
दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के कूटनीतिक पटल पर एक ऐसा नया सैन्य और रणनीतिक समीकरण आकार ले रहा है, जिसने रक्षा विश्लेषकों और नई दिल्ली के सुरक्षा गलियारों में गहरी हलचल पैदा कर दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये (तुर्की) के बीच हाल ही में हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ को वैश्विक कूटनीति में एक नए ‘इस्लामिक नाटो’ (Islamic NATO) के रूप में देखा जा रहा है। इसी बीच भारत के पूर्वी पड़ोसी देश बांग्लादेश की तरफ से इस बहुपक्षीय सैन्य और आर्थिक ढांचे में शामिल होने के स्पष्ट संकेत दिए गए हैं। बांग्लादेश की नई सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर द्वारा दिए गए इस बयान के बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि आखिर यह ‘इस्लामिक नाटो’ क्या है, ढाका इसमें क्यों शामिल होना चाहता है और भारत के लिए यह रणनीतिक घेराबंदी कितनी बड़ी चिंता का सबब बन सकती है।
क्या है ‘इस्लामिक नाटो’ और मक्का रक्षा समझौता?
‘इस्लामिक नाटो’ की अवधारणा कोई पूरी तरह नई नहीं है, लेकिन अगस्त 2026 में सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में हस्ताक्षरित ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ ने इसे एक बेहद ठोस और आक्रामक स्वरूप प्रदान किया है। पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो (NATO) के सबसे महत्वपूर्ण ‘अनुच्छेद 5’ (सामूहिक सुरक्षा सिद्धांत) की तर्ज पर इस समझौते का मुख्य आधार यह तय किया गया है कि यदि गठबंधन के किसी भी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
इस त्रिपक्षीय गठबंधन में तीनों देशों की अपनी-अपनी विशिष्ट रणनीतिक ताकत है। सऊदी अरब के पास अकूत पेट्रो-डॉलर और ऊर्जा संसाधन हैं, तुर्किये के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना, अत्याधुनिक ड्रोन व रक्षा विनिर्माण उद्योग है, जबकि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और लंबी सैन्य लड़ाई का व्यावहारिक अनुभव है। इस गठबंधन का दायरा केवल इन तीन देशों तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि मिस्र, अजरबैजान और अब बांग्लादेश जैसे अन्य मुस्लिम-बहुल देशों को भी इसमें शामिल करने के रास्ते खुले रखे गए हैं।
बांग्लादेश क्यों होना चाहता है इस नए सैन्य गठबंधन में शामिल?
साल 2024 में शेख हसीना की सरकार के नाटकीय पतन और अंतरिम व्यवस्था के बाद से ही बांग्लादेश की विदेश नीति में 180 डिग्री का भारी बदलाव देखा जा रहा है। बांग्लादेश के राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ढाका का ‘इस्लामिक नाटो’ की ओर झुकाव कई रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा जरूरतों से प्रेरित है:
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रणनीतिक स्वायत्तता और भारत पर निर्भरता कम करना: शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल में बांग्लादेश के रिश्ते भारत के साथ बेहद करीबी रहे थे। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश की नई लीडरशिप अपनी विदेश नीति में विविधता लाना चाहती है ताकि वह किसी एक बड़े पड़ोसी पर अत्यधिक निर्भर न रहे।
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पाकिस्तानी सेना और खुफिया तंत्र से बढ़ती नजदीकियां: पिछले कुछ महीनों में ढाका और इस्लामाबाद के बीच सीधी समुद्री कनेक्टिविटी, व्यापार और सैन्य संवाद में अप्रत्याशित तेजी आई है। पाकिस्तान के साथ रणनीतिक तालमेल बैठाकर बांग्लादेश अपनी रक्षा क्षमताओं को पुनर्गठित करना चाहता है।
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तुर्किये के आधुनिक हथियारों और ड्रोनों तक पहुंच: तुर्किये का बायरक्तार टीबी-2 ड्रोन और आधुनिक मिसाइल प्रणालियां वैश्विक स्तर पर अपनी साख साबित कर चुकी हैं। बांग्लादेश अपनी सेना के आधुनिकीकरण (फोर्सेज गोल 2030) के लिए तुर्किये से बड़े रक्षा सौदे हासिल करना चाहता है।
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खाड़ी देशों से आर्थिक व ऊर्जा सुरक्षा: विदेशी मुद्रा भंडार के संकट और ऊर्जा जरूरतों से जूझ रहा बांग्लादेश सऊदी अरब के वित्तीय निवेश, सस्ते तेल और वहां काम कर रहे लाखों प्रवासी कामगारों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए इस गुट से जुड़ने को फायदेमंद मान रहा है।
भारत के लिए क्यों बढ़ रही है ‘डबल-फ्रंट’ से आगे की टेंशन?
