असम में अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने की कानूनी जंग एक बार फिर सुर्खियों में है। एक दिहाड़ी मजदूर ने खुद को भारतीय साबित करने के लिए 1951 के एनआरसी (NRC) रिकॉर्ड से लेकर पैन कार्ड और वोटर लिस्ट समेत कुल 15 दस्तावेज और अपने पिता की मौखिक गवाही तक पेश कर दी। इसके बावजूद, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) के पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए उस व्यक्ति को ‘विदेशी’ घोषित कर दिया है।
अदालत ने साफ किया कि याचिकाकर्ता विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत अपने कानूनी दायित्व को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा।
नदी के कटाव से पलायन और 15 कागजातों का दांव
यह मामला गुवाहाटी के पास बोरबोरी इलाके में किराए के मकान में रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर से जुड़ा है, जिसका जन्म 1988 में हुआ था। याचिकाकर्ता के मुताबिक, नदी के कटाव के कारण उनके परिवार को कई बार पलायन करना पड़ा, जिसके चलते वे चराई खसरा से धोबाकुरा, फिर घुगुदोबा और अंत में हाश्दोबा गांव पहुंचे।
अपनी नागरिकता के समर्थन में उसने जो 15 प्रमुख दस्तावेज सौंपे थे, उनमें ये शामिल थे:
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1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की कम्प्यूटरीकृत प्रतियां (जिसमें पिता और दादा-दादी के नाम थे)
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1966 से 2017 तक की विभिन्न वोटर लिस्ट की प्रमाणित कॉपियां
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1973 का दादा के नाम वाला मूल भूमि खरीद विलेख (Land Deed)
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2017 का स्कूल प्रमाण पत्र
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पैन कार्ड और मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC)
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज किया 1951 का NRC रिकॉर्ड?
न्यायाधीशों की खंडपीठ ने विदेशी न्यायाधिकरण के निष्कर्ष को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता के दावों को कानूनी रूप से अपर्याप्त माना। सबसे बड़ा झटका 1951 के एनआरसी रिकॉर्ड को लेकर लगा। कोर्ट ने इसे महज एक ‘कंप्यूटर जनित विवरण’ (Computer Generated Printout) माना, जिस पर साक्ष्य अधिनियम के तहत जरूरी डिजिटल प्रमाण-पत्र मौजूद नहीं था।
इसके अलावा, अदालत ने जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जनगणना के अभिलेखों को नागरिकता साबित करने के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस तकनीकी कमी के कारण याचिकाकर्ता का अपने पूर्वजों से संबंध साबित करने का मुख्य आधार ही कमजोर हो गया।
पैन कार्ड, स्कूल सर्टिफिकेट और जमीन के कागजात पर उठे सवाल
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा जमा किए गए अन्य दस्तावेजों में भी कई कानूनी कमियां पाईं:
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स्कूल सर्टिफिकेट: साल 2017 के इस सर्टिफिकेट को प्रमाणित करने के लिए न तो स्कूल के प्रधानाध्यापक को गवाह के तौर पर बुलाया गया और न ही स्कूल का मूल प्रवेश रजिस्टर कोर्ट में पेश किया गया।
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1973 का भूमि विलेख: इस दस्तावेज से वंशानुक्रम (Lineage) का स्पष्ट संबंध साबित नहीं हो सका। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि यह जमीन दादा की थी, तो उनके कानूनी वारिसों को क्यों नहीं मिली? साथ ही, इसका कोई भूमि राजस्व (Land Revenue) रिकॉर्ड भी नहीं था।
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पैन कार्ड और वोटर आईडी: अदालत ने कानूनी सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि पैन कार्ड और ईपीआईसी (EPIC) जैसे दस्तावेज नागरिकता के अकाट्य प्रमाण नहीं माने जाते।
वोटर लिस्ट की गंभीर विसंगतियों ने बिगाड़ा खेल
दस्तावेजों में सबसे बड़ी गड़बड़ी वोटर लिस्ट में मिली। याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई अलग-अलग सालों की वोटर लिस्ट में उम्र को लेकर भारी विरोधाभास था। उदाहरण के लिए, 1979 की सूची में परिवार के जिस सदस्य की उम्र 25 वर्ष दिखाई गई थी, वह 1989 की सूची में सिर्फ 29 वर्ष का दर्ज था।
इसके अतिरिक्त, परिवार के नाम बिना किसी विश्वसनीय कड़ी या स्पष्ट संबंध के तीन अलग-अलग गांवों (धोबाकुरा, घुगुदोबा और हाश्दोबा) की सूचियों में बिखरे हुए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये एक ही वंश के बजाय ‘तीन अलग-अलग परिवार’ प्रतीत होते हैं, जिससे 1966 से पहले से चली आ रही पारिवारिक निरंतरता साबित नहीं होती।
मौखिक गवाही भी नहीं आई काम
याचिकाकर्ता और उसके पिता की मौखिक गवाही को भी अदालत ने अपर्याप्त पाया। कोर्ट का कहना था कि नागरिकता जैसे गंभीर और संवेदनशील मामले में केवल जुबानी बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उसे कागजों से साबित होना जरूरी है।
जिरह के दौरान याचिकाकर्ता के पिता पैन कार्ड पर दर्ज अपने बेटे की जन्मतिथि (1988) की पुष्टि नहीं कर पाए, और यह भी सामने आया कि उनका नाम कड़ियों के अनुसार मेल नहीं खा रहा था। इन सभी तथ्यों और कानूनी कमियों को देखते हुए गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया।
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