
आज जिस अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने के लिए मुंबई के ‘जलसा’ के बाहर हजारों फैंस घंटों खड़े रहते हैं और जिनकी भारी-भरकम बैरीटोन आवाज और अदाकारी का लोहा पूरी दुनिया मानती है, उनका फिल्मी सफर फूलों का सेज नहीं बल्कि कांटों से भरा रहा है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमिताभ बच्चन का नाम सफलता का पर्याय बन चुका है, लेकिन 70 के दशक की शुरुआत में हालात इसके बिल्कुल उलट थे। करियर के शुरुआती दौर में जब वे सेट पर नए-नए थे, तब उन्हें एक वरिष्ठ निर्देशक और तकनीशियन के सामने भारी अपमान और तीखी डांट का सामना करना पड़ा था। सेट पर मौजूद दर्जनों क्रू मेंबर्स के सामने उन्हें दो टूक शब्दों में कह दिया गया था, “तुम्हें कुछ नहीं आता, न चलना आता है, न संवाद बोलना आता है… तुम अभिनेता बनने क्यों आ गए?” भरे सेट पर कहे गए इन शब्दों ने उस युवा कलाकार के आत्मसम्मान को भीतर तक झकझोर कर रख दिया था।
‘तुम्हें न बोलना आता है, न चलना…’ जब डगमगा गया था आत्मविश्वास
फिल्म की शूटिंग के दौरान एक गंभीर दृश्य को फिल्माते वक्त अमिताभ बच्चन बार-बार रीटेक ले रहे थे। लंबे कद, दुबले-पतले शरीर और अलग तरह के हाव-भाव के कारण उस समय के स्थापित फिल्ममेकर्स को लगता था कि वे पारंपरिक बॉलीवुड हीरो के सांचे में बिल्कुल फिट नहीं बैठते। जब कई प्रयासों के बाद भी शॉट निर्देशक की उम्मीद के मुताबिक नहीं हो सका, तो निर्देशक का पारा चढ़ गया। उन्होंने पूरे यूनिट के सामने बिग बी को जमकर फटकार लगाई और उनके अभिनय व चलने के अंदाज का मजाक उड़ाया।
उस दौर में अमिताभ बच्चन अपनी जेब में चंद रुपये और आंखों में ढेर सारे सपने लेकर कोलकाता की नौकरी छोड़कर मुंबई की सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में सेट पर मिली इस सार्वजनिक बेइज्जती ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया था। वे शूटिंग खत्म होने के बाद देर रात तक अपनी पुरानी सेकंड-हैंड गाड़ी में बैठकर अपनी किस्मत और अपने फैसलों पर आंसू बहाते रहे थे। उस वक्त उन्हें ऐसा लगा था कि शायद उनका मुंबई आने का फैसला ही गलत था।
आकाशवाणी से रिजेक्शन और लगातार 12 फ्लॉप फिल्मों का दर्द
अमिताभ बच्चन के करियर का शुरुआती ग्राफ इतनी असफलताओं से भरा था कि कोई भी सामान्य इंसान पूरी तरह टूटकर मैदान छोड़ देता। ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) में जब वे न्यूज रीडर बनने का ऑडिशन देने गए थे, तो उनकी उस जादुई आवाज को ‘अत्यधिक भारी और अनफिट’ बताकर रिजेक्ट कर दिया गया था, जिसे आज दुनिया की सबसे प्रभावशाली आवाज माना जाता है।
साल 1969 में ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से डेब्यू करने के बाद अमिताभ बच्चन ने लगातार करीब 12 फ्लॉप और औसत फिल्में दीं। ‘परवाना’, ‘रेशमा और शेरा’, ‘संजोग’, ‘बंसी बिरजू’ और ‘प्यार की कहानी’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक औंधे मुंह गिरीं। इंडस्ट्री के ट्रेड एनालिस्ट्स और निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें ‘अनसक्सेसफुल न्यूकमर’ और ‘अपशगुनी हीरो’ का टैग दे दिया था। कई बड़े निर्माताओं ने तो उनके साथ साइन की गई फिल्मों के एग्रीमेंट तक रद्द कर दिए थे और कई अभिनेत्रियां उनके साथ काम करने से साफ इनकार कर देती थीं।
आलोचनाओं और कड़वे तानों को बनाया अपनी सबसे बड़ी ताकत
सेट पर मिली उस कड़वी डांट और लगातार मिले रिजेक्शन ने अमिताभ बच्चन को तोड़ा जरूर, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति को खत्म नहीं कर सका। उन्होंने उस अपमान को दिल में दबाकर चुपचाप अपनी कमियों पर काम करना शुरू किया। उन्होंने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि पारंपरिक रोमांटिक हीरोज—जैसे देव आनंद, राजेश खन्ना या शम्मी कपूर—की नकल करने से उन्हें पहचान नहीं मिलेगी।
