
पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच राज्य के राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि क्या दो दशक पुराने बिछड़े राजनीतिक साथी—भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD)—एक बार फिर एक मंच पर आएंगे? सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में टूटे इस 23 साल पुराने गठबंधन को दोबारा जिंदा करने की अटकलें पिछले कुछ हफ्तों से जोरों पर हैं। शिरोमणि अकाली दल के शीर्ष नेतृत्व की ओर से केंद्र सरकार और भाजपा के साथ सकारात्मक तालमेल के सीधे संकेत दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब भाजपा के प्रभारी और राष्ट्रीय स्तर के रणनीतिकार सार्वजनिक मंचों से राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का दम भर रहे हैं। इसी विरोधाभासी बयानों के चलते पंजाब में एक अभूतपूर्व राजनीतिक सस्पेंस पैदा हो गया है कि दोनों दल वास्तव में साथ आ रहे हैं या फिर यह केवल अपनी-अपनी मोलभाव की ताकत (Bargaining Power) बढ़ाने का खेल है।
सुखबीर-मोदी मुलाकात और हरसिमरत कौर के बयानों ने दी गठबंधन की चर्चाओं को हवा
इस सस्पेंस की ताजा शुरुआत तब हुई जब संसद के मानसून सत्र के दौरान शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यद्यपि सुखबीर बादल ने इसे पंजाब से जुड़े मुद्दों पर औपचारिक भेंट बताया, लेकिन कई वर्षों के अंतराल के बाद दोनों शीर्ष नेताओं की इस आमने-सामने की बैठक ने राजनीतिक हलकों में बड़ा संदेश दिया।
इसके तुरंत बाद बठिंडा से अकाली दल की सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने लोंगोवाल में एक जनसभा के दौरान खुले तौर पर संकेत दिया कि पंजाब की तरक्की और दिल्ली से केंद्रीय योजनाओं के प्रवाह के लिए सकारात्मक समझौतों की जरूरत है। उनके बयान का समर्थन करते हुए अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और यहां सामाजिक सौहार्द, कानून-व्यवस्था व विकास के लिए भाजपा-अकाली का पुराना गठबंधन समय की मांग है। मजीठिया ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी और प्रकाश सिंह बादल के दौर में दोनों दलों का यह गठबंधन केवल चुनावी समझौता नहीं बल्कि हिंदू-सिख भाईचारे का प्रतीक माना जाता था।
बीएल संतोष का पटियाला में बड़ा ऐलान: ‘सभी 117 सीटों पर अकेले लड़ेगी भाजपा’
अकाली नेताओं के इन बयानों के ठीक बाद जब माहौल बनने लगा कि गठबंधन का औपचारिक ऐलान जल्द हो सकता है, तभी भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी. एल. संतोष के पंजाब दौरे ने पूरी बहस को नया मोड़ दे दिया।
पटियाला, बठिंडा और अमृतसर में पार्टी के जोनल पदाधिकारियों के साथ सघन बैठकें करने के बाद बीएल संतोष ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “पंजाब की जनता बदलाव चाहती है और भाजपा इस बदलाव को हकीकत में बदलने के लिए पूरी तरह तैयार है। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा राज्य की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी।” पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और प्रदेश के रणनीतिकारों का मानना है कि पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपना स्वतंत्र बूथ ढांचा खड़ा किया है, ऐसे में किसी के साथ गठबंधन करके पुराने ढर्रे पर लौटना काडर का मनोबल तोड़ सकता है।
‘बड़ा भाई’ बनने की शर्त: सीट शेयरिंग का पुराना 94-23 फॉर्मूला अब नामंजूर
गठबंधन की बातचीत में सबसे बड़ी अड़चन और सस्पेंस का असली कारण दोनों दलों के बीच शक्ति संतुलन (Power Dynamics) का बदलना है।
1997 से 2020 तक चले पुराने समझौते के तहत अकाली दल हमेशा पंजाब में ‘बड़ा भाई’ (Senior Partner) हुआ करता था। उस फॉर्मूले के मुताबिक कुल 117 विधानसभा सीटों में से अकाली दल 94 सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा को केवल 23 शहरी सीटें दी जाती थीं। मुख्यमंत्री का पद हमेशा बादल परिवार के पास रहता था और भाजपा को केवल उपमुख्यमंत्री या कुछ मंत्री पदों से संतोष करना पड़ता था।
लेकिन अब बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा पुराने 94-23 के फॉर्मूले को पूरी तरह खारिज कर चुकी है। पंजाब भाजपा के उपाध्यक्ष फतेहजंग सिंह बाजवा समेत कई नेताओं का कहना है कि यदि कोई गठबंधन होना है, तो भाजपा को ‘बड़े भाई’ की भूमिका में आना होगा, जिसमें 50-50 फीसदी सीटों का बंटवारा या भाजपा के लिए 60 से अधिक सीटें और भविष्य में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी शामिल हो। अकाली दल के लिए इस शर्त को स्वीकार करना अपनी पारंपरिक पंथिक और ग्रामीण सियासत के दबदबे को सरेंडर करने जैसा है, यही वजह है कि दोनों दलों के बीच बातचीत अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंच पा रही है।
वोट शेयर का गणित और दोनों दलों की चुनावी मजबूरियां
अलग-अलग चुनाव लड़ने के बाद दोनों दलों को जो राजनीतिक नुकसान हुआ है, वह उन्हें फिर से करीब आने पर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है:
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2022 विधानसभा चुनाव की शिकस्त: 2022 के विधानसभा चुनाव में जब आम आदमी पार्टी (AAP) ने 92 सीटें जीतकर ऐतिहासिक लहर बनाई, तब अलग लड़े अकाली दल को मात्र 3 सीटें और भाजपा को केवल 2 सीटें मिली थीं।
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2024 लोकसभा चुनाव का वोट शेयर: 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा पंजाब में कोई सीट भले न जीत सकी हो, लेकिन उसका वोट शेयर बढ़कर 18.56 प्रतिशत पहुंच गया, जो अकाली दल के 13.42 प्रतिशत वोट शेयर से काफी अधिक था। अकाली दल ने केवल बठिंडा सीट जीती।
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सामाजिक समीकरण: पंजाब में अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक ग्रामीण जाट सिख और किसान वर्ग रहा है, जबकि भाजपा का मुख्य जनाधार शहरी हिंदू मतदाताओं और अब नए दलित-सिख चेहरों के बीच है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों के अलग रहने से हिंदू-सिख वोटों का बिखराव होता है, जिसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी या कांग्रेस को मिल जाता है।
अकाली दल के भीतर बगावत और बंदियों की रिहाई का पेंच
अकाली दल के सामने केवल भाजपा की शर्तें ही नहीं, बल्कि अपनी अंदरूनी गुटबाजी और पंथिक साख बचाने की भी भारी चुनौती है। हाल के दिनों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सुखबीर बादल के नेतृत्व के खिलाफ बगावती सुर अपनाए थे। इसके अलावा, पंजाब के पंथिक हलकों में ‘बंदी सिंहों’ (सजा पूरी कर चुके सिख कैदियों) की रिहाई, चंडीगढ़ पर पंजाब के अधिकार और किसानों की मांगों को लेकर भाजपा सरकार के प्रति अब भी सख्त रुख देखा जाता है। यदि अकाली दल बिना किसी ठोस पैकेज या बंदियों की रिहाई के भाजपा से हाथ मिलाता है, तो उसे पंथिक संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
आप और कांग्रेस का हमला: ‘गठबंधन करें या न करें, जनता नकार चुकी है’
भाजपा और अकाली दल के संभावित गठबंधन पर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और कैबिनेट मंत्री तरुणप्रीत सिंह ने कहा कि चाहे भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आए या छोटे भाई की, और चाहे 117 सीटों पर लड़े या 17 पर, पंजाब की जनता दोनों को शून्य पर समेट देगी। उन्होंने आरोप लगाया कि अकाली-भाजपा के पुराने 10 साल के शासनकाल में ही पंजाब में नशे और माफिया राज की नींव पड़ी थी जिसे जनता भूली नहीं है। वहीं कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह गठबंधन पंजाब के लोगों के हित के लिए नहीं बल्कि दोनों दलों के अपने राजनीतिक वजूद को बचाने की आखिरी छटपटाहट है।
क्या टूटेगा सस्पेंस? आगे की संभावित दिशा
पंजाब की सियासत इस समय बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। बीएल संतोष का 117 सीटों पर अकेले लड़ने का बयान जहां एक तरफ पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने और अकाली दल पर दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है, वहीं पर्दे के पीछे दोनों दलों के शीर्ष प्रबंधकों के बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम (CMP) और सीट बंटवारे को लेकर अनौपचारिक संवाद पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। यदि आने वाले महीनों में भाजपा अपनी ‘बड़े भाई’ की शर्त मनवाने में सफल रहती है या अकाली दल को कोई सम्मानजनक फॉर्मूला मिल जाता है, तो पंजाब 2027 में चतुष्कोणीय मुकाबले के बजाय एक बार फिर दो मजबूत गठबंधनों के बीच की जंग देख सकता है। फिलहाल, जब तक दोनों पार्टियों के हाईकमान से कोई अंतिम आधिकारिक मुहर नहीं लगती, तब तक ‘साथ या अकेले’ का यह सियासी सस्पेंस पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा हॉट टॉपिक बना रहेगा।
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