
म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद से जारी खूनी गृहयुद्ध ने अब आस्था और शांति के सबसे पवित्र प्रतीकों को भी अपने निशाने पर ले लिया है। मध्य म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र में शुक्रवार की सुबह उस वक्त चीख-पुकार और मातम में बदल गई जब म्यांमार की सैन्य जुंटा के एक लड़ाकू विमान ने एक बौद्ध मठ पर सीधे बम गिरा दिए। इस खौफनाक हवाई हमले के समय मठ के भीतर 100 से अधिक स्थानीय श्रद्धालु बौद्ध धर्म के पवित्र ‘लेंट’ (Lent) काल के दौरान आयोजित एक सप्ताह के ध्यान शिविर (Meditation Retreat) में लीन थे। बिना किसी पूर्व चेतावनी के आसमान से बरसी इस मौत ने तीन महिलाओं सहित कम से कम 14 निर्दोष लोगों की जान ले ली, जबकि 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इस बर्बर हमले के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है और स्थानीय ग्रामीण अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित जंगलों और नजदीकी बस्तियों की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।
ध्यान शिविर के बीच आसमान से बरसी मौत: स्वेल ले ओह गांव का खौफनाक मंजर
यह दर्दनाक घटना देश के दूसरे सबसे बड़े शहर मांडले से लगभग 75 किलोमीटर पश्चिम में स्थित म्यांग टाउनशिप के स्वेल ले ओह गांव में सुबह करीब 9 बजे घटी। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय नागरिक सुरक्षा संगठन के प्रवक्ता न्वे ऊ के अनुसार, गांव के बौद्ध मठ परिसर में ग्रामीण आंखें बंद कर प्रार्थना और ध्यान में मग्न थे। उसी दौरान अचानक एक सैन्य लड़ाकू विमान तेज गड़गड़ाहट के साथ गांव के ऊपर मंडराने लगा और कुछ ही पलों में मठ की मुख्य इमारत पर भारी विस्फोटक बम गिरा दिया गया।
धमाका इतना भीषण था कि मठ की पक्की छत और दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। ध्यान लगा रहे लोगों को संभलने या भागने का कोई मौका नहीं मिला। मलबे के नीचे दबने और छर्रों की चपेट में आने से कई लोगों के शरीर के चीथड़े उड़ गए। घटना के तुरंत बाद पूरे परिसर में धुएं और धूल का गुबार छा गया और हर तरफ घायलों की चीख-पुकार गूंजने लगी।
15 मिनट के अंतराल में दो बम धमाके: 100 से अधिक श्रद्धालु थे मौजूद
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी और स्थानीय मीडिया संस्थानों की ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार, सेना के लड़ाकू विमान ने केवल एक बार में हमला नहीं रोका, बल्कि लगभग 15 मिनट के अंतराल में दो अलग-अलग बम गिराए। पहला बम सीधे मठ परिसर के आंगन और प्रार्थना कक्ष पर गिरा, जबकि दूसरा बम मठ से सटे एक रिहायशी मकान पर जा गिरा, जिससे वह घर भी पूरी तरह जमींदोज हो गया।
हमले में अपनी सास को खोने वाले एक स्थानीय ग्रामीण ने अपनी पहचान उजागर न करने की शर्त पर बताया कि जब पहला धमाका हुआ, तो लोग घायलों की मदद के लिए दौड़े ही थे कि तभी दूसरा बम आ गिरा, जिससे मरने वालों और घायलों की संख्या बढ़ गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, मठ में मौजूद लोग कोई हथियारबंद लड़ाके नहीं थे, बल्कि वे गांव के बुजुर्ग, महिलाएं और सामान्य नागरिक थे जो आध्यात्मिक शांति के लिए धार्मिक रिट्रीट में हिस्सा ले रहे थे। आनन-फानन में स्थानीय स्वयंसेवकों ने मलबे से शवों को बाहर निकाला और घायलों को पास के गोपनीय प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाया, क्योंकि मुख्य सरकारी अस्पतालों में सेना द्वारा पकड़े जाने का भारी खतरा बना रहता है।
