इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब भारतीय वायुसेना के ‘हंटर’ और ‘नैट’ विमानों ने पाकिस्तानी आसमान को हिला कर रख दिया था, तब ईरान के शाह ने अपनी सरजमीं पर पाकिस्तानी जेट्स को पनाह दी थी। आज, 55 साल बाद कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पाकिस्तान वही ‘पुराना एहसान’ चुका रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका के घातक हवाई हमलों से बचाने के लिए ईरान ने अपने लड़ाकू विमानों और सैन्य संपत्तियों को पाकिस्तान के गुप्त ठिकानों पर छिपा दिया है।
नूर खान एयरबेस: क्या वाकई मुमकिन है विमानों को छिपाना?
अमेरिकी मीडिया ‘सीबीएस न्यूज’ की एक रिपोर्ट ने दावा किया है कि ईरान के कई फाइटर जेट्स पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर लैंड कर चुके हैं। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों को ‘फिक्शन’ करार दिया है। उनका तर्क है कि नूर खान बेस घनी आबादी वाले शहर के बीचो-बीच स्थित है, जहाँ इतने बड़े बेड़े को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखना नामुमकिन है। लेकिन अमेरिकी सांसद लिंडसे ग्राहम इस सफाई से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने साफ कहा है कि अगर पाकिस्तान दुश्मन (ईरान) की मदद कर रहा है, तो वह अमेरिका के लिए एक ‘भरोसेमंद मध्यस्थ’ कभी नहीं हो सकता।
1971 की वो अनकही कहानी: जब ईरान बना था पाकिस्तान का सुरक्षा कवच
दिसंबर 1971 का वह युद्ध जिसने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए, ईरान के लिए एक कूटनीतिक परीक्षा थी।
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हवाई पनाहगाह: जब भारतीय वायुसेना ने कराची और चकलाला जैसे प्रमुख एयरबेस पर बमबारी की, तो पाकिस्तान ने अपने कई नागरिक (PIA) और सैन्य विमानों को सुरक्षित रखने के लिए ईरान भेज दिया था।
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सैन्य और नैतिक मदद: तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने न केवल विमानों को पनाह दी, बल्कि पाकिस्तान को हथियारों के स्पेयर पार्ट्स, भारी मात्रा में एविएशन फ्यूल और रसद की आपूर्ति भी की थी।
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अमेरिकी कनेक्शन: उस समय अमेरिका सीधे तौर पर पाकिस्तान को हथियार नहीं दे पा रहा था, इसलिए उसने ईरान और जॉर्डन के रास्ते गुपचुप तरीके से सैन्य मदद इस्लामाबाद तक पहुँचाई थी।
बदलते समीकरण: चीन का साया और पाकिस्तान की मजबूरी
आज का परिदृश्य 1971 से बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान अब पूरी तरह से चीन (80% हथियार आयात) पर निर्भर है। बीजिंग ने भी अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान की तारीफ की है। पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका के साथ अपने पुराने रिश्तों को पटरी पर लाना चाहता है, तो दूसरी तरफ वह ईरान को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
अफगानिस्तान में भी ईरानी विमानों की ‘लैंडिंग’
सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, ईरान ने अपने कुछ नागरिक विमानों (महान एयर) को अफगानिस्तान की ओर भी मोड़ा है। काबुल एयरपोर्ट पर सुरक्षा चिंताओं के कारण इन विमानों को बाद में हेरात शिफ्ट कर दिया गया। यह साफ संकेत है कि ईरान अपने विमानन बेड़े को किसी भी संभावित ‘प्रि-एम्पटिव स्ट्राइक’ (पूर्व-नियोजित हमले) से बचाना चाहता है।
मध्यस्थता पर मंडराता खतरा
28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इस युद्ध को रोकने के लिए पाकिस्तान खुद को एक ‘शांति दूत’ के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की चेतावनी ने इस्लामाबाद की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वाशिंगटन में अब यह मांग उठने लगी है कि अगर पाकिस्तान ‘दोहरी चाल’ चल रहा है, तो उसे शांति वार्ता की मेज से बाहर कर देना चाहिए।
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