Hal Shashthi Vrat Katha: जानें संतान की लंबी आयु और सुरक्षा से जुड़ी हलषष्ठी व्रत की संपूर्ण पौराणिक कथा

सनातन धर्म में संतानों के कल्याण, उनके सुखी जीवन और दीर्घायु की कामना के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले व्रतों में हलषष्ठी का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे उत्तर भारत में यह पावन पर्व बेहद श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड क्षेत्रों के साथ-साथ बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण व शहरी अंचलों में इसे हरछठ, ललही छठ, तिनछठी या चंदन छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस पावन तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार भगवान बलराम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। बलराम जी का प्रधान शस्त्र हल और मूसल है, इसलिए कृषि संस्कृति और धरती के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इस दिन हल से जुते हुए किसी भी अन्न का उपभोग नहीं किया जाता है।

हरछठ का व्रत रखने वाली माताएं इस दिन निर्जला या फलाहार रहकर अपनी संतानों के समस्त संकटों को हरने की प्रार्थना करती हैं। इस व्रत की महिमा का गुणगान करते हुए शास्त्रों में एक ऐसी कथा का वर्णन मिलता है, जो यह सिखाती है कि ईश्वर के दरबार में झूठ, लालच और धोखे की कोई जगह नहीं होती, लेकिन सच्चे मन से किया गया पश्चाताप हर अनहोनी को टालने की शक्ति रखता है। यह कथा एक दूध बेचने वाली ग्वालिन और हलषष्ठी माता के चमत्कारी न्याय से जुड़ी हुई है।

दूध बेचने वाली ग्वालिन और हलषष्ठी माता की अमर पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में एक नगर में एक निर्धन ग्वालिन रहती थी। उसका जीवन दूध, दही और घी बेचकर चलता था। वह ग्वालिन गर्भवती थी और उसका प्रसव काल अत्यंत निकट था। उसी दिन पूरे क्षेत्र में माताएं अपनी संतानों की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी का पावन व्रत रख रही थीं। शास्त्रों के अनुसार हलषष्ठी व्रत में गाय के दूध, दही या घी का सेवन पूर्णतया वर्जित होता है, क्योंकि इस दिन गाय और बछड़े की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस व्रत में केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही प्रयोग करने का कठोर धार्मिक विधान है।

नगर की सभी व्रतधारी महिलाएं भैंस के दूध और दही की तलाश कर रही थीं। ग्वालिन के मन में अचानक लोभ समा गया। उसने सोचा कि यदि वह अपने पास मौजूद गाय के दूध और दही को भी भैंस का दूध बताकर बेचेगी, तो आज के दिन उसे मुंहमांगी कीमत मिल जाएगी और उसका सारा दूध तत्काल बिक जाएगा। लालच के वशीभूत होकर ग्वालिन ने अपने बर्तनों में गाय का दूध भर लिया और नगर की ओर निकल पड़ी। उसने व्रत करने वाली भोली-भाली माताओं को यह विश्वास दिलाकर कि यह शुद्ध भैंस का दूध है, सारा दूध ऊंचे दामों पर बेच दिया। धर्मपरायण महिलाओं ने अनजाने में उसी गाय के दूध से अपना व्रत और पूजन संपन्न किया।

जब लालच में ग्वालिन ने किया पाप और भुगतना पड़ा भयानक परिणाम

गाय के दूध को भैंस का दूध बताकर बेचने के बाद जब ग्वालिन भारी मुनाफा कमाकर अपने घर की ओर लौट रही थी, तभी रास्ते में एक बीहड़ खेत के पास उसे अचानक तीव्र प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। कोई सहायता न मिलने पर वह पास के एक कांटेदार पलाश (ढाक) के वृक्ष की छांव में बैठ गई। वहीं उसने एक अत्यंत सुंदर बालक को जन्म दिया। बच्चे को जन्म देने के बाद ग्वालिन अत्यंत दुर्बल महसूस कर रही थी। उसने नवजात शिशु को पलाश के पत्तों के बीच सुला दिया और स्वयं पास के एक छोटे जलाशय पर वस्त्र धोने और शरीर को शुद्ध करने चली गई।

उसी समय पास के खेत में एक किसान अपने बैलों से हल जोत रहा था। अचानक किसान के बैलों का संतुलन बिगड़ा और हल का तीखा फाल सीधे उस झाड़ी में जा लगा जहां ग्वालिन का नवजात शिशु लेटा हुआ था। हल का तीखा फलक लगने से वह बालक बुरी तरह कट गया और उसकी घटनास्थल पर ही दर्दनाक मृत्यु हो गई। जब किसान ने यह देखा तो वह भयभीत हो गया और अनजाने में हुए इस अपराध से कांपते हुए वहां से भाग निकला। थोड़ी देर बाद जब ग्वालिन जलाशय से लौटी, तो उसने अपने जिगर के टुकड़े को लहुलूहान और मृत अवस्था में पाया।

सच्चे पश्चाताप से जीवित हुआ बालक, हलषष्ठी माता ने दिया जीवनदान

अपने नवजात शिशु का शव देखकर ग्वालिन चीत्कार कर उठी। वह जमीन पर गिरकर विलाप करने लगी। रोते-रोते अचानक उसके अंतर्मन में यह बोध हुआ कि यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उस महापाप का तत्काल फल है जो उसने आज सुबह लोभ में आकर किया था। उसने व्रतधारी माताओं को छल से गाय का दूध बेचकर उनका पवित्र व्रत खंडित किया था। ग्वालिन को अपनी गलती का गहरा पछतावा हुआ। उसने समझ लिया कि यदि उसने अपने इस पाप को छिपाने की कोशिश की, तो उसका वंश कभी सुखी नहीं रह पाएगा।

ग्वालिन ने उसी क्षण एक कठोर निर्णय लिया। वह रोती-बिलखती हुई सीधे नगर की ओर भागी। उसने नगर के चौराहे और गलियों में जाकर उन सभी व्रतधारी महिलाओं को पुकारा जिन्हें उसने सुबह दूध बेचा था। ग्वालिन ने हाथ जोड़कर, घुटनों के बल बैठकर सभी के सामने अपना अपराध स्वीकार किया। उसने रोते हुए कहा कि हे माताओं, मैंने धन के लालच में आकर आप सभी को छल से गाय का दूध भैंस का बताकर बेचा था, जिसके कारण आपका व्रत अशुद्ध हो गया। मेरे इस घोर पाप का दंड मेरे निर्दोष बालक को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा है। आप सभी मुझे क्षमा कर दें और ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह मुझे इस पाप से मुक्ति दें।

ग्वालिन की इस सच्ची ग्लानि, सार्वजनिक पश्चाताप और खुले दिल से मांगी गई माफी को देखकर सभी माताओं का हृदय पिघल गया। सभी महिलाओं ने हलषष्ठी माता से उस अभागिन ग्वालिन के लिए प्रार्थना की। इसके बाद जब ग्वालिन भारी मन से उस पलाश के वृक्ष के पास पहुंची, तो वहां का दृश्य देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। हलषष्ठी माता की असीम कृपा से उसका मरा हुआ बालक जीवित होकर पलाश के पत्तों के बीच खेल रहा था और उसके शरीर पर खरोंच का एक भी निशान मौजूद नहीं था। यह देखकर ग्वालिन माता हरछठ के चरणों में गिर पड़ी और आजीवन सत्य व धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

हलछठ व्रत के कड़े नियम: जुते हुए खेत का अन्न और गाय के दूध का क्यों है निषेध

हलषष्ठी व्रत के नियम सनातन परंपरा के अन्य व्रतों से काफी अलग और अत्यंत कठोर माने जाते हैं। इस व्रत में धरती और हल के सम्मान को सर्वोपरि रखा गया है। यही कारण है कि हलछठ के दिन जमीन में हल चलाकर या जुताई करके उगाई गई किसी भी फसल, अनाज, फल या शाक-सब्जी का सेवन पूरी तरह निषिद्ध होता है। इस दिन महिलाएं केवल वही अन्न ग्रहण करती हैं जो प्राकृतिक रूप से स्वतः उगता है, जैसे तालाबों या जंगलों में उगने वाला पसही का चावल (तिन्नी का चावल या समई)।

इसके अतिरिक्त इस व्रत में गाय के दूध, घी, मक्खन या गोबर का किसी भी रूप में उपयोग नहीं किया जाता है। गाय को कामधेनु और मातृत्व का प्रतीक माना गया है, और भगवान बलराम के जन्मोत्सव पर गोवंश के संरक्षण का संदेश दिया जाता है। इस दिन केवल भैंस के दूध, दही और मक्खन का ही धार्मिक और खानपान में उपयोग करने का शास्त्रसम्मत नियम है। यदि कोई महिला गलती से भी गाय के उत्पाद का सेवन कर लेती है, तो व्रत खंडित माना जाता है।

महुआ, पसही का चावल और महुआ के पत्तों से पूजा का विशेष विधान

हलषष्ठी के दिन पूजा के लिए घर के आंगन या पवित्र स्थान पर गोबर से लीपकर एक छोटा सा गड्ढा बनाया जाता है, जिसे सांकेतिक रूप से पोखर या बावड़ी कहा जाता है। इसमें पलाश, महुआ, कांस और बेर की टहनियों को गाड़कर हरछठ माता और बलराम जी की स्थापना की जाती है। पूजा के दौरान महिलाएं महुआ के पत्तों पर भुने हुए महुए, मक्के के दाने, चना, लाई और पसही के चावल का भोग अर्पित करती हैं।

पूजा संपन्न होने के बाद व्रत रखने वाली महिलाएं अपने बेटों की पीठ पर हल्दी या ऐपन से छह बार छापे लगाती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘छठ का छापा’ कहा जाता है। मान्यता है कि इससे बच्चों को बुरी नजर, अकाल मृत्यु और गंभीर बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। शाम के समय महिलाएं पसही के चावल और महुआ या छह प्रकार की बिना जुताई वाली जंगली सब्जियों को मिट्टी के बर्तन में पकाकर पारण करती हैं। यह कथा हर वर्ष माताओं को यह स्मरण कराती है कि ईश्वर भाव के भूखे हैं और सच्चे मन से की गई पूजा और पश्चाताप हर संकट से पार लगा देता है।

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