यूपी में भी ‘आधी आबादी’ दिलाएगी सत्ता की चाबी? विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा में महिलाओं को साधने की मची होड़; फ्री स्कूटी

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के सियासी समर में अब तक जातिगत गोलबंदी, क्षेत्रीय प्रभाव और गठबंधनों का अंकगणित ही चुनावी जीत का मुख्य पैमाना माना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में अन्य राज्यों के चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक नए और सबसे शक्तिशाली ‘साइलेंट वोट बैंक’ को जन्म दिया है—और वह है ‘आधी आबादी’ यानी महिला मतदाता। उत्तर प्रदेश के अद्यतन मतदाता आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल 13.40 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से लगभग 6.09 करोड़ महिला मतदाता हैं। मतदाताओं में महिलाओं की यह 45.46 प्रतिशत हिस्सेदारी केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि मतदान केंद्रों पर उनकी भागीदारी पुरुषों से भी अधिक रही है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां 59.56 प्रतिशत पुरुषों ने वोट डाला था, वहीं महिलाओं का मतदान प्रतिशत 62.24 प्रतिशत रहा था। इससे पहले 2017 में भी 63.38 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया था। मतदान के इस ऊंचे रुझान ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) दोनों के थिंक टैंक को यह साफ समझा दिया है कि 2027 में लखनऊ की गद्दी का रास्ता किसी एक जाति के सहारे नहीं, बल्कि प्रदेश की माताओं, बहनों और बेटियों के भरोसे ही तय होगा।

भाजपा का ‘सुरक्षा और स्वावलंबन’ मॉडल: फ्री स्कूटी से लेकर ₹50 हजार की आर्थिक मदद की तैयारी

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने के लिए ‘लाभार्थी वर्ग’ और ‘महिला सुरक्षा’ को अपना सबसे मजबूत किला बनाया है। योगी सरकार ने अपने बजट में महिला कल्याण विभाग का बजट 11 प्रतिशत बढ़ाकर ₹18,620 करोड़ कर दिया है। सरकार ने कई लोकलुभावन योजनाओं को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है:

  • मेधावी छात्राओं को फ्री स्कूटी: ‘रानी लक्ष्मी बाई योजना’ के तहत स्नातक की पढ़ाई कर रही 50 हजार मेधावी छात्राओं को अक्टूबर-नवंबर में मुफ्त स्कूटी वितरित की जाएगी।

  • मुफ्त बस यात्रा और रक्षाबंधन सौगात: 60 वर्ष से अधिक उम्र की वरिष्ठ महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा और त्योहारों पर सभी महिलाओं को निशुल्क सफर का लाभ दिया जा रहा है।

  • ₹50 हजार की प्रस्तावित आर्थिक सहायता: सूत्रों के अनुसार, योगी सरकार मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के ‘लाडली बहना’ मॉडल की तर्ज पर बीपीएल, एससी, एसटी और कमजोर वर्ग की महिलाओं को स्वरोजगार और आर्थिक संबल देने के लिए ₹50 हजार की वित्तीय सहायता देने के प्रस्ताव पर मंथन कर रही है, जिसकी पहली किस्त ₹20 हजार चुनाव से पहले दी जा सकती है।

  • लखपति दीदी और कन्या सुमंगला: राज्य में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 1.06 करोड़ से अधिक महिलाओं में से 1 करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं कन्या सुमंगला योजना से लगभग 27 लाख बेटियों को शिक्षा और जन्म से लेकर स्नातक तक वित्तीय संबल प्रदान किया जा रहा है।

  • कानून-व्यवस्था का भरोसा: भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी नैरेटिव ‘मिशन शक्ति’ और बेहतर कानून-व्यवस्था है। पार्टी का दावा है कि एंटी-रोमियो स्क्वॉड और कड़े पुलिसिंग से प्रदेश में महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बना है, जो उनका सबसे बड़ा संबल है।

सपा का ‘स्त्री सम्मान समृद्धि’ पलटवार: ₹40 हजार सालाना, छात्राओं को लैपटॉप और 33% आरक्षण

लोकसभा चुनाव में ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से बड़ी बढ़त हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी अब यह भली-भांति समझ चुकी है कि बिना महिला वोट बैंक के विधानसभा चुनाव में बहुमत पाना संभव नहीं है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और मैनपुरी सांसद डिंपल यादव ने अपनी महिला विंग के साथ मोर्चा संभालते हुए चुनावी वादों का एक विशाल पिटारा खोल दिया है:

  • स्त्री सम्मान समृद्धि योजना (₹40,000 सालाना): अखिलेश यादव ने घोषणा की है कि सपा सरकार बनने पर गरीबी रेखा से नीचे (BPL) रहने वाले परिवारों की महिलाओं को सालाना ₹40 हजार की सीधी आर्थिक सहायता दी जाएगी, जिसकी राशि हर साल बढ़ाई जाएगी।

