
पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़, भूस्खलन और हिमनद टूटने की विभीषिका ने पूरे देश को गहरे मानवीय संकट में धकेल दिया है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर खिसकने के बाद भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी (गंडक) नदियों में आए विकराल उफान ने सैकड़ों गांवों को नेस्तनाबूद कर दिया। इस महात्रासदी में अब तक 900 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 2500 से लेकर 4000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। त्रासदी के कई दिनों बाद जैसे-जैसे पानी घट रहा है, नदियों के बहाव और मलबे से क्षत-विक्षत शव बरामद हो रहे हैं। सबसे रोंगटे खड़े करने वाली तस्वीर मध्य नेपाल के चितवन जिले से सामने आई है, जहां आपदा के उपरिकेंद्र (रसुवा और नुवाकोट) से सैकड़ों किलोमीटर दूर बहकर आए अज्ञात शवों को घने जंगलों में बड़ी-बड़ी खाइयां खोदकर सामूहिक रूप से दफनाया जा रहा है।
चितवन के देवघाट जंगल क्षेत्र में, जहां कभी स्थानीय नागरिक सुबह की सैर के लिए जाया करते थे, वहां अब खुदाई मशीनों (Excavators) से लाल मिट्टी की लंबी-चौड़ी खाइयां खोदी जा रही हैं। शवों से भरे ट्रकों और एंबुलेंसों का काफिला जब इन जंगलों में पहुंच रहा है, तो पूरे इलाके का माहौल चीत्कारों और सन्नाटे से भर जाता है। दर्जनों शवों को एक साथ इन खाइयों में रखकर मिट्टी डाली जा रही है। प्राकृतिक आपदा से कराह रहे देश में इस दृश्य ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया है और राहत कार्यों के बीच एक नया संवेदनशील विवाद पैदा कर दिया है।
हिंदू परंपरा बनाम मजबूरी: नदी किनारे अंतिम संस्कार की जगह खाइयों में क्यों दफनाए जा रहे शव?
नेपाल एक बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाला राष्ट्र है, जहां सनातन परंपरा के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके निकटतम परिजनों की उपस्थिति में पवित्र नदियों के तट पर वैदिक मंत्रोच्चार और अग्नि संस्कार के जरिए अंतिम विदाई दी जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से किए गए दाह संस्कार के बिना आत्मा को शांति नहीं मिलती। ऐसे में जब बाढ़ पीड़ितों के शवों को बिना परिजनों की मौजूदगी और बिना धार्मिक कर्मकांड के खाइयों में दफनाया जा रहा है, तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं।
अपनों की तलाश में दर-दर भटक रहे परिजनों का कहना है कि यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मृतकों की मानवीय गरिमा और धार्मिक आस्था का सीधा उल्लंघन है। परिजनों का आरोप है कि जिन लोगों ने जीवन में कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी विदाई इस तरह होगी, उन्हें मृत्यु के बाद भी सम्मानजनक अंतिम संस्कार से वंचित किया जा रहा है। स्थानीय सामाजिक संगठनों और संतों ने सवाल उठाया है कि क्या सरकार और प्रशासन ने हिंदू रीति-रिवाजों की अनदेखी कर शवों के निस्तारण में अमानवीय जल्दबाजी दिखाई है।
मुर्दाघरों में जगह खत्म और महामारी का डर: स्वास्थ्य प्रोटोकॉल और बदबू के बीच फंसा प्रशासन
प्रशासनिक अधिकारियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि वे एक अभूतपूर्व और लाचार कर देने वाली स्थिति का सामना कर रहे हैं। भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों के तेज बहाव में बहकर आए शव चार से पांच दिनों तक पानी और कीचड़ में डूबे रहे, जिससे वे अत्यंत क्षत-विक्षत और सड़ने की अंतिम अवस्था (Advanced Decomposition) में पहुंच चुके हैं। कई शवों के चेहरे और पहचान के निशान पूरी तरह मिट चुके हैं। अत्यधिक उमस, गर्मी और नमी के कारण शवों से उठने वाली असहनीय दुर्गंध ने अस्पतालों के आसपास का वातावरण विषाक्त कर दिया है।
