
उत्तर प्रदेश में इस वर्ष मॉनसून के मिजाज ने मौसम वैज्ञानिकों से लेकर आम जनता तक सभी को हैरत में डाल दिया है। भीषण गर्मी और सूखे की आशंकाओं के बीच विदा हुए अगस्त महीने ने प्रदेश में बारिश के इतिहास का एक नया अध्याय लिख दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अमौसी स्थित लखनऊ आंचलिक मौसम केंद्र से जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बीते अगस्त महीने में पूरे उत्तर प्रदेश में 291.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है। यह आंकड़ा सामान्य दीर्घकालिक औसत 235.5 मिलीमीटर की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है। इक्कीसवीं सदी के इतिहास में यह वर्ष 2018 में हुई 293.1 मिमी वर्षा के बाद अगस्त माह की दूसरी सर्वाधिक बारिश का सर्वकालिक रिकॉर्ड बन गया है।
राज्य के कई अंचलों में बादलों की ऐसी झड़ी लगी कि दशकों पुराने कीर्तिमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। राजधानी लखनऊ, औद्योगिक नगरी कानपुर, उन्नाव, प्रयागराज, वाराणसी, झांसी और बुंदेलखंड के बीहड़ों से लेकर तराई के जिलों तक अगस्त के महीने में बादलों ने जमकर जल प्रलय जैसा दृश्य उपस्थित किया। हालांकि, इस रिकॉर्डतोड़ बारिश का वितरण पूरे प्रदेश में एक समान नहीं रहा। जहां एक तरफ बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में नदियां उफान पर आ गईं और बस्तियों में पानी भर गया, वहीं पूर्वांचल के कुछ जिलों में किसान अभी भी आसमान की तरफ टकटकी लगाए बादलों के बरसने का इंतजार कर रहे हैं। अब जब कैलेंडर का पन्ना पलटकर सितंबर में प्रवेश कर चुका है, तो हर किसी के मन में यही सवाल कौंध रहा है कि क्या बादलों का यह तांडव सितंबर में भी जारी रहेगा या फिर मानसून विदाई से पहले मौसम करवट बदलेगा।
प्रयागराज और बांदा में 125 साल का रिकॉर्ड टूटा: बुंदेलखंड में मूसलाधार बारिश ने बदली तस्वीर
अगस्त 2026 में हुई इस ऐतिहासिक बारिश का सबसे विस्मयकारी और अप्रत्याशित रूप संगम नगरी प्रयागराज और बुंदेलखंड के बांदा जनपद में देखने को मिला। मौसम विभाग के पास उपलब्ध वर्ष 1901 से लेकर अब तक के 125 वर्षों के व्यवस्थित प्रेक्षण इतिहास में प्रयागराज और बांदा में अगस्त के महीने में इतनी भीषण वर्षा कभी दर्ज नहीं की गई थी। आंकड़ों के मुताबिक, इस अगस्त में प्रयागराज में कुल 631.6 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जिसने पिछले सवा सौ साल के तमाम पुराने रिकॉर्ड्स को ध्वस्त कर दिया। प्रयागराज में गंगा और यमुना का जलस्तर खतरे के निशान के करीब पहुंच गया, जिससे कछारी इलाकों और घाटों पर बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
ठीक इसी प्रकार बुंदेलखंड का बांदा जिला, जो अमूमन सूखे और जल संकट के लिए सुर्खियों में रहता था, वहां इस बार बादलों ने मूसलाधार बारिश कर इतिहास रच दिया। बांदा में अगस्त माह के दौरान 646 मिलीमीटर बारिश मापी गई, जो वहां के 125 साल के इतिहास का सबसे बड़ा आंकड़ा है। बांदा के साथ-साथ चित्रकूट और महोबा में भी 60 प्रतिशत से अधिक की भारी वर्षा दर्ज की गई, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में ‘अत्यधिक बारिश’ (Excessive Rain) की श्रेणी में रखा गया है। केन, बेतवा और मंदाकिनी नदियों के उफान पर आने से बुंदेलखंड के कई बांध लबालब भर गए और दशकों बाद भूजल स्तर में अप्रत्याशित सुधार देखा गया, जिससे रबी सीजन के लिए खेतों में पर्याप्त नमी जमा हो गई है।
21वीं सदी में अगस्त की दूसरी सबसे अधिक बारिश: 7 कम दबाव के क्षेत्रों ने बदला मानसून का रुख