  • छात्राओं को मुफ्त लैपटॉप और साइकिल: इंटरमीडिएट (12वीं) पास करने वाली सभी मेधावी छात्राओं को फ्री लैपटॉप दिए जाएंगे और पुरानी समाजवादी परंपरा के अनुसार छात्राओं को साइकिल वितरण फिर शुरू किया जाएगा।

  • निशुल्क परिवहन और शिक्षा सुविधा: स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाने वाली बेटियों के लिए सरकारी बस और मेट्रो यात्रा पूरी तरह मुफ्त होगी। साथ ही बुजुर्ग महिला के साथ यात्रा करने वाले अटेंडेंट को आधा टिकट देना होगा।

  • 26 हजार बंद स्कूल खुलवाना: ग्रामीण क्षेत्रों में बंद पड़े 26,000 प्राथमिक स्कूलों को दोबारा शुरू कर आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाया जाएगा।

  • 33% महिला आरक्षण का दांव: सपा प्रमुख ने भाजपा पर केवल ‘नारी’ का नारा लगाने का आरोप लगाते हुए मांग की है कि केंद्र सरकार द्वारा पारित 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही तत्काल लागू किया जाए।

मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र तक का ‘लाडली’ फॉर्मूला: क्या यूपी में भी कैश ट्रांसफर बनेगा जीत की गारंटी?

भारतीय राजनीति के हालिया चुनावी इतिहास का विश्लेषण करें तो यह साफ दिखाई देता है कि ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) और महिलाओं के खातों में सीधे मासिक नकदी भेजने की योजनाओं ने चुनाव के नतीजे पलटने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है:

  • मध्य प्रदेश: विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई ‘लाडली बहना योजना’ (वर्तमान में ₹1250 से ₹1500 प्रतिमाह) ने सत्ता विरोधी लहर को पूरी तरह खत्म कर भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया।

  • महाराष्ट्र: ‘मुख्यमंत्री माझी लाड़की बहिन योजना’ के तहत महिलाओं के खातों में हर महीने ₹1500 की राशि भेजी जा रही है।

  • हरियाणा: ‘दीनदयाल लाडो लक्ष्मी योजना’ के तहत ₹2100 प्रति माह देने की पहल की गई।

  • पश्चिम बंगाल और दिल्ली: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना और दिल्ली में महिलाओं को ₹2500 की मासिक सहायता ने महिला मतदाताओं का एक अभेद्य किला तैयार किया।

यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में भी दोनों प्रमुख दल यह मान रहे हैं कि राशन, पक्के मकान और गैस सिलेंडर जैसी बुनियादी योजनाओं से एक कदम आगे बढ़कर अब महिलाओं के हाथ में ‘तरल नकदी’ (Liquid Cash) पहुंचाना सीधे तौर पर भावनात्मक और आर्थिक जुड़ाव स्थापित करता है।

जातिगत दीवारों को तोड़ता महिला ‘साइलेंट वोटर’: पीडीए बनाम डबल इंजन की टक्कर

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से जटिल सामाजिक समीकरणों में बंटी रही है। किसी जाटव, मुस्लिम, यादव, ब्राह्मण, ठाकुर या गैर-यादव ओबीसी परिवार की राजनीतिक प्राथमिकताएं पारंपरिक रूप से भिन्न हो सकती हैं। लेकिन महंगाई, रसोई का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और सुरक्षा ऐसे साझा मुद्दे हैं जो जातिगत सीमाओं को लांघकर हर महिला को सीधे प्रभावित करते हैं।

भाजपा जहां अपने डबल इंजन सरकार के विकास, अपराध-मुक्त वातावरण और केंद्र-राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी नेटवर्क के दम पर महिलाओं के इस गैर-जातिगत वोट बैंक को अपने साथ एकजुट रखने की कोशिश में है, वहीं समाजवादी पार्टी ‘पीडीए’ के सामाजिक न्याय के साथ-साथ ₹40 हजार की बड़ी नकद सहायता और मुफ्त शिक्षा के वादों से इस अभेद्य किले में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।

निष्कर्ष: 6 करोड़ महिलाओं का भरोसा ही तय करेगा 2027 का जनादेश

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही समय के लिहाज से आगे हों, लेकिन रक्षाबंधन के पर्व से शुरू हुई घोषणाओं की इस झड़ी ने यह साबित कर दिया है कि चुनावी बिसात बिछ चुकी है। आज की महिला मतदाता केवल किसी के कहने पर वोट डालने वाली ‘अप्रत्यक्ष’ मतदाता नहीं रह गई है; वह अपने परिवार की आर्थिक खुशहाली, बच्चों के सुरक्षित भविष्य और अपने व्यक्तिगत आत्मसम्मान के आधार पर स्वयं निर्णय लेने की पूरी क्षमता रखती है। घोषणाओं और वादों की इस होड़ में जीत उसी की होगी, जिसके दावों और वादों पर प्रदेश की आधी आबादी को सबसे ज्यादा यकीन होगा। यह तय है कि 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी उसी दल के हाथ लगेगी, जो प्रदेश की 6 करोड़ से अधिक महिलाओं के दिल और विश्वास का ताला खोलने में सफल होगा।

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