संजय राउत का विवादित पोस्ट: अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट फूंके जाने का वीडियो शेयर कर बोले- ‘भारत को भी सबक लेना चाहिए’

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत के एक नए सोशल मीडिया पोस्ट ने देश के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में भारी घमासान छेड़ दिया है। संजय राउत ने यूरोपीय देश अल्बानिया में भड़की हिंसक अशांति और वहां के सुप्रीम कोर्ट की इमारत को आग के हवाले किए जाने का एक वीडियो अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया है। इस वीडियो को पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि अल्बानिया में भ्रष्ट प्रधानमंत्री का समर्थन करने पर जनता ने सुप्रीम कोर्ट को आग के हवाले कर दिया, और भारत को भी इससे सबक लेना चाहिए। उनके इस बयान के सामने आते ही सियासी हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इसे सीधे तौर पर भारतीय न्यायपालिका और शीर्ष अदालत पर अनुचित टिप्पणी करार दिया जा रहा है।

राउत द्वारा साझा किया गया वीडियो अल्बानिया की राजधानी तिराना का बताया जा रहा है, जहां विपक्षी दलों और आम जनता ने मौजूदा सरकार के कथित भ्रष्टाचार, चुनावी धांधली और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया था। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि देश की शीर्ष अदालत और संवैधानिक संस्थाएं प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल की मनमानियों को संरक्षण दे रही हैं। इसी आक्रोश के चलते भीड़ ने कोर्ट की इमारत को निशाना बनाया और तोड़फोड़ करते हुए वहां आगजनी कर दी। इस विदेशी घटना का हवाला देकर संजय राउत ने भारत के संदर्भ में बयान दिया, जिसे लेकर अब उनकी मंशा पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वीडियो क्लिप पोस्ट करते हुए अल्बानिया के राजनीतिक हालात का सीधा संबंध भारत की वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने अपने संदेश में यह संकेत देने की कोशिश की कि यदि संवैधानिक संस्थाएं और न्यायपालिका जनता की अपेक्षाओं, निष्पक्षता और संविधान के मूल सिद्धांतों के बजाय सत्ता के पक्ष में झुकती नजर आएंगी, तो जनआक्रोश किसी भी देश में विस्फोटक रूप ले सकता है।

उन्होंने लिखा कि जब अदालतें निष्पक्षता छोड़कर भ्रष्ट हुकूमत की ढाल बन जाती हैं, तब जनता सड़कों पर उतर आती है और उसका गुस्सा इसी तरह फूटता है। राउत ने इस घटनाक्रम को भारत के लिए एक कड़ा संदेश बताते हुए कहा कि देश को इससे सीख लेनी चाहिए। हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक विदेशी देश की अराजक और हिंसक भीड़तंत्र की घटना को भारत से जोड़ने को लेकर कई विश्लेषकों ने इसे बेहद गैर-जिम्मेदाराना और सीमा से बाहर का बयान करार दिया है।

यह पहला मौका नहीं है जब संजय राउत ने शीर्ष अदालत या न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हों। हाल ही में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका से जुड़े मामलों को लेकर भी वे अदालत की कार्यशैली पर सार्वजनिक टिप्पणियां कर चुके हैं। उनके बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और कानूनी संगठनों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी और शीर्ष अदालत की अवमानना से जुड़े नोटिस तक की बात सामने आई थी।

हालांकि, कुछ दिन पहले ही विवाद बढ़ने पर राउत ने सफाई देते हुए कहा था कि वे देश की सर्वोच्च अदालत और मुख्य न्यायाधीश का पूरा सम्मान करते हैं और उनकी मंशा अदालत का अपमान करने की नहीं थी। लेकिन अब अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट फूंके जाने का वीभत्स वीडियो साझा कर भारत को नसीहत देने के बाद यह विवाद एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है।

संजय राउत के इस पोस्ट के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने उन पर चौतरफा हमला बोल दिया है। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि संजय राउत का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक संस्थाओं, लोकतंत्र और देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को सीधी धमकी देने जैसा है।

नेताओं ने आरोप लगाया कि विपक्ष जब भी लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हारता है या अदालत से उसके मन मुताबिक फैसले नहीं आते, तो वह संस्थाओं की साख गिराने और देश में अराजकता व हिंसा को उकसाने वाले बयान देने लगता है। सत्ता पक्ष ने सवाल उठाया कि क्या एक सांसद के रूप में संजय राउत भारत में भी अल्बानिया जैसी हिंसक आगजनी और अराजकता का समर्थन कर रहे हैं? कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस तरह के बयानों से न्यायपालिका की गरिमा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस मामले में अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संजय राउत के इस कदम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि लोकतांत्रिक राजनीति में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है। भारत जैसे परिपक्व और विशाल लोकतंत्र में न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता हमेशा से संविधान की सबसे मजबूत रीढ़ रही है। ऐसे में किसी विदेशी देश में कानून और व्यवस्था के चरमराने तथा हिंसक भीड़ द्वारा अदालतों को आग के हवाले करने जैसी आपराधिक घटनाओं को नजीर बनाकर पेश करना किसी भी दृष्टि से स्वस्थ राजनीति का परिचायक नहीं माना जा सकता। फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ चुका है और आने वाले दिनों में कानूनी मंचों पर भी इसकी गूंज सुनाई देने की पूरी संभावना है।

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