नेपाल में कैसे आई विनाशकारी जलप्रलय? 5.2 तीव्रता के लैंडस्लाइड झटके से लेकर 13 हाइड्रोपावर तबाह होने तक, समझिए रसुवा त्रासदी का पूरा सच

नेपाल और तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा जिले में 26 अगस्त का दिन हिमालय के इतिहास के सबसे काले दिनों में दर्ज हो गया है। बिना किसी भारी बारिश की चेतावनी के, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटी में अचानक उठे मलबे और पानी के विशाल सैलाब ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। इस प्रलयंकारी फ्लैश फ्लड में अब तक 163 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1000 से ज्यादा लोग लापता हैं। सीमावर्ती बुनियादी ढांचे के साथ-साथ देश की ऊर्जा रीढ़ माने जाने वाले 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुके हैं। जब आसमान साफ था और बारिश का कोई बड़ा अलर्ट नहीं था, तब यह जलप्रलय आखिर कैसे आई? वैज्ञानिकों, सैटेलाइट डेटा और भूगर्भीय जांच के आधार पर इस आपदा की पूरी घटनाक्रम परत-दर-परत सामने आ चुकी है।

सुबह का सन्नाटा और बिना बारिश के नदी का अचानक उफान

26 अगस्त की सुबह रसुवा के इलाके में सब कुछ सामान्य था। स्थानीय मौसम में मूसलाधार बारिश का कोई संकेत नहीं था। लेकिन सुबह करीब 9:00 बजे भोटेकोशी नदी का शांत जल अचानक गहरे काले रंग के कीचड़, विशाल पत्थरों, पेड़ों और बर्फ के खौफनाक सैलाब में बदलने लगा। पानी का बहाव इतना तेज था कि नदी किनारे बसे गांवों और बस्तियों के लोगों को भागने तक का मौका नहीं मिला। तिमुरे और रसुवागढ़ी बॉर्डर पोस्ट जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्र देखते ही देखते मलबे की मोटी चादर के नीचे दब गए।

पहला चरण: भूकंप नहीं, पहाड़ ढहने से पैदा हुआ 5.2 तीव्रता का झटका

इस आपदा की शुरुआत सुबह 8:37 बजे हुई। नेपाल-चीन सीमा पर काठमांडू के उत्तरी हिस्से में एक बहुत तेज झटका महसूस किया गया। शुरुआत में यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के सिस्मोग्राफ ने इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया। हालांकि, विस्तृत जांच के बाद USGS और सिस्मोलॉजिस्ट्स ने स्पष्ट किया कि यह कोई प्राकृतिक टेक्टोनिक भूकंप नहीं था, बल्कि अत्यधिक ऊंचाई वाले ग्लेशियर से चट्टान और बर्फ का एक विशालकाय हिस्सा ढहने से पैदा हुआ कंपन था। पहाड़ के इस भारी हिस्से के गिरने से जमीन में इतनी तीव्र ऊर्जा पैदा हुई, जो रिक्टर पैमाने पर 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी।

दूसरा चरण: ल्हेंदे खोला में 20 किलोमीटर ऊपर बनी कृत्रिम झील

पहाड़ से टूटा यह विशाल भूभाग सीधे ल्हेंदे खोला (Lhende Khola) नदी में जा गिरा। ल्हेंदे खोला चीन के तिब्बत क्षेत्र से निकलकर नेपाल की संकरी घाटियों में प्रवेश करती है और भोटेकोशी की मुख्य सहायक नदी है। सैटेलाइट इमेजरी के अनुसार, नदी के बहाव से करीब 20 किलोमीटर ऊपर लाखों टन मलबे, बोल्डर और बर्फ ने नदी के संकरे रास्ते को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया। कुछ ही मिनटों के भीतर इस प्राकृतिक मलबे ने एक विशाल कृत्रिम बांध (Landslide Dam) का रूप ले लिया, जिसके पीछे भारी मात्रा में पानी तेजी से जमा होने लगा।

तीसरा चरण: जब फटा मलबे का बांध और शुरू हुआ ‘डिब्रिस फ्लो’

मलबे और मिट्टी से बना यह अस्थायी बांध पानी के अत्यधिक हाइड्रोस्टैटिक दबाव को ज्यादा देर नहीं झेल सका। पानी का स्तर बढ़ते ही यह कमजोर अवरोध अचानक फट गया। बांध टूटते ही करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी अपने साथ लाखों टन गाद, विशाल चट्टानें और बर्फ लेकर संकरी घाटी में नीचे की ओर दौड़ पड़ा। यह केवल पानी की बाढ़ नहीं थी, बल्कि इसे भूविज्ञान में ‘हाइपर-कंसंट्रेटेड डिब्रिस फ्लो’ कहा जाता है, जिसका घनत्व और विनाशकारी क्षमता सामान्य बाढ़ से कई गुना अधिक होती है।

चौथा चरण: संकरी घाटियों का फनल प्रभाव और 30 मिनट में 9 मीटर जलस्तर

हिमालय की भौगोलिक बनावट बेहद खड़ी ढलानों और ‘V’ आकार की संकरी घाटियों से बनी है। जब ल्हेंदे खोला से यह सैलाब भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी में दाखिल हुआ, तो तंग रास्तों ने पानी के वेग को रॉकेट की गति दे दी। पानी को फैलने की जगह नहीं मिली, जिससे जलस्तर में अकल्पनीय तेजी दर्ज की गई। रिपोर्टों के अनुसार, निचले इलाके गलछी में मात्र 30 मिनट के भीतर नदी का जलस्तर 9 मीटर (लगभग 30 फीट) तक ऊपर चढ़ गया। इस रौद्र रूप ने रास्ते में आने वाले मजबूत आरसीसी पुलों, सड़कों और बहुमंजिला इमारतों को तिनके की तरह बहा दिया।

13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तबाह और व्यापक मानवीय संकट

इस आपदा ने नेपाल के ऊर्जा और आर्थिक ढांचे को बहुत गहरी चोट पहुंचाई है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी बेसिन पर स्थित 13 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह जलमग्न या क्षतिग्रस्त हो गई हैं। टरबाइन, पावर हाउस और डैम साइट्स में भारी गाद भर जाने से करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है। मानवीय त्रासदी भी बेहद गंभीर है, जिसमें सीमा पार व्यापार में लगे 300 से अधिक भारतीय नागरिकों के भी लापता होने की सूचना है। भारत सरकार ने तुरंत बचाव और राहत कार्यों के लिए एनडीआरएफ और आवश्यक सामग्री भेजने की पहल शुरू कर दी है।

क्या खतरा पूरी तरह टल गया है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस जलप्रलय के बाद भी खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिल रहे हैं कि ल्हेंदे खोला और भोटेकोशी के ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र में अभी भी ढीला मलबा और अस्थिर चट्टानें मौजूद हैं। यदि ऊपर के क्षेत्रों में पानी का दोबारा भराव होता है या द्वितीयक भूस्खलन होता है, तो एक और फ्लैश फ्लड की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी खतरे को देखते हुए नेपाल और चीन की भूगर्भीय एजेंसियां रियल-टाइम डेटा, सेटेलाइट सर्विलांस और सिस्मिक सेंसरों के जरिए 24 घंटे स्थिति की निगरानी कर रही हैं।

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