नई दिल्ली/लखनऊ। इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र महीने ‘रमजान’ (Ramadan 2026) का इंतजार दुनियाभर के मुसलमानों को बेसब्री से रहता है। यह इबादत, सब्र और रूहानी सुकून का महीना है। साल 2026 में रमजान का चांद कब दिखेगा और पहला रोजा कब रखा जाएगा, इसे लेकर तैयारियां और चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लखनऊ की ऐतिहासिक टीले वाली मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैय्यद फ़ज़लुल्ल मन्नान रहमानी ने रमजान की संभावित तारीखों और इसके धार्मिक महत्व को लेकर अहम जानकारी साझा की है।
कब रखा जाएगा साल 2026 का पहला रोजा?
इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) के अनुसार, रमजान नौवां महीना होता है। मौलाना रहमानी के मुताबिक, रमजान की शुरुआत चांद दिखने पर निर्भर करती है। यदि शाबान महीने की 29 या 30 तारीख को चांद नजर आता है, तो उसके अगले दिन से रोजे शुरू होते हैं। खगोलीय गणनाओं और कैलेंडर के अनुसार, इस साल 19 फरवरी 2026 को पहला रोजा रखे जाने की प्रबल संभावना है।
ईद-उल-फितर (मीठी ईद) की संभावित तारीख
रमजान के 29 या 30 रोजों के बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईद-उल-फितर मनाई जाती है। शाही इमाम के अनुसार, यदि रमजान का महीना 30 दिनों का होता है, तो भारत में 20 मार्च या 21 मार्च 2026 को ईद मनाई जा सकती है। ईद का त्योहार भाईचारे और अल्लाह का शुक्रिया अदा करने का दिन होता है।
सहरी और इफ्तार: इबादत का सही तरीका
रमजान के दौरान दो वक्त सबसे महत्वपूर्ण होते हैं— सहरी और इफ्तार।
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सहरी (Sehri): फज्र की अजान (सूर्योदय) से पहले किए जाने वाले भोजन को सहरी कहते हैं। इसे ‘बरकत’ वाला माना गया है, क्योंकि यही भोजन रोजेदार को दिन भर ऊर्जा देता है।
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इफ्तार (Iftar): सूर्यास्त के समय मगरिब की अजान होने पर रोजा खोला जाता है, जिसे इफ्तार कहते हैं। सुन्नत के अनुसार, खजूर या पानी से रोजा खोलना सबसे बेहतर माना जाता है।
शबे-कद्र और अलविदा जुमा का महत्व
रमजान के आखिरी 10 दिनों में ‘शबे-कद्र’ (Lailat al-Qadr) आती है, जो हजार महीनों से बेहतर रात मानी गई है। मौलाना रहमानी बताते हैं कि 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं शब को जागकर अल्लाह की विशेष इबादत करनी चाहिए। इसके अलावा, रमजान के आखिरी शुक्रवार यानी ‘अलविदा जुमा’ की नमाज का भी विशेष महत्व है, जिसमें मुल्क की सलामती के लिए दुआएं मांगी जाती हैं।
जकात और सवाब: गरीबों की मदद का महीना
रमजान केवल भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि दूसरों का दर्द समझने का महीना है। इस महीने में ‘जकात’ (दान) देना अनिवार्य (साहिब-ए-निसाब के लिए) और पुण्य का काम है। इस्लामिक मान्यता है कि रमजान में किए गए एक नेक काम का सवाब 70 गुना तक बढ़ जाता है। जकात के जरिए अमीर अपनी संपत्ति का एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को देते हैं, ताकि वे भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें।
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