सागाइंग क्षेत्र बना सैन्य हमलों का प्रमुख केंद्र: प्रतिरोध और दमन की आग
सागाइंग क्षेत्र लंबे समय से म्यांमार की सैन्य सरकार के खिलाफ सबसे मजबूत प्रतिरोध केंद्र (Stronghold) माना जाता रहा है। फरवरी 2021 में जब सेना प्रमुख जनरल मिन आंग ह्लाइंग ने नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का तख्तापलट किया था, तब देशभर में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन शुरू हुए थे। सेना द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर गोलियां बरसाए जाने के बाद हजारों युवाओं और नागरिकों ने हथियार उठा लिए और पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) का गठन कर लिया।
जमीनी लड़ाई में विद्रोही समूहों और जातीय सशस्त्र संगठनों द्वारा कड़ा मुकाबला मिलने और कई प्रमुख इलाकों से सैन्य चौकियों के छिन जाने के बाद, म्यांमार की सेना अब पूरी तरह से हवाई हमलों (Airstrikes) पर निर्भर हो चुकी है। विद्रोही ताकतों के पास हवाई हमलों से बचाव के लिए कोई ठोस एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद नहीं है, जिसका फायदा उठाकर सैन्य विमान अक्सर घनी आबादी वाले गांवों, बाजारों, स्कूलों और धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप
बौद्ध मठ पर हुआ यह घातक हमला ऐसे समय में सामने आया है जब कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा गठित ने अपनी ताजा वार्षिक जांच रिपोर्ट जारी की थी। यूएन के स्वतंत्र जांचकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि म्यांमार की सेना सुनियोजित तरीके से नागरिक ठिकानों, विस्थापितों के शिविरों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों पर अंधाधुंध हवाई बमबारी कर रही है।
आईआईएमएम के प्रमुख निकोलस कौमजियन ने कहा था कि उनकी टीम इस बात के फॉरेंसिक साक्ष्य जुटा रही है कि इन हवाई हमलों के आदेश सेना की किस कमांड चेन से दिए जा रहे हैं और इनमें किस प्रकार के क्लस्टर व उच्च क्षमता वाले गोला-बारूद का इस्तेमाल हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी बार-बार इन हमलों को युद्ध अपराध (War Crimes) और मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया है।
सैन्य जुंटा का रुख और आम नागरिकों की सुरक्षा पर गहराता संकट
हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठ रहे सवालों के बीच म्यांमार के सैन्य प्रवक्ता और विदेश मंत्रालय ने अपनी पुरानी दलील दोहराते हुए कहा कि सेना केवल आतंकवादी समूहों और सशस्त्र विद्रोहियों के ठिकानों पर ‘सटीक और सीमित’ आतंकवाद-विरोधी अभियान चलाती है। सेना का दावा है कि उसके जवान आम नागरिकों को नुकसान से बचाने के लिए अधिकतम संयम बरतते हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर मठों, चर्चों और घरों के मलबे से निकलते मासूमों के शव सेना के इन आधिकारिक दावों की पोल खोलते नजर आते हैं।
स्वेल ले ओह गांव में हुए इस कत्लेआम के बाद स्थानीय आबादी में भारी दहशत फैल चुकी है। मृतकों के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद अधिकांश परिवारों ने अपने पैतृक घरों को छोड़ दिया है और जंगलों में छिपकर दिन गुजार रहे हैं। म्यांमार में गहराते इस संकट ने यह साबित कर दिया है कि पिछले पांच वर्षों से जारी गृहयुद्ध का सबसे दर्दनाक खामियाजा वहां के बेबस और निहत्थे नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जहां अब ध्यान और प्रार्थना में लीन श्रद्धालु भी अपनी जान की कोई गारंटी नहीं देख पा रहे हैं।
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