
बॉलीवुड और ग्लैमर की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार, आकर्षक और आरामदायक नजर आती है, पर्दे के पीछे की हकीकत कई बार उतनी ही चुनौतीपूर्ण और कड़वी होती है। आज भले ही फिल्म सेट्स पर लग्जरी वैनिटी वैन, पर्सनल बॉडीगार्ड, महिला बाउंसर और विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल आम बात हो चुके हैं, लेकिन दो दशक पहले हिंदी सिनेमा का माहौल ऐसा बिल्कुल नहीं था। पूर्व मिस एशिया पैसिफिक और जानी-मानी बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा ने अपने करियर के शुरुआती दौर का एक ऐसा रूह कंपाने वाला और असहज अनुभव साझा किया है, जिसने फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के इतिहास पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
दीया मिर्जा ने लगभग 22 साल पुराने एक आउटडोर शूट का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे एक फिल्म के सेट पर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उन्हें 100 से ज्यादा पुरुषों की मौजूदगी के बीच केवल एक पतली चादर की आड़ में कपड़े बदलने पड़े थे। उस दौर में अभिनेत्रियों के पास कोई विकल्प नहीं होता था और उन्हें हर तरह के अमानवीय हालातों में काम करना पड़ता था।
सेट पर नहीं थी वैनिटी वैन, 100 पुरुषों के बीच बदलना पड़ा था कपड़ा
साल 2000 में ‘मिस एशिया पैसिफिक’ का प्रतिष्ठित खिताब जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली दीया मिर्जा ने साल 2001 में फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ से बॉलीवुड में कदम रखा था। अपने मासूम चेहरे और संजीदा अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली दीया ने बताया कि 2000 के दशक की शुरुआत में आज की तरह आधुनिक वैनिटी वैन की व्यवस्था केवल चुनिंदा बड़े मेल सुपरस्टार्स के लिए होती थी, जबकि नए कलाकारों और अभिनेत्रियों को खुले में या पेड़ों-झाड़ियों के पीछे ही तैयार होना पड़ता था।
दीया मिर्जा ने एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में उस घटना को याद करते हुए बताया कि वे एक फिल्म के गाने की शूटिंग के लिए मुंबई से बाहर किसी सुदूर लोकेशन पर थीं। सेट पर लगभग 100 से 150 लोगों का क्रू मौजूद था, जिसमें 99 प्रतिशत सिर्फ पुरुष कर्मचारी जैसे लाइटमैन, स्पॉटबॉय, कैमरामैन, जूनियर आर्टिस्ट और तकनीकी स्टाफ शामिल थे। वहां कोई वॉशरूम या चेंजिंग रूम उपलब्ध नहीं था। निर्देशक ने शॉट के बीच तुरंत कॉस्ट्यूम बदलने का आदेश दिया, जिसके बाद जो कुछ हुआ उसने दीया को अंदर तक झकझोर दिया था।
‘सिर्फ अंडरवियर में खड़ी थी और…’ दीया मिर्जा ने बयां किया दर्द
उस असहज स्थिति को बयां करते हुए दीया ने कहा, “उस वक्त सेट पर न कोई चेंजिंग रूम था और न ही कोई वैनिटी वैन। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। मेरी महिला ड्रेसर और मेकअप आर्टिस्ट ने मुझे बीच में खड़ा किया और मेरे चारों तरफ चार लोग एक बड़ी चादर और छतरी पकड़कर खड़े हो गए ताकि मुझे कोई देख न सके। उस पतली सी चादर के घेरे में मैं केवल अपने इनरवियर (अंडरवियर) में खड़ी थी और तेजी से अपने भारी लहंगे और ब्लाउज को बदल रही थी।”
दीया ने आगे साझा किया, “हवा चल रही थी और चादर बार-बार उड़ रही थी। मेरे चारों तरफ 100 से ज्यादा पुरुष काम कर रहे थे जो इधर-उधर आ-जा रहे थे। उस पल मुझे जिस तरह की असुरक्षा, झिझक और अपमान का अहसास हुआ था, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। मुझे हर सेकंड डर लग रहा था कि कोई चादर के पार न देख ले। दिल की धड़कनें तेज थीं, लेकिन कैमरे के सामने जाते ही आपको एक सेकंड में मुस्कुराकर रोमांटिक सीन करना पड़ता था। उस समय किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि एक 19-20 साल की युवा लड़की किस मानसिक दबाव से गुजर रही है।”
2000 के दशक में बॉलीवुड सेट्स पर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव
दीया मिर्जा का यह खुलासा केवल उनका व्यक्तिगत दर्द नहीं है, बल्कि यह उस दौर की हर उस अभिनेत्री की साझा दास्तान है जिसने 90 और 2000 के दशक में बॉलीवुड में काम किया है। उस दौर में फिल्म निर्माण का ढांचा बहुत असंगठित था।
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अभिनेत्रियों को पूरे दिन पानी पीने से बचना पड़ता था क्योंकि आउटडोर लोकेशंस पर महिलाओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय (Toilets) नहीं होते थे।
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जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में शूटिंग के दौरान अभिनेत्रियों को चट्टानों, तंबुओं या पेड़ों के पीछे जाकर अपने भारी-भरकम कपड़े बदलने पड़ते थे।
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मासिक धर्म (Periods) के दिनों में आउटडोर शूट करना महिला कलाकारों और डांसर्स के लिए किसी शारीरिक और मानसिक यातना से कम नहीं होता था।
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यदि कोई अभिनेत्री इन सुविधाओं की मांग करती थी, तो उसे सेट पर ‘नखरेबाज’ या ‘मुश्किल कलाकार’ का ठप्पा लगाकर फिल्मों से बाहर कर दिया जाता था।
दीया मिर्जा से पहले जूही चावला, रवीना टंडन, माधुरी दीक्षित और मनीषा कोइराला जैसी दिग्गज अभिनेत्रियां भी इस बात का खुलासा कर चुकी हैं कि उन्हें किस तरह विषम परिस्थितियों में बिना किसी प्राइवेसी के शूटिंग पूरी करनी पड़ती थी।
आज के सिनेमाई माहौल और तब के दौर में कितना आया बदलाव?
दीया मिर्जा ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि पिछले दो दशकों में फिल्म उद्योग में महिला कलाकारों और क्रू मेंबर्स के प्रति दृष्टिकोण में जमीन-आसमान का बदलाव आया है। आज सिनेमा सेट अधिक पेशेवर, संवेदनशील और महिलाओं के अनुकूल बन चुके हैं।
वर्तमान समय में हर बड़े और छोटे प्रोडक्शन में प्रत्येक मुख्य कलाकार के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस अलग वैनिटी वैन उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें पर्सनल वॉशरूम, चेंजिंग एरिया और एसी की सुविधा होती है। इसके अलावा अब सेट्स पर महिलाओं के लिए पोर्टेबल बायो-टॉयलेट्स, महिला सुरक्षा गार्ड्स और विशाखा गाइडलाइंस के तहत आंतरिक शिकायत समितियां (ICC) अनिवार्य कर दी गई हैं। फिल्मों में बोल्ड या इंटिमेट दृश्यों को शूट करने के लिए ‘इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर्स’ की मदद ली जाती है ताकि किसी भी कलाकार को असहजता महसूस न हो।
मिस एशिया पैसिफिक से पर्यावरण और महिला अधिकारों की आवाज तक दीया का सफर
दीया मिर्जा हमेशा से अपनी सादगी, बौद्धिक समझ और सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने ‘रहना है तेरे दिल में’, ‘दम’, ‘परिणीता’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘दस’ और ‘संजू’ जैसी अनगिनत शानदार फिल्मों में यादगार अभिनय किया है।
अभिनय के अलावा दीया संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की राष्ट्रीय सद्भावना राजदूत (Goodwill Ambassador) और संयुक्त राष्ट्र महासचिव की सतत विकास लक्ष्य (SDG) एडवोकेट भी हैं। वे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण और महिला सशक्तिकरण जैसे गंभीर विषयों पर वैश्विक मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करती रही हैं। दीया का मानना है कि जब तक कार्यस्थलों पर महिलाओं को गरिमा, सुरक्षा और बुनियादी अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक कोई भी समाज या उद्योग सही मायने में विकसित नहीं कहला सकता।
दीया मिर्जा द्वारा 22 साल पुराने इस वाकये को दुनिया के सामने लाना यह दर्शाता है कि आज की पीढ़ी को जो सुविधाएं और सुरक्षा मिल रही हैं, उनके पीछे पुरानी पीढ़ी की अभिनेत्रियों का अनकहा संघर्ष और कड़वे अनुभव शामिल रहे हैं। ग्लैमर की चमक के पीछे छिपी यह असहज सच्चाई बताती है कि मानवीय गरिमा और पेशेवर सम्मान हर कलाकार का बुनियादी अधिकार है, जिसे हासिल करने में सिनेमा जगत को कई दशक लग गए।
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