों पर सीधा प्रभाव
नेपाल का यह जल संकट केवल उसकी सीमा तक सीमित नहीं रहता। नेपाल से निकलने वाली कोसी, गंडक, बागमती, कर्णाली (घाघरा) और महाकाली (शारदा) जैसी प्रमुख नदियां सीधे भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती हैं। जब नेपाल के पहाड़ों में भीषण भूस्खलन और जलप्रलय होता है, तो उसका सीधा असर भारतीय सीमावर्ती जिलों पर पड़ता है। कोसी नदी, जिसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है, नेपाल के ऊपरी जलक्षेत्र से आने वाले लाखों क्यूसेक पानी और भारी गाद (सिल्ट) के कारण बार-बार अपना रास्ता बदलती है और दोनों देशों के लाखों लोगों को विस्थापित करती है।
स्थायी समाधान: केवल राहत नहीं, वैज्ञानिक रणनीति की जरूरत
इस वार्षिक त्रासदी को रोकने के लिए आपातकालीन राहत कार्यों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक नीतिगत कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, हिमालयी क्षेत्र में किसी भी बुनियादी ढांचा परियोजना को शुरू करने से पहले विस्तृत भू-तकनीकी (Geotechnical) अध्ययन अनिवार्य किया जाना चाहिए। अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) को AI और उपग्रह तकनीक से जोड़कर रियल-टाइम डेटा हासिल करना होगा, ताकि बादल फटने या GLOF की स्थिति में लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। इसके साथ ही, भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन, सिल्ट नियंत्रण और आपदा समन्वय को लेकर एक मजबूत संयुक्त कार्ययोजना की दरकार है। जब तक प्रकृति के नियमों का सम्मान करते हुए सतत विकास का मॉडल नहीं अपनाया जाएगा, तब तक हिमालय की यह खिसकती जमीन और उफनती नदियां हर साल विनाश की नई दास्तां लिखती रहेंगी।
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