
उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित चर्चित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों के ध्वस्तीकरण (demolition) के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज कर दी गई है। हाईकोर्ट की इस दो सदस्यीय खंडपीठ के आदेश के बाद अब यह पूरा कानूनी मामला कमिश्नर कोर्ट में ही आगे चलेगा। इस फैसले से विश्वविद्यालय प्रबंधन और वहां पढ़ रहे छात्रों की निगाहें अब मंडलायुक्त (Commissioner) की अदालत पर टिक गई हैं।
हाईकोर्ट में क्या हुआ और क्यों खारिज हुई याचिका?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान याची (जौहर विवि प्रबंधन) के अधिवक्ता ने कोर्ट को जानकारी दी कि मुरादाबाद के मंडलायुक्त (कमिश्नर) की अदालत ने विश्वविद्यालय के भवनों के ध्वस्तीकरण के आदेश पर पहले ही स्थगन (interim stay) आदेश दे दिया है।
इस स्थिति को देखते हुए जब कोर्ट ने कहा कि अब यह याचिका सुनवाई के योग्य (पोषणीय) नहीं है, तो याची के वकील ने खुद ही याचिका वापस लेने का आग्रह किया। इसके बाद अदालत ने याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला और आगे की स्थिति?
रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के उपाध्यक्ष अजय कुमार द्विवेदी ने 15 जुलाई को जौहर विश्वविद्यालय के 38 अवैध भवनों को ध्वस्त करने का आदेश पारित किया था। इस कार्रवाई के विरोध में विश्वविद्यालय प्रबंधन ने आरडीए अध्यक्ष/अपीलीय अधिकारी के यहां अपील दाखिल की थी।
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मंडलायुक्त कोर्ट से मिली राहत: सुनवाई के बाद मंडलायुक्त कोर्ट ने जौहर विवि प्रबंधन को अंतरिम राहत देते हुए ध्वस्तीकरण के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट का आदेश है कि जब तक कमिश्नर कोर्ट में प्रकरण का निस्तारण नहीं होता, तब तक आरडीए का ध्वस्तीकरण आदेश निष्प्रभावी रहेगा।
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छात्रों और कर्मचारियों का भविष्य: याचिका में बताया गया था कि जौहर विश्वविद्यालय में वर्तमान में 1205 छात्र अध्ययनरत हैं और 162 कर्मचारी कार्यरत हैं। भवनों पर कार्रवाई से छात्रों की पढ़ाई और कर्मचारियों की आजीविका पर संकट आ सकता था, जिस कारण कानूनी लड़ाई तेजी से लड़ी जा रही है।
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