बांग्लादेश का इस तरह के किसी भी सैन्य गठबंधन की ओर बढ़ना भारत के लिए सीधे तौर पर गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं पैदा करता है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत हमेशा से ‘टू-फ्रंट वॉर’ (पाकिस्तान और चीन) की आशंकाओं से निपटने की तैयारी करता रहा है, लेकिन यदि पूर्वी सीमा पर बांग्लादेश भी पाकिस्तान और तुर्किये जैसे देशों के सैन्य गठबंधन का हिस्सा बन जाता है, तो यह भारत के लिए ‘थ्री-फ्रंट’ या चारों तरफ से रणनीतिक दबाव की स्थिति बना सकता है।
सबसे बड़ी चिंता भारत के पूर्वी थिएटर में पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया मौजूदगी के फिर से सक्रिय होने की है। 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से भारत की पूर्वी सीमा काफी हद तक स्थिर और सुरक्षित रही थी। यदि ‘मक्का पैक्ट’ के तहत पाकिस्तानी नौसेना या वायुसेना को बांग्लादेश के बंदरगाहों (जैसे चटगांव या मोंगला) और एयरबेस तक पहुंच मिलती है, तो यह बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में भारतीय नौसेना की पारंपरिक बढ़त के लिए सीधा खतरा बन जाएगा।
‘चिकन नेक’ और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा पर मंडराता साया
भारत के लिए सबसे संवेदनशील भौगोलिक बिंदु पश्चिम बंगाल का ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ है, जिसे ‘चिकन नेक’ (Chicken’s Neck) कहा जाता है। महज 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा यह संकरा भू-भाग पूरे पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश) को शेष भारत से जोड़ता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सीमाएं एक तरफ नेपाल और भूटान से लगती हैं, तो दूसरी तरफ बांग्लादेश से सटी हुई हैं। यदि बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतें या किसी विदेशी सैन्य गुट का प्रभाव बढ़ता है, तो संकट या युद्ध के समय इस संकरे गलियारे पर मनोवैज्ञानिक और जमीनी दबाव कई गुना बढ़ सकता है। इसके अलावा, पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी गुटों को फिर से सीमा पार से पनाह और हथियार मिलने का खतरा भी दोबारा सिर उठा सकता है।
तुर्किये-पाकिस्तान-बांग्लादेश का नया त्रिकोण और चीन का छिपा हाथ
इस पूरे घटनाक्रम में तुर्किये और पाकिस्तान का भारत विरोधी रुख किसी से छिपा नहीं है। कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लगातार पाकिस्तान की भाषा बोलते रहे हैं। अब इस समीकरण में बांग्लादेश के जुड़ने से इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और मुस्लिम दुनिया में भारत के खिलाफ एक नया कूटनीतिक दबाव समूह तैयार हो सकता है।
इसके साथ ही, इस गठबंधन के पीछे चीन की रणनीतिक छाया भी स्पष्ट दिखाई दे रही है। चीन के पाकिस्तान और तुर्किये दोनों के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं और वह बांग्लादेश का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता भी है। बीजिंग हमेशा से भारत को उसके ही पड़ोस में उलझाए रखने की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति पर काम करता रहा है। यदि बांग्लादेश इस नए गुट में शामिल होता है, तो इससे अप्रत्यक्ष रूप से चीनी रणनीतिक हितों को ही दक्षिण एशिया में खाद-पानी मिलेगा।
शेख हसीना का मुद्दा और भारत-बांग्लादेश रिश्तों में खिंची खाई
ढाका के इस बदले हुए तेवर के पीछे भारत में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की मौजूदगी को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। बांग्लादेश की वर्तमान सरकार लगातार भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है, जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने कानूनी और कूटनीतिक दायरे में रहकर ही कोई फैसला करेगा।
इस तल्खी के चलते दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बातचीत ठंडे बस्ते में है। बांग्लादेशी नेतृत्व का यह मानना है कि पाकिस्तान और तुर्किये के करीब जाकर वह भारत पर प्रत्यर्पण और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर कड़ा दबाव बना सकता है।
नई दिल्ली की रणनीति: सतर्कता, निगरानी और मजबूत कूटनीति
भारतीय विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। भारत की रणनीति इस समय बेहद संतुलित और दूरदर्शी नजर आ रही है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह बांग्लादेश के लोगों के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखना चाहता है, लेकिन देश की क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
भारत के पास बांग्लादेश को प्रभावित करने के कई आर्थिक और भौगोलिक साधन (Leverage) मौजूद हैं। बांग्लादेश अपनी बिजली आपूर्ति, आवश्यक खाद्य वस्तुओं, चिकित्सा पर्यटन और पारगमन (ट्रांजिट) सुविधाओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है। इसके अलावा, सऊदी अरब और यूएई जैसे प्रभावशाली खाड़ी देशों के साथ भारत के अपने द्विपक्षीय संबंध आज ऐतिहासिक रूप से सबसे मजबूत दौर में हैं। ऐसे में भारत अपने कूटनीतिक संपर्कों का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए कर रहा है कि कोई भी नया रक्षा मंच भारत की सुरक्षा संप्रभुता के खिलाफ इस्तेमाल न किया जा सके।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या बांग्लादेश केवल सौदेबाजी की रणनीति के तहत ‘इस्लामिक नाटो’ का कार्ड खेल रहा है या वह सचमुच अपने 4,096 किलोमीटर लंबे बॉर्डर को साझा करने वाले सबसे बड़े पड़ोसी की चिंताओं को दरकिनार कर किसी औपचारिक सैन्य समझौते में कूदने का जोखिम उठाएगा।
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