
सनातन परंपरा में पूजा-पाठ, अनुष्ठान और किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत बिना तिलक के अधूरी मानी जाती है। माथे के ठीक मध्य में दोनों भौहों के बीच स्थित स्थान को योग और अध्यात्म में ‘आज्ञा चक्र’ कहा जाता है। यह शरीर का छठा चक्र और चेतना का प्रमुख केंद्र माना गया है। जब इस स्थान पर विधि-विधान से विशेष द्रव्यों का तिलक लगाया जाता है, तो न केवल एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, बल्कि संबंधित देवी-देवता की असीम कृपा भी प्राप्त होती है।
अक्सर श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार किसी भी देवता को रोली, चंदन या सिंदूर अर्पित कर देते हैं, जबकि शास्त्रों में हर देवी और देवता के स्वरूप, तत्व और ऊर्जा के आधार पर अलग-अलग तिलक द्रव्यों का स्पष्ट विधान तय किया गया है। गलत द्रव्य का उपयोग पूजा के पूर्ण फल से वंचित कर सकता है, इसलिए यह जानना अनिवार्य है कि किस देवता को कौन सा तिलक प्रिय है।
भगवान शिव को भस्म और त्रिपुंड का रहस्य
देवाधिदेव महादेव को संहार और वैराग्य का अधिष्ठाता माना गया है। भगवान शिव को कुमकुम या रोली का तिलक लगाना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता। शिवजी को सर्वाधिक प्रिय ‘भस्म’ (विभूति) और ‘सफेद चंदन’ है।
भस्म जीवन की नश्वरता और अंतिम सत्य का प्रतीक है। यह मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि यह भौतिक शरीर अंततः राख में विलीन हो जाएगा, इसलिए अहंकार और मोह का त्याग करना ही मुक्ति का मार्ग है। शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद भस्म से तीन समानांतर रेखाएं बनाई जाती हैं, जिसे ‘त्रिपुंड’ कहा जाता है। ये तीन रेखाएं मनुष्य के त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के संतुलन, त्रिकाल (भूत, वर्तमान, भविष्य) के नियंत्रण और तीनों लोकों की चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अलावा भगवान शिव के मस्तक पर शीतलता बनाए रखने के लिए शुद्ध श्वेत चंदन या बेलपत्र पर चंदन लगाकर अर्पित करना अत्यंत फलदायी होता है।
श्रीहरि विष्णु और मां लक्ष्मी को प्रिय पीत चंदन और अक्षत
सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु और धन-वैभव की अधिष्ठात्री मां महालक्ष्मी को पीला चंदन, गोपीचंदन, केसर और अष्टगंध का तिलक अत्यंत प्रिय है। पीला रंग ज्ञान, ऐश्वर्य, पवित्रता और सौम्यता का प्रतीक माना गया है।
वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु के चरणों और मस्तक पर ‘ऊर्ध्वपुंड्र’ (U-आकार या शंखाकार तिलक) लगाया जाता है। इसके केंद्र में प्रायः हल्दी, केसर या रोली की एक लाल रेखा बनाई जाती है, जो मां लक्ष्मी का प्रतीक होती है। भगवान विष्णु को पीला चंदन या केसर युक्त अष्टगंध अर्पित करने से कुंडली में गुरु ग्रह की स्थिति मजबूत होती है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। तिलक के ऊपर साबुत चावल (अक्षत) लगाने से आकर्षण और सकारात्मक ऊर्जा में कई गुना वृद्धि होती है।
प्रथम पूज्य गणेश और संकटमोचन हनुमान जी को सिंदूर का लेप
विघ्नहर्ता भगवान गणेश और शक्ति-भक्ति के प्रतीक श्री हनुमान जी को लाल सिंदूर और चमेली के तेल का लेप सर्वाधिक प्रिय है। लाल सिंदूर मंगल ग्रह, पराक्रम, तेज और उत्साह का प्रतिनिधित्व करता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश को सिंदूर अर्पित करने से सभी प्रकार के वास्तु दोष, भय और विघ्न समाप्त हो जाते हैं। वहीं हनुमान जी ने माता सीता के प्रति अपनी अनन्य निष्ठा और प्रभु श्रीराम की दीर्घायु की कामना के लिए अपने पूरे शरीर पर सिंदूर का लेप लगा लिया था। तभी से हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने की परंपरा है। जो जातक मानसिक तनाव, भय, अज्ञात संकट या मंगल दोष से पीड़ित हैं, उन्हें नियमित रूप से मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी तथा बुधवार को गणेश जी को सिंदूर अर्पित कर अपने मस्तक पर उसका टीका लगाना चाहिए।
मां दुर्गा और समस्त शक्ति स्वरूपा देवियों को कुमकुम और रोली
आदिशक्ति मां दुर्गा, मां काली, मां सरस्वती और अन्य देवियों के पूजन में कुमकुम, रक्त चंदन और रोली का विशेष महत्व है। लाल रंग प्रकृति की सृजनात्मक ऊर्जा, मातृत्व और शौर्य का प्रतीक माना जाता है।
हल्दी और चूने के प्राकृतिक मिश्रण से बनने वाला शुद्ध कुमकुम मां भगवती को अर्पित करने से वैवाहिक जीवन में अखंड सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है। शक्ति पूजन में सिंदूर और कुमकुम का तिलक साधक के भीतर साहस, आत्मविश्वास और नकारात्मक शक्तियों से लड़ने की क्षमता जागृत करता है। स्त्रियों के लिए मांग में सिंदूर और माथे पर कुमकुम की बिंदी लगाना आध्यात्मिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है।
सूर्य देव और काल भैरव के लिए विशिष्ट तिलक के नियम
ब्रह्मांड के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य नारायण को ‘रक्त चंदन’ (लाल चंदन) का तिलक अर्पित किया जाता है। तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल चंदन, लाल पुष्प और अक्षत मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य देने से समाज में यश, मान-प्रतिष्ठा और नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।
न्याय के देवता शनि देव और भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव को भस्म, काला तिल युक्त चंदन या काजल का तिलक अर्पित किया जाता है। यह तिलक तामसिक प्रवृत्तियों और बुरी नजर से रक्षा करने का अचूक उपाय माना जाता है।
किस उंगली से लगाएं तिलक? जानिए नियम और उनके प्रभाव
शास्त्रों में केवल तिलक का द्रव्य ही नहीं, बल्कि उसे लगाने के लिए किस उंगली का प्रयोग किया जाए, इसके भी कड़े नियम निर्धारित हैं:
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अनामिका उंगली (Ring Finger): सूर्य पर्वत से जुड़ी अनामिका उंगली से स्वयं को या देवी-देवताओं को तिलक लगाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इससे मानसिक शांति, नेत्र ज्योति और एकाग्रता बढ़ती है।
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अंगूठा (Thumb): जब किसी अतिथि, विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति या संतान को तिलक लगाया जाता है, तो अंगूठे का प्रयोग किया जाता है। अंगूठा शुक्र पर्वत का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे बल, ओज, स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
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मध्यमा उंगली (Middle Finger): शनि ग्रह से संबंधित मध्यमा उंगली से तिलक लगाने पर आयु में वृद्धि होती है और कार्यक्षेत्र में स्थिरता आती है।
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तर्जनी उंगली (Index Finger): बृहस्पति ग्रह से जुड़ी तर्जनी उंगली का प्रयोग सामान्यतः केवल पितरों के तर्पण, श्राद्ध कर्म और अंतिम संस्कारों में तिलक लगाने के लिए किया जाता है। शुभ कार्यों में तर्जनी से तिलक लगाना वर्जित माना गया है।
तिलक लगाने के पीछे छिपा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण
माथे पर तिलक लगाने की यह सनातन परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा शारीरिक और मानसिक विज्ञान भी मौजूद है:
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पिनियल ग्रंथि का संतुलन: दोनों भौहों के मध्य में ‘पिनियल और पिट्यूटरी ग्रंथि’ स्थित होती हैं, जो शरीर के महत्वपूर्ण हार्मोन्स का स्राव करती हैं। तिलक लगाते समय इस बिंदु पर हल्का दबाव पड़ने से ये ग्रंथियां सक्रिय रहती हैं, जिससे तनाव और अवसाद में कमी आती है।
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मस्तिष्क को शीतलता: चंदन और भस्म में प्राकृतिक शीतलता प्रदान करने वाले तत्व होते हैं। जब इन्हें माथे पर लगाया जाता है, तो यह सिरदर्द को रोकता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है और अत्यधिक क्रोध को शांत करता है।
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ऊर्जा का संरक्षण: मानव शरीर की प्राण ऊर्जा का निकास सिर के ऊपरी हिस्सों से होता है। माथे पर तिलक लगाने से शरीर की सकारात्मक ऊर्जा बाहर व्यर्थ नहीं बहती और मानसिक एकाग्रता सुदृढ़ बनी रहती है।
शास्त्र सम्मत नियमों का पालन करते हुए सही देवता को उनका प्रिय तिलक अर्पित करने और स्वयं के मस्तक पर उसे धारण करने से घर में दिव्यता, सुख-शांति और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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