कोलकाता की कलात्मक धरती पर आस्था और ऐतिहासिक त्रासदी का संगम

शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का कोना-कोना रोशनी, ढाक की गूंज और अनूठी कलात्मकता से सराबोर हो उठता है। हर साल यहां के पूजा आयोजक समकालीन सामाजिक मुद्दों, प्राचीन धरोहरों और ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी थीम बनाकर दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन दुर्गा पूजा 2026 के इस पावन उत्सव में शहर के एक प्रमुख पूजा पंडाल ने जिस विषय को चुना है, उसने दर्शन करने पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं की आंखों को नम कर दिया है। यह पंडाल सीधे तौर पर 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के उस गहरे जख्म और त्रासदी को समर्पित किया गया है, जिसने बंगाल और पंजाब की धरती को आंसुओं, विस्थापन और खूनी लकीरों से छलनी कर दिया था। आस्था के इस भव्य उत्सव में देशभक्ति और ऐतिहासिक दर्द को जिस जीवंतता से उतारा गया है, उसने इसे इस साल के सबसे चर्चित और विचारोत्तेजक पंडालों की कतार में सबसे आगे खड़ा कर दिया है।

इस पंडाल का मुख्य और सबसे बड़ा आकर्षण है मां दुर्गा के मंडप के सामने स्थापित की गई ‘भारत माता’ की दिव्य और विशालकाय प्रतिमा। इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसे किसी पारंपरिक मिट्टी या प्लास्टर से नहीं, बल्कि लाखों ताजे और रंग-बिरंगे फूलों से तैयार किया गया है।

  • देश के विभिन्न हिस्सों से मंगाए गए गेंदा, गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और आर्किड के प्राकृतिक फूलों को बेहद बारीकी से जोड़कर भारत माता का स्वरूप गढ़ा गया है।

  • प्रतिमा में भारत माता के चेहरे पर ममता के साथ-साथ अपनी संतानों के बिछड़ने और जमीन के बंटवारे की असीम पीड़ा को बहुत ही भावुक अंदाज में दिखाया गया है।

  • भारत माता के हाथों में लहराता तिरंगा और उनके चरणों में बिखरी फूलों की पंखुड़ियां देश की अखंडता और संप्रभुता का गहरा संदेश देती हैं। फूलों की भीनी-भीनी खुशबू और उनके माध्यम से उकेरे गए इस मार्मिक रूप को देखकर पंडाल में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति कुछ पलों के लिए मौन और नतमस्तक हो जाता है।

पंडाल में प्रवेश करते ही दर्शनार्थियों को ऐसा महसूस होता है मानो वे समय के पहिये को पीछे घुमाकर सीधे वर्ष 1947 के उस काले दौर में पहुंच गए हों जब लाखों परिवारों को अपने पुरखों की जमीन, घर और यादों को एक झटके में छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा था। पंडाल के भीतरी और बाहरी रास्तों को उस समय के शरणार्थी शिविरों और रेलवे स्टेशनों का रूप दिया गया है।

  • विभाजन की प्रतीक वस्तुएं: पंडाल के दोनों किनारों पर जंग लगी पुरानी रेलवे पटरियां, लकड़ी की टूटी गाड़ियां, पुराने लोहे के ट्रंक, मिट्टी के फटे घड़े और फटे-पुराने कपड़े टंगे दिखाए गए हैं, जो बेघर हुए परिवारों के दर्द को बयां करते हैं।

  • काले और सफेद छायाचित्र: दीवारों पर तत्कालीन बंगाल और पंजाब के शरणार्थियों की वास्तविक ऐतिहासिक तस्वीरों और स्केचेज की एक विस्तृत गैलरी बनाई गई है। इनमें बच्चों को गोद में लिए बेबस माताएं, बुजुर्गों को कंधों पर ढोते युवा और सीमाओं पर खींची गई कंटीली तारों के दृश्य शामिल हैं।

  • साउंड और लाइट इफेक्ट्स: पंडाल के भीतर बैकग्राउंड में पुराने स्टीम इंजनों की सीटी, बच्चों के रोने की धीमी आवाजें और बिछड़ने की सिसकियों के साथ-साथ देश के अमर शहीदों के देशभक्ति गीतों का ऐसा सजीव संयोजन किया गया है जो रोंगटे खड़े कर देता है।

पूजा समिति के आयोजकों और मुख्य मूर्तिकारों का कहना है कि इस थीम को चुनने का उद्देश्य किसी पुरानी कड़वाहट या नफरत को जगाना नहीं है, बल्कि उस अमानवीय त्रासदी से सबक लेना और राष्ट्रीय एकता के महत्व को रेखांकित करना है। विभाजन ने सीमाओं के आर-पार लाखों जिंदगियों को तबाह किया था, लेकिन उन विस्थापित परिवारों ने जिस अदम्य साहस, मेहनत और जीवटता के साथ नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत की, यह पंडाल उसी मानवीय जिजीविषा को एक भावभीनी श्रद्धांजलि है। आज की नई पीढ़ी, जो आजादी के बाद के सुखद दौर में पली-बढ़ी है, उसे यह अहसास कराना जरूरी है कि आज हम जिस स्वतंत्र और एकजुट भारत में सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में अनगिनत बेकसूर इंसानों के बलिदान और आंसुओं का इतिहास दर्ज है।

कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को (UNESCO) द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) का दर्जा मिलने के बाद से यहां की थीम-बेस्ड पंडालों को देखने के लिए देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। विभाजन की थीम पर बने इस पंडाल की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही शहर भर से दर्शनार्थियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। महासप्तमी और महाअष्टमी के दिन यहां पैर रखने तक की जगह नहीं बच रही है। भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन, ट्रैफिक पुलिस और पूजा समिति के सैकड़ों स्वयंसेवकों ने विशेष बैरिकेडिंग और वन-वे एग्जिट रूट तैयार किए हैं। दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग कतार की व्यवस्था की गई है ताकि वे आसानी से फूलों से बनी भारत माता के दर्शन कर सकें। कोलकाता का यह पंडाल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान बनकर नहीं रह गया है, बल्कि कला, इतिहास और गहरी मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा दस्तावेज बन चुका है जो हर देखने वाले के दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ रहा है।

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