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, अगस्त महीने में पूरे प्रदेश में झमाझम बारिश होने के पीछे बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बने विशेष मौसमी तंत्रों की जुगलबंदी मुख्य वजह रही। अमौसी मौसम केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का कहना है कि सामान्य तौर पर मानसून के दौरान एक महीने में बंगाल की खाड़ी में 3 से 4 कम दबाव के क्षेत्र (लो प्रेशर एरिया) बनते हैं, लेकिन इस बार अगस्त के 31 दिनों के भीतर बंगाल की खाड़ी में एक के बाद एक कुल 7 वेदर सिस्टम सक्रिय हुए। इनमें से 3 मानसूनी डिप्रेशन काफी गहरे और ताकतवर थे, जो मध्य भारत से होते हुए सीधे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर आकर कई दिनों तक ठहरे रहे।
इसके साथ ही मानसून ट्रफ लाइन लगातार उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों से होकर गुजरती रही, जिसने नम हवाओं को भारी मात्रा में आकर्षित किया। इसी का परिणाम था कि प्रदेश में दीर्घकालिक औसत की तुलना में 24 फीसदी अधिक पानी बरसा। 21वीं सदी यानी वर्ष 2001 से लेकर अब तक के 26 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो केवल 2018 का साल ऐसा रहा था जब अगस्त में 293.1 मिमी वर्षा हुई थी। इस वर्ष 291.3 मिमी पानी बरसने से यह सदी की दूसरी सबसे भीगी अगस्त साबित हुई है। लखनऊ में भी पूरे महीने 330 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जिससे राजधानी में पिछले आठ वर्षों का अगस्त का रिकॉर्ड टूट गया और मानसून का मौसमी कोटा समय से पहले ही पूरा हो गया।
पश्चिमी यूपी में सरप्लस तो पूरब में सूखा: 20 जिलों में कम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनें
हालांकि अगस्त के इस रिकॉर्डतोड़ आंकड़े के पीछे का एक कड़वा सच यह भी है कि राज्य के सभी 75 जिलों में यह राहत समान रूप से नहीं पहुंची। मौसम विभाग के संकलित आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 1 सितंबर तक के पूरे मानसूनी सीजन में समूचे उत्तर प्रदेश में कुल 571.6 मिलीमीटर वर्षा हुई है, जो सामान्य मानसूनी औसत 600.2 मिमी से लगभग 5 प्रतिशत कम है। इस आंकड़े का क्षेत्रीय विभाजन बेहद चौंकाने वाला है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां अब तक सामान्य से 3 प्रतिशत अधिक पानी बरस चुका है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामान्य से 10 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है।
प्रदेश के 20 जिले ऐसे हैं जहां अगस्त में भी बादलों ने बेरुखी दिखाई और वहां सामान्य से 20 से 59 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई। इन घाटे वाले जनपदों में अमेठी, बस्ती, गाजीपुर, जौनपुर, मथुरा, सहारनपुर और सीतापुर प्रमुख हैं। इससे भी बुरी स्थिति छह अन्य जिलों की रही, जिन्हें मौसम विभाग ने ‘अत्यधिक कम बारिश’ यानी 60 से 99 फीसदी की कमी वाली श्रेणी में रखा है। इनमें भदोही, देवरिया, कानपुर देहात, कुशीनगर, गाजियाबाद और शामली शामिल हैं, जहां सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। इसके विपरीत चित्रकूट, महोबा, मेरठ, मुजफ्फरनगर और संभल में 60 फीसदी से अधिक की मूसलाधार बारिश हुई है। वहीं बांदा, कन्नौज, कानपुर नगर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, बिजनौर, एटा, फिरोजाबाद और हमीरपुर में सामान्य से 20 से 59 प्रतिशत अधिक बरसात हुई है। लखनऊ, अयोध्या, वाराणसी, आगरा, बरेली, मुरादाबाद और गोरखपुर जैसे जनपदों में बारिश सामान्य दायरे में रही है।
सितंबर के लिए क्या है मौसम विभाग का पूर्वानुमान? अल-नीनो और पॉजिटिव आईओडी का दिखेगा असर
