‘संसद से बेहतर तो विधानसभा है, काश मैं MLA होता!’ FCRA और परिसीमन पर पी. चिदंबरम का मोदी सरकार पर तीखा हमला; बोले- हंसी का पात्र बन गया है लोकतंत्र का मंदिर

देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद की मौजूदा कार्यप्रणाली, विधेयकों को पारित कराने के तौर-तरीकों और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर विपक्ष की आवाज दबाए जाने के आरोपों के बीच पूर्व केंद्रीय गृह एवं वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार पर अब तक का सबसे बड़ा और तीखा हमला बोला है। चेन्नई में आयोजित कांग्रेस पार्टी की एक अहम बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ राज्यसभा सांसद चिदंबरम ने संसद की स्थिति पर गहरा अफसोस जताया और तंज कसते हुए कहा कि आज संसद दिन-ब-दिन मजाक और हंसी का पात्र बनती जा रही है। इस दौरान उन्होंने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, परिसीमन की प्रक्रिया और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सरकार की नीतियों को लोकतंत्र तथा संविधान के संघीय ढांचे के लिए गंभीर खतरा बताया।

‘संसद से बेहतर तो विधानसभा है’: चिदंबरम के बयान से सियासी हलचल

चेन्नई के मंच से अपने संसदीय और विधायी अनुभवों को साझा करते हुए पी. चिदंबरम ने राज्य विधानसभाओं और देश की संसद के कामकाज की सीधी तुलना की। उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा में होने वाली बहसों और चर्चाओं की गुणवत्ता की खुलकर सराहना की। चिदंबरम ने कहा कि राज्य विधानसभाओं में जनता से जुड़े मुद्दों पर संसद की तुलना में कहीं अधिक गंभीर, सार्थक और असरदार बहसें देखने को मिलती हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “तमिलनाडु विधानसभा की स्वस्थ कार्यवाही और वहां की बहसों को देखने के बाद, कभी-कभी मेरे मन में ख्याल आता है कि मुझे संसद में सांसद (MP) होने के बजाय राज्य विधानसभा में एक विधायक (MLA) होना चाहिए था।” उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि क्या वास्तव में भारतीय संसद में रचनात्मक बहसों और नीतिगत विमर्श का दायरा लगातार सिकुड़ता जा रहा है।

बिना बहस 12 बिल पास, स्थगन प्रस्तावों का सूखा: ‘मजाक बन चुकी है संसद’

हाल ही में संपन्न हुए संसद के मानसून सत्र का हवाला देते हुए चिदंबरम ने आरोप लगाया कि सत्र के दौरान कोई सार्थक और जनहितैषी कामकाज नहीं हो पाया। उन्होंने केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया गया और लगातार सदनों को स्थगित किया जाता रहा।

चिदंबरम ने सवाल उठाया कि पिछले 12 वर्षों में संसद में किसी भी अहम और गंभीर राष्ट्रीय संकट पर स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) को चर्चा के लिए स्वीकार क्यों नहीं किया गया। उन्होंने पूछा कि क्या पिछले एक दशक में देश के भीतर कोई ऐसा गंभीर मामला नहीं हुआ जिस पर तात्कालिक चर्चा की जरूरत थी? उन्होंने राजधानी दिल्ली में छात्रों के हालिया विरोध-प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई, जिसमें एक प्रदर्शनकारी छात्र की आंख की रोशनी तक चली गई, उस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर भी संसद में स्थगन प्रस्ताव के जरिए कोई चर्चा नहीं होने दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना किसी विस्तृत और गहन चर्चा के 12 महत्वपूर्ण विधेयकों को ध्वनिमत से पास करा लिया, जिससे संसद केवल एक रबर स्टैंप और मजाक बनकर रह गई है।

FCRA संशोधन बिल पर कड़ा प्रहार: ‘अल्पसंख्यक संगठनों को कुचलने की साजिश’

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधनों पर चिदंबरम ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया। उन्होंने इसे देश के सबसे दमनकारी और खराब कानूनों में से एक करार दिया। चिदंबरम ने दावा किया कि इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ईसाई और मुस्लिम धर्मार्थ संगठनों, ट्रस्टों और एनजीओ को निशाना बनाना है।

अपने गृह क्षेत्र शिवगंगा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां एक कैथोलिक बिशप द्वारा संचालित अनाथालय और स्कूल का एफसीआरए पंजीकरण तीन साल पहले रद्द कर दिया गया था। चिदंबरम ने कहा कि हजारों ईसाई बिशप, पादरी और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दशकों से भारतीय समाज और गरीबों की निस्वार्थ सेवा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नया कानून ऐसे जनसेवी संगठनों की संपत्तियों और फंड को जब्त करने तथा उन्हें आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए लाया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि सरकार इस बिल को जेपीसी (JPC) में लटकाने के बजाय तुरंत पूरी तरह से वापस ले।

परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों के लिए रेड अलर्ट: प्रतिनिधित्व घटने का खतरा

चिदंबरम ने अपने संबोधन में परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे को देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ा और संवेदनशील संकट करार दिया। उन्होंने आगाह किया कि यदि 2026 के बाद जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण किया गया, तो दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—का संसद में राजनीतिक प्रतिनिधित्व भारी मात्रा में घट जाएगा।

उन्होंने तर्क दिया कि जिन दक्षिणी राज्यों ने देश के विकास में योगदान देते हुए परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ लागू किया, उन्हें इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सजा नहीं दी जा सकती। चिदंबरम ने चेतावनी दी कि यदि केवल आबादी को आधार बनाया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों की सीटें अप्रत्याशित रूप से बढ़ेंगी जबकि दक्षिण की आवाज राष्ट्रीय नीति-निर्माण से हाशिए पर धकेल दी जाएगी। उन्होंने मौजूदा 543 लोकसभा सीटों की संरचना को ही बरकरार रखने की वकालत की और इसे एक खतरनाक प्रस्ताव बताया।

‘एक देश, एक चुनाव’ संघीय ढांचे पर सीधा हमला

केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़ाए जा रहे ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक राष्ट्र, एक चुनाव) के विजन पर भी चिदंबरम ने कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह विचार भारतीय संविधान की मूल आत्मा और संघीय ढांचे (Federal Structure) के बिल्कुल विपरीत है। चिदंबरम के अनुसार, भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में राज्यों की अपनी क्षेत्रीय समस्याएं, प्राथमिकताएं और स्थानीय राजनीतिक मुद्दे होते हैं। पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था न केवल देश की मौजूदा चुनावी प्रणाली को ध्वस्त कर देगी, बल्कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को कुचलकर एकात्मक शासन व्यवस्था थोपने का प्रयास करेगी।

विपक्ष की एकजुटता का आह्वान: ‘उत्तर और दक्षिण को एक साथ आना होगा’

परिसीमन और संघीय अधिकारों पर हो रहे हमलों का मुकाबला करने के लिए पी. चिदंबरम ने एक बड़ा रणनीतिक फॉर्मूला पेश किया। उन्होंने कहा कि इस खतरे को रोकने के लिए केवल दक्षिण भारत का विरोध काफी नहीं होगा। उन्होंने अपील की कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना के सभी क्षेत्रीय दलों को उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर एक मजबूत साझा मोर्चा बनाना चाहिए। चिदंबरम ने दावा किया कि यदि दक्षिण के दल और हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों के क्षेत्रीय दल एकजुट हो जाएं, तो केंद्र सरकार इस एकतरफा परिसीमन प्रस्ताव और जनविरोधी कानूनों को लागू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी।

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