अमिताभ बच्चन ने अपने लंबे कद, गहरी आवाज और आंखों की तीव्रता को अपनी कमजोरी के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील करने का फैसला किया। वे घंटों शीशे के सामने खड़े होकर डायलॉग डिलीवरी, वॉयस मॉड्यूलेशन, बॉडी लैंग्वेज और आंखों से अभिनय करने का कड़ा अभ्यास करते थे। उन्होंने सेट पर हर डांट को एक सीख के रूप में स्वीकार किया और यह ठान लिया कि जब भी उन्हें एक सही मौका मिलेगा, वे अपने आलोचकों को अपने काम से जवाब देंगे।
‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’: जब उभरा भारतीय सिनेमा का एंग्री यंग मैन
साल 1973 भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने फिल्म ‘जंजीर’ की कहानी लिखी थी। उस दौर के बड़े सुपरस्टार्स—देव आनंद, धर्मेंद्र और राजकुमार—ने इस स्क्रिप्ट को ठुकरा दिया था क्योंकि फिल्म में कोई पारंपरिक रोमांस या गाने नहीं थे, बल्कि केवल एक ईमानदार और गुस्से से भरा पुलिस अफसर ‘विजय’ था। प्राण और सलीम-जावेद के कहने पर निर्देशक प्रकाश मेहरा ने यह रोल अमिताभ बच्चन को सौंपा।
‘जंजीर’ में जब अमिताभ बच्चन ने अपनी गहरी आवाज में वह ऐतिहासिक डायलॉग बोला—”जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं”—तो पूरा सिनेमाघर सीटियों और तालियों से गूंज उठा। फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और रातों-रात भारतीय सिनेमा को उसका नया मसीहा ‘एंग्री यंग मैन’ मिल गया। इसके बाद ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’, ‘डॉन’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी ऐतिहासिक फिल्मों ने अमिताभ बच्चन को सफलता के उस शिखर पर पहुंचा दिया जहां पहले कभी कोई नहीं पहुंचा था।
80 पार की उम्र में भी काम के प्रति वही समर्पण और बालसुलभ विनम्रता
आज 80 वर्ष की आयु पार कर चुके अमिताभ बच्चन पांच दशकों से अधिक समय से भारतीय और वैश्विक सिनेमा पर राज कर रहे हैं। पद्म विभूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार और अनगिनत राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित होने के बावजूद, बिग बी आज भी खुद को एक अदना सा छात्र मानते हैं। वे आज भी सेट पर किसी भी शॉट से पहले नर्वस होते हैं, रिहर्सल करते हैं और निर्देशकों से पूछते हैं कि क्या उनका शॉट सही था।
अमिताभ बच्चन ने कई इंटरव्यूज में इस बात का जिक्र किया है कि शुरुआती दिनों में मिली वह तीखी डांट और रिजेक्शन उनके जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे। यदि उन्हें वह डांट न पड़ती और सब कुछ आसानी से मिल जाता, तो शायद वे कभी अपने भीतर के उस अभिनेता को तराश नहीं पाते जिसने दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज किया।
संघर्षशील युवाओं और कलाकारों के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा
अमिताभ बच्चन का यह सफर केवल एक फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि जीवन में कभी हार न मानने का सबसे बड़ा सबक है। दुनिया जब आपके सपनों पर हंसे, आपकी क्षमताओं पर सवाल उठाए और कहे कि ‘तुम्हें कुछ नहीं आता’, तो उसका जवाब बहस या गुस्से से नहीं, बल्कि अपनी खामोश मेहनत और बेजोड़ सफलता से दिया जाना चाहिए। अमिताभ बच्चन का जीवन यह साबित करता है कि रिजेक्शन आपकी मंजिल का अंत नहीं, बल्कि आपकी महानता की शुरुआत की पहली सीढ़ी होता है।
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