अगस्त की विदाई के बाद अब सभी की निगाहें सितंबर के पूरे महीने के मौसम चक्र पर टिकी हुई हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने सितंबर 2026 के लिए अपना मासिक आउटलुक जारी कर दिया है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, सितंबर में प्रशांत महासागर में सक्रिय अल-नीनो (El Nino) की स्थितियां और हिंद महासागर में बन रहा पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल (Positive IOD) मानसून की अंतिम चाल को तय करेंगे। इस वैश्विक मौसमी खींचतान के चलते सितंबर महीने में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम का मिजाज काफी अलग रहने वाला है।
मौसम वैज्ञानिकों का स्पष्ट आकलन है कि सितंबर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जनपदों में बारिश की गतिविधि सामान्य से कम रहने के आसार हैं। दूसरी ओर, पॉजिटिव आईओडी के अनुकूल प्रभाव से दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी विंध्य और पूर्वांचल के तराई वाले इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना बन रही है। मध्य यूपी, जिसमें लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली और कानपुर मंडल आते हैं, वहां सितंबर में बारिश का स्तर सामान्य रहने का अनुमान है। हालांकि, तापमान के मोर्चे पर राहत के संकेत कम हैं। सितंबर माह में प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में दिन और रात का औसत तापमान सामान्य से थोड़ा अधिक रहेगा, जिसके चलते बारिश का दौर थमते ही उमस और चिपचिपी गर्मी लोगों को बेहाल कर सकती है। 6 सितंबर तक राज्य के कई हिस्सों में रुक-रुक कर गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ने का सिलसिला बना रहेगा।
धान और खरीफ की फसलों पर असर: जलभराव और कीटों के खतरे से सतर्क रहने की सलाह
अगस्त की भारी बारिश और सितंबर के इस मिले-जुले पूर्वानुमान का सीधा असर उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती-किसानी पर पड़ने वाला है। जिन इलाकों में अगस्त में भारी बारिश हुई है, वहां धान की रोपाई कर चुके किसानों के लिए यह अमृत साबित हुई है क्योंकि इससे नहरों और ट्यूबवेलों पर निर्भरता घटी है। लेकिन जिन निचले इलाकों में खेतों में कई दिनों तक पानी भरा रह गया, वहां धान के पौधों की बढ़वार रुकने और जड़ों के सड़ने की समस्या सामने आ रही है।
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (CSA) कानपुर और आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय अयोध्या के कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क किया है कि अत्यधिक नमी और बाद में धूप निकलने से फसलों में ‘शीथ ब्लाइट’, ‘बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट’ और कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है। जिन किसानों के खेतों में अतिरिक्त पानी भरा है, वे तुरंत जलनिकासी की समुचित व्यवस्था करें। वहीं पूर्वांचल के उन जिलों में जहां बारिश की भारी कमी रही है, वहां किसानों को सलाह दी गई है कि वे कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों की तैयारी रखें या उपलब्ध सिंचाई साधनों से नमी बनाए रखें। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में 2026 का मानसून ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों से भरा रहा है, जिसने एक तरफ रिकॉर्डतोड़ बारिश का जश्न मनाया तो दूसरी तरफ किसानों को प्रकृति के बदलते चक्र के प्रति सजग रहने का कड़ा संदेश भी दिया है।
The News 11 – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया