कई बार व्यापारी किसी फैक्ट्री या कारखाने में अपनी जीवनभर की पूंजी, अत्याधुनिक मशीनरी और दिन-रात की कड़ी मेहनत लगा देते हैं, लेकिन फिर भी अपेक्षित मुनाफा नहीं होता। या फिर ऐसा होता है कि शुरुआत में फैक्ट्री बहुत अच्छी चलती है, लेकिन अचानक काम ठप हो जाता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार, यदि फैक्ट्री के पांच तत्वों (अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल और आकाश) का संतुलन बिगड़ जाए, तो ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं। अक्सर फैक्ट्री परिसर में किए गए किसी छोटे या अनजाने बदलाव के कारण बड़ा वास्तु दोष (Vastu Dosha) उत्पन्न हो जाता है। आइए जानते हैं उन प्रमुख वास्तु नियमों के बारे में, जिन्हें ठीक करके आप अपनी फैक्ट्री में मंदी को दूर कर सकते हैं:
1. दिशाओं का असंतुलन (भारीपन और हल्कापन)
वास्तु का सबसे बुनियादी नियम यह है कि उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) हमेशा हल्का और खुला होना चाहिए, जबकि दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) हमेशा भारी और ऊंचा होना चाहिए।
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बड़ा दोष: यदि आपकी फैक्ट्री का ईशान कोण (North-East) किसी निर्माण के कारण भारी हो गया है और दक्षिण-पश्चिम (South-West) भाग बिल्कुल हल्का या खाली है, तो यह धन हानि की सबसे बड़ी वजह है।
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उपाय: फैक्ट्री के पिछले हिस्से (दक्षिण-पश्चिम) में भारी निर्माण करवाएं, इसे ऊंचा रखें। यह दिशा व्यापार में स्थिरता और नियंत्रण (Stability & Control) लाती है।
2. फैक्ट्री प्लॉट और निर्माण की स्थिति
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दोष: यदि आपकी फैक्ट्री का प्लॉट बहुत बड़ा है और आपने केवल आगे के हिस्से में निर्माण किया है और पिछला हिस्सा पूरी तरह खाली छोड़ दिया है, तो यह वास्तु के अनुकूल नहीं है।
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उपाय: फैक्ट्री का पिछला हिस्सा कभी भी पूरी तरह खाली नहीं होना चाहिए। पीछे थोड़ा निर्माण अवश्य होना चाहिए जो भारी और ऊंचा हो। फैक्ट्री को हमेशा इस तरह व्यवस्थित करें कि आगे का हिस्सा अधिक खुला और हवादार रहे।
3. ईशान कोण में पानी का स्थान (Water Element)
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नियम: जल तत्व का सही दिशा में होना फैक्ट्री की प्रगति के लिए आवश्यक है।
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उपाय: अगर फैक्ट्री में अंडरग्राउंड वाटर टैंक (भूमिगत पानी की टंकी), बोरवेल या कुआं बनवाना है, तो इसके लिए उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा सबसे उत्तम और शुभ मानी जाती है। ध्यान रखें कि पानी का ऐसा कोई भी टैंक फैक्ट्री के पिछले हिस्से (दक्षिण-पश्चिम) में भूलकर भी न बनवाएं।
4. मुख्य द्वार और ‘ब्रह्मस्थान’ (प्रवेश द्वार का नियम)
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उत्तरमुखी प्रवेश द्वार: फैक्ट्री का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर (North) या उत्तर-पूर्व दिशा में होना बेहद शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना गया है, जो नए अवसरों और धन के प्रवाह (Cash Flow) को खींचती है।
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ब्रह्मस्थान को रखें खाली: फैक्ट्री के ठीक बीचो-बीच का हिस्सा (Center Point) जिसे ब्रह्मस्थान कहा जाता है, उसे हमेशा खाली, साफ-सुथरा और खुला रखना चाहिए। वहां कोई भी भारी मशीनरी, पिलर या कचरा जमा न होने दें।
5. दो यूनिटों के बीच का तालमेल
कई बार व्यापारी अपनी फैक्ट्री का विस्तार करते हैं और बगल का प्लॉट या यूनिट भी खरीद लेते हैं।
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उपाय: यदि आपने दो यूनिटों को आपस में जोड़ा है, तो विशेषज्ञ की सलाह के बिना दोनों के बीच की कनेक्टिविटी या दीवार को पूरी तरह बंद न करें। यदि दोनों यूनिटों के बीच का तालमेल वास्तु सम्मत रहेगा, तो आपके पुराने टूटे हुए ग्राहक (Clients) भी वापस लौटने लगेंगे और कारोबार फिर से गति पकड़ लेगा।
एक जरूरी सलाह: यदि आप अपनी फैक्ट्री में कोई बड़ा रेनोवेशन या बदलाव करने जा रहे हैं, तो यह जरूर देख लें कि उस बदलाव के बाद आपकी फैक्ट्री का ड्रेनेज, अग्नि कोण (आग्नेय – जहाँ भट्टी या बिजली के मीटर होते हैं) और कच्चा/पक्का माल रखने की दिशाएं प्रभावित न हो रही हों।
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