चितवन के भरतपुर अस्पताल और राजधानी काठमांडू के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन के मुर्दाघर अपनी निर्धारित क्षमता से चार से पांच गुना अधिक शवों से भर चुके हैं। 50 शवों की क्षमता वाले मुर्दाघरों में 125 से 150 शव फर्श पर रखने पड़े। डॉक्टरों और फोरेंसिक विशेषज्ञों ने सख्त चेतावनी जारी की थी कि यदि इन सड़ते शवों को खुले में या सामान्य कमरों में अधिक समय तक रखा गया, तो हैजा, टाइफाइड और अन्य संक्रामक महामारियां फैल सकती हैं, जो राहत शिविरों में रह रहे लाखों जीवित बाढ़ पीड़ितों के लिए जानलेवा साबित होंगी। इसी स्वास्थ्य आपातकाल और इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) के वैश्विक आपदा प्रबंधन प्रोटोकॉल के तहत प्रशासन ने सामूहिक दफन का अस्थायी रास्ता चुना।
परिजनों की चीत्कार और राजनीतिक बवाल: पूर्व पीएम बाबूराम भट्टराई ने उठाए गंभीर सवाल
शवों के इस सामूहिक दफन ने नेपाल की घरेलू राजनीति में भी बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे बेहद अनुचित और असंवेदनशील करार दिया है। बाबूराम भट्टराई ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर कहा कि जब तक लापता लोगों की खोज और बचाव अभियान पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता और परिजनों के साथ व्यापक संवाद नहीं होता, तब तक अज्ञात शवों को यूं ही जल्दबाजी में दफनाना सर्वथा गलत है। उन्होंने सवाल किया कि यदि मुर्दाघरों में जगह की कमी थी, तो सरकार ने आपातकालीन बजट का उपयोग करके अस्थायी कोल्ड स्टोरेज कंटेनर या एयर-कंडीशंड होल्डिंग सेंटर क्यों नहीं बनाए?
लापता नागरिकों के परिजनों की आंखें आंसुओं से सूख चुकी हैं। कई परिवारों का कहना है कि वे केवल इस उम्मीद में अस्पताल के चक्कर लगा रहे थे कि शायद उनके बेटे, पिता, मां या बेटी का कोई सुराग मिल जाए ताकि वे अपने हाथों से मुखाग्नि देकर उनका पिंडदान कर सकें। लेकिन प्रशासन द्वारा आनन-फानन में शवों को दफन किए जाने से वे अपने प्रियजनों को अंतिम बार देखने के अधिकार से भी वंचित हो गए।
डीएनए सैंपल और संदर्भ नंबर: सरकार का दावा- ‘यह अस्थायी व्यवस्था, पहचान के बाद मिलेगा अंतिम संस्कार का मौका’
बढ़ते जनआक्रोश और धार्मिक विवाद को देखते हुए नेपाल सरकार और स्थानीय प्रशासन ने विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राय और मामले का समन्वय कर रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कोई ‘स्थायी दफन’ नहीं है, बल्कि एक ‘अस्थायी आपदा प्रबंधन व्यवस्था’ है। अधिकारियों ने बताया कि किसी भी शव को दफनाने से पहले उसकी पूरी फोरेंसिक वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराई जा रही है।
हर शव के शरीर से अनिवार्य रूप से डीएनए (DNA) सैंपल सुरक्षित किए जा रहे हैं। शवों के शारीरिक लक्षणों, कपड़ों, गहनों, टैटू और विशेष निशानों का पूरा डेटाबेस तैयार कर प्रत्येक शव को एक विशिष्ट रेफरेंस कोड (पहचान संख्या) आवंटित किया जा रहा है। कब्रों पर जमीन के ऊपर और नीचे विशेष मार्कर लगाए गए हैं। सरकार ने परिजनों को आश्वासन दिया है कि भविष्य में जब भी लापता लोगों के रिश्तेदार डीएनए का मिलान करेंगे या साक्ष्यों के आधार पर अपने परिजन की पहचान की पुष्टि करेंगे, तो उन्हें कब्र से पार्थिव अवशेष (Exhumation) निकालने की पूरी कानूनी अनुमति दी जाएगी, ताकि वे अपनी पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उनका विधि-विधान से दाह संस्कार और तर्पण कर सकें।
हिमालयी त्रासदी का सबक: बदलता पर्यावरण और अनसुलझे मानवीय सवाल
नेपाल की यह तबाही केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, अनियोजित निर्माण और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन की एक खौफनाक चेतावनी है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण हिमालय के ऊंचे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस त्रासदी ने यह भी साबित कर दिया है कि आधुनिक आपदा प्रबंधन प्रणालियों को केवल जीवित लोगों को बचाने तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मृतकों के मानवीय सम्मान, धार्मिक विश्वासों और उनके परिजनों की संवेदनाओं की रक्षा के लिए भी पहले से तैयार रहना होगा। जब तक इस त्रासदी के घाव भरेंगे, तब तक चितवन के जंगलों में बनी ये खाइयां प्रकृति के विनाशकारी रूप और लाचार व्यवस्था की मूक गवाह बनी रहेंगी।
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