NEET PG: कट-ऑफ घटाने के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, NBEMS से 2 हफ्ते में मांगी रिपोर्ट; अंतरिम राहत से इनकार

देश भर के मेडिकल कॉलेजों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली नीट पीजी परीक्षा के क्वालिफाइंग कट-ऑफ को घटाए जाने के फैसले पर कानूनी विवाद गहरा गया है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) को कड़ा निर्देश देते हुए दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कट-ऑफ को असामान्य रूप से निम्न स्तर तक घटाने के निर्णय के पीछे के तर्कों और आधार को स्पष्ट करना अनिवार्य है। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं को कोई तत्काल अंतरिम राहत देने या चल रही प्रवेश प्रक्रिया व काउंसलिंग पर स्टे लगाने से फिलहाल साफ इनकार कर दिया है। अदालत के इस रुख के बाद अब सभी की निगाहें एनबीईएमएस द्वारा दाखिल की जाने वाली आगामी रिपोर्ट और अगली सुनवाई पर टिक गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दायर विभिन्न याचिकाओं में एनबीईएमएस और स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा क्वालिफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल को अत्यधिक कम किए जाने के फैसले को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि मेडिकल पीजी स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों का चयन होता है, जो भविष्य में गंभीर बीमारियों का इलाज और सर्जरी करते हैं। ऐसे में केवल खाली सीटों को भरने के नाम पर कट-ऑफ अंकों को घटाकर न्यूनतम स्तर या नकारात्मक अंकों तक ले जाना स्वास्थ्य क्षेत्र की गुणवत्ता और जनहित के साथ खिलवाड़ है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) का हवाला देते हुए मांग की गई थी कि न्यूनतम योग्यता मानकों को बरकरार रखा जाए और प्रक्रिया के बीच में नियमों में बदलाव न किया जाए।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग भी उठाई गई कि जब तक शीर्ष अदालत इस विवाद का अंतिम निपटारा नहीं कर देती, तब तक संशोधित कट-ऑफ के आधार पर हो रही काउंसलिंग और सीट आवंटन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई जाए। इस पर पीठ ने हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि प्रक्रिया के इस चरण में अंतरिम रोक लगाने से लाखों छात्रों के शैक्षणिक सत्र में देरी होगी और व्यापक प्रशासनिक भ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पहले एनबीईएमएस की आधिकारिक रिपोर्ट का परीक्षण करेगी और देखेगी कि किन परिस्थितियों और डेटा के आधार पर कट-ऑफ में यह बदलाव किया गया।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार और एनबीईएमएस का यह रुख रहा है कि मेडिकल पीजी की सुपर स्पेशियलिटी और क्लिनिकल व नॉन-क्लिनिकल सीटों का खाली रह जाना देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा नुकसान है। उनका तर्क है कि पर्सेंटाइल को नीचे लाने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मेडिकल कॉलेजों में महंगी और आवश्यक सीटें बेकार न जाएं। साथ ही, सरकार का यह भी कहना है कि कट-ऑफ घटाने के बावजूद अंतिम सीट आवंटन पूरी तरह उम्मीदवारों की मेरिट, रैंक और उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर ही किया जाता है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2 सप्ताह की समयसीमा तय किए जाने के बाद अब एनबीईएमएस को यह साबित करना होगा कि यह फैसला मेडिकल शिक्षा की विश्वसनीयता और गुणवत्ता को प्रभावित किए बिना लिया गया है या नहीं।

उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार और दक्षिण भारत के तमाम मेडिकल कॉलेजों और रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठनों (FORDA, FAIMA आदि) के बीच इस फैसले को लेकर तीखी बहस जारी है। विशेषज्ञ डॉक्टरों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि यदि कट-ऑफ का स्तर बहुत नीचे गिराया जाता है, तो इससे मेडिकल प्रोफेशन की साख को बट्टा लगता है। वहीं निजी मेडिकल कॉलेजों और सीट आवंटन की प्रतीक्षा कर रहे कई अभ्यर्थियों का मानना है कि अतिरिक्त मौकों से छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। सुप्रीम कोर्ट में दो हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई इस मामले में न केवल मौजूदा सत्र के छात्रों का भविष्य तय करेगी, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए मेडिकल पीजी प्रवेश के न्यूनतम योग्यता मानकों पर एक नजीर भी स्थापित करेगी।

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