मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी भीषण युद्ध और तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार से एक बेहद बड़ी और रणनीतिक खबर सामने आ रही है। दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz of Strait) पर ईरान के दबदबे और एकाधिकार को खत्म करने की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस जलमार्ग को पूरी तरह बायपास करने वाले अपने महत्वाकांक्षी ‘वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन’ प्रोजेक्ट की प्रक्रिया को सुपरफास्ट करने पर जोर दिया है। यदि यह प्रोजेक्ट तय समय पर पूरा हो जाता है, तो यह फुजैराह बंदरगाह के रास्ते यूएई की सरकारी तेल कंपनी ‘एडनॉक’ (ADNOC) की तेल निर्यात क्षमता को सीधे दोगुना कर देगा। इसका सीधा असर यह होगा कि दुनिया की होर्मुज जलमार्ग पर निर्भरता घट जाएगी और ऊर्जा सप्लाई को हथियार बनाने वाले ईरान का घमंड भी टूट जाएगा।
क्राउन प्रिंस का एडनॉक को सख्त निर्देश, अगले साल से शुरू हो सकती है प्रक्रिया
अबू धाबी मीडिया ऑफिस द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस महाप्रोजेक्ट के कुछ हिस्सों को अगले साल से ही क्रियाशील (ऑपरेशनल) किए जाने की उम्मीद जताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए तेल कंपनी एडनॉक के शीर्ष अधिकारियों को प्रोजेक्ट के काम में अभूतपूर्व तेजी लाने का सख्त निर्देश दिया है।
दरअसल, ईरान पर अमेरिका और इजरायल के विनाशकारी हमलों के बाद से ही इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। इन सैन्य टकरावों के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली वैश्विक ईंधन और कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसके चलते भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में पेट्रोल-डीजल के दामों और तेल की किल्लत को लेकर हाहाकार मचा हुआ है।
कब तक बनकर तैयार होगी यह नई लाइफलाइन? जानिए इसका पूरा गणित
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यह वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन फिलहाल युद्धस्तर पर बनकर तैयार हो रही है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह पूरी तरह से साल 2027 तक काम करना शुरू कर देगी, हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से अभी इसकी वास्तविक पूर्णता की सटीक तारीख का खुलासा नहीं किया है।
आपको बता दें कि फिलहाल यूएई के पास पहले से ही ‘अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन’ मौजूद है, जिसे मुख्य रूप से ‘हबशान-फुजैराह पाइपलाइन’ के नाम से जाना जाता है। इस मौजूदा पाइपलाइन की क्षमता हर रोज 1.8 मिलियन (18 लाख) बैरल कच्चे तेल को सीधे ओमान तट की खाड़ी तक पहुंचाने की है। सबसे बड़ी और राहत की बात यह है कि यह पूरा परिवहन बिना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संकरे और खतरनाक जलमार्ग से गुजरे ही सीधे अरब सागर तक पहुंच जाता है। नया प्रोजेक्ट इसी क्षमता को दोगुना करने के लिए लाया जा रहा है।
कुवैत, इराक और कतर को मिलेगी बड़ी राहत, ईरान की घेराबंदी मजबूत
मौजूदा समय में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब ही खाड़ी क्षेत्र के दो ऐसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं, जिनके पास निर्यात के लिए होर्मुज के अलावा वैकल्पिक मार्ग हैं और वे पूरी तरह इस पर निर्भर नहीं हैं। वहीं, ओमान को उसकी भौगोलिक स्थिति और खाड़ी तट से लगी लंबी कोस्टलाइन (तटरेखा) का प्राकृतिक फायदा मिलता है। दूसरी तरफ कुवैत, इराक, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी के छोटे लेकिन प्रमुख तेल उत्पादक देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और अर्थव्यवस्था के लिए शत-प्रतिशत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ही निर्भर हैं।
इस साल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के बड़े हमलों के बाद से ही होर्मुज जलमार्ग को लेकर वैश्विक संकट गहरा गया था। इन हमलों के प्रतिशोध में ईरान ने रणनीतिक रूप से होर्मुज को बंद करने की धमकी दी थी और कई जगह आवाजाही रोक दी थी, जिससे कतर और कुवैत जैसे देशों का तेल निर्यात ठप होने की कगार पर पहुंच गया था। नई पाइपलाइन इन देशों के लिए भी संजीवनी साबित हो सकती है।
क्या है होर्मुज जलमार्ग और क्यों इस पर टिका है दुनिया का पांचवां हिस्सा?
भौगोलिक और व्यापारिक दृष्टि से देखें तो होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) महज 33 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा समुद्री रास्ता है। लेकिन यह छोटा सा जलमार्ग सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और यूएई सहित दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों को ओमान की खाड़ी और अरब सागर के रास्ते सीधे वैश्विक बाजारों से जोड़ता है। पूरी दुनिया में हर रोज होने वाली कुल तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा (करीब 20%) अकेले इसी जलमार्ग से होकर जहाजों के जरिए गुजरता है।
यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों से अमेरिका अपनी पूरी सैन्य और कूटनीतिक ताकत के साथ होर्मुज को पूरी तरह सुरक्षित और खुला रखवाने की कोशिश में जुटा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा का एक बड़ा और छिपा हुआ एजेंडा भी इसी जलमार्ग की सुरक्षा और ईरान पर वैश्विक दबाव बनाने से जुड़ा हुआ था।
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