राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नई दिल्ली स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘विश्व मांगल्य सभा’ के दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम में युवाओं की बदलती सोच और परंपराओं पर विचार रखे। ‘समकालीन मातृत्व’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि आज की नई पीढ़ी बिना सोचे-समझे केवल आदेशों का पालन नहीं करती, बल्कि हर बात के पीछे का विज्ञान और तर्क (Logic) जानना चाहती है। इसलिए समाज और अभिभावकों को बच्चों के साथ खुलकर संवाद स्थापित करना होगा।
‘स्कूली किताबों में शामिल हो देवी-देवताओं का विवरण’
अक्सर बच्चों और खासकर विदेशों में रहने वाले युवाओं की जिज्ञासाओं का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि बच्चे कई बार जटिल सवाल पूछते हैं, जैसे किसी देवता का चेहरा बंदर या हाथी का क्यों है? माता-पिता के पास इन सवालों का सही जवाब न होने के कारण बच्चे भ्रमित हो जाते हैं।
भागवत ने जोर देकर कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदू देवी-देवताओं और भारतीय मान्यताओं का प्रामाणिक संदर्भ शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों की जिज्ञासाओं को सही और तार्किक उत्तर मिल सके। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सिर्फ किताबों के भरोसे बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है; इसके लिए माता-पिता को खुद भी अपना ज्ञान बढ़ाना होगा।
‘अंग्रेजों ने हमारी सोच बदली, मातृत्व ही समाज का आधार’
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने हमारी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक विरासत को कमजोर करने का प्रयास किया। उन्होंने हमारे मन में यह बैठाने की कोशिश की कि भारतीय अध्यात्म पिछड़ा है, जिसे अब बदलने का समय आ गया है।
मातृत्व पर बोलते हुए उन्होंने इसे सृष्टि के निर्माण और पोषण का मुख्य आधार बताया। उन्होंने कहा कि मां बच्चे की पहली गुरु होती है और बच्चे उपदेशों से ज्यादा अपने माता-पिता के आचरण को देखकर सीखते हैं। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी, राजस्थान की उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी, सांसद कंगना रनौत, बांसुरी स्वराज और स्वाति मालीवाल समेत कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया