
सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण की खगोलीय घटनाओं को अत्यंत संवेदनशील और आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली माना गया है। शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में ब्रह्मांड में नकारात्मक और दूषित तरंगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इस अवधि में जहां एक ओर जप, तप और ध्यान का अनंत गुना फल मिलता है, वहीं ग्रहण समाप्त होने यानी ‘मोक्ष काल’ के बाद शुद्धिकरण और दान का विधान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह संशय रहता है कि ग्रहण का मोक्ष होने के बाद दान कितनी देर के भीतर कर देना चाहिए और इसके लिए कौन से शास्त्रीय नियम लागू होते हैं। ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में ग्रहण मोक्ष के उपरांत दान करने की एक निश्चित समय सीमा और सूर्यास्त से जुड़े बेहद कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं।
ग्रहण मोक्ष के तुरंत बाद स्नान और शुद्धिकरण का महत्व
जैसे ही ग्रहण का मोक्ष होता है यानी राहु या केतु का साया सूर्य अथवा चंद्रमा से पूरी तरह समाप्त हो जाता है, सबसे पहला अनिवार्य कार्य ‘मोक्ष स्नान’ माना गया है।
धर्म सिंधु और निर्णय सिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार ग्रहण मोक्ष के तत्काल बाद सामान्य जल में गंगाजल या किसी पवित्र नदी का जल मिलाकर सिर से स्नान करना अनिवार्य है। इस स्नान को किए बिना दान का संकल्प नहीं लिया जा सकता। स्नान के बाद स्वच्छ और धुले हुए वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद पूरे घर में, विशेषकर पूजा घर, रसोई और तिजोरी वाले स्थान पर गंगाजल का छिड़काव करके घर की शुद्धि की जाती है। जब तक घर और शरीर की शुद्धि नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार का दान फलदायी नहीं माना जाता।
ग्रहण मोक्ष के कितने समय बाद तक किया जा सकता है दान?
ज्योतिषीय गणना और शास्त्रों के अनुसार ग्रहण मोक्ष के बाद दान करने के लिए सबसे उत्तम समय मोक्ष के तुरंत बाद का ‘एक प्रहर’ यानी लगभग 3 घंटे का कालखंड माना गया है।
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सर्वोत्तम समय (प्रथम 48 मिनट): मोक्ष होने के तुरंत बाद स्नान करके पहले एक मुहूर्त (लगभग 48 मिनट) के भीतर किया गया दान ‘अमृत तुल्य’ माना जाता है। इस दौरान किए गए दान से सभी प्रकार के ग्रह दोष तत्काल शांत होते हैं।
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उत्तम समय (3 घंटे के भीतर): यदि किसी कारणवश 48 मिनट में दान देना संभव न हो, तो मोक्ष के 1 प्रहर (लगभग 3 घंटे) के भीतर दान की प्रक्रिया अवश्य पूरी कर लेनी चाहिए।
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सामान्य नियम: किसी भी परिस्थिति में ग्रहण समाप्त होने के 12 घंटे से अधिक समय तक दान को टालना उचित नहीं माना जाता। यदि दान की वस्तुएं संकल्पित करके तुरंत नहीं दी गईं, तो उसका पुण्य प्रभाव धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।
सूर्यास्त से पहले दान करने का अनिवार्य नियम
सूर्य ग्रहण के संदर्भ में धर्मशास्त्रों का एक अत्यंत स्पष्ट और महत्वपूर्ण नियम है, जिसे ‘सूर्यास्त से पूर्व दान का नियम’ कहा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार यदि सूर्य ग्रहण दिन के समय समाप्त हो रहा है, तो उसका दान सूर्यास्त होने से पहले ही संपन्न हो जाना चाहिए। सनातन परंपरा में अन्न, वस्त्र और धातु का दान प्रत्यक्ष सूर्य देव की उपस्थिति में देना सर्वोत्तम माना गया है। सूर्य को ‘प्रत्यक्ष देवता’ और सृष्टि की आत्मा कहा गया है। जब आप दिन के उजाले में दान करते हैं, तो सूर्य देव उसके साक्षी बनते हैं, जिससे जातक के यश, कीर्ति और आरोग्य में कई गुना वृद्धि होती है।
यदि किसी कारणवश ग्रहण दोपहर या शाम को समाप्त हो रहा है और सूर्यास्त में बहुत कम समय बचा है, तो मोक्ष स्नान के तुरंत बाद सूर्यास्त की लालिमा समाप्त होने से पहले ही दान सामग्री किसी योग्य ब्राह्मण, मंदिर के पुजारी या जरूरतमंद व्यक्ति के हाथों में सौंप देनी चाहिए। सूर्यास्त के बाद दान की वस्तुएं घर से बाहर निकालना शुभ नहीं माना जाता।
चंद्र ग्रहण या रात्रि में मोक्ष होने पर क्या है दान का विधान?
अनेक बार चंद्र ग्रहण मध्यरात्रि या देर रात समाप्त होता है, जब बाहर जाकर दान देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। इस स्थिति के लिए शास्त्रों में ‘संकल्प विधान’ बताया गया है।
यदि ग्रहण का मोक्ष रात्रि के समय हो रहा है, तो जातक को चाहिए कि वह रात में ही मोक्ष के तुरंत बाद स्नान करे। स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थान पर बैठे। इसके बाद दान में दी जाने वाली सभी सामग्रियों (जैसे अनाज, तिल, धन, वस्त्र आदि) को एक थाली में सजाकर अपने दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर दान का संकल्प करे। संकल्प करने के बाद उस सामग्री को हाथ लगाकर किसी शुद्ध और सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाए।
इसके बाद अगले दिन सुबह सूर्योदय होते ही स्नान-ध्यान करके उस संकल्पित सामग्री को किसी जरूरतमंद व्यक्ति या सुपात्र ब्राह्मण को दान कर दिया जाए। ऐसा करने से रात्रि के समय भी दान का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त हो जाता है।
ग्रहण के बाद किन वस्तुओं का दान करना होता है सबसे फलदायी?
ग्रहण के अशुभ प्रभावों को काटने और ग्रहों की शुभता प्राप्त करने के लिए विशेष वस्तुओं के दान का विधान है।
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अनाज और दालें: गेहूं, चावल, उड़द, मूंग और चने की दाल का दान अन्नपूर्णा की कृपा दिलाता है और घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होने देता।
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काला तिल और सरसों का तेल: ग्रहण के दौरान राहु और केतु की नकारात्मक ऊर्जा सबसे अधिक सक्रिय होती है। काले तिल, तेल या लोहे के बर्तन का दान करने से राहु-केतु और शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
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गुड़ और तांबा: सूर्य ग्रहण के बाद गुड़, तांबे के पात्र या लाल वस्त्र का दान करने से कुंडली में सूर्य मजबूत होता है और सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है।
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सफेद वस्तुएं और चांदी: चंद्र ग्रहण के मोक्ष के बाद दूध, चावल, चीनी, सफेद वस्त्र या चांदी का सिक्का दान करने से मानसिक तनाव दूर होता है और माता का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
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वस्त्र और जूते-चप्पल: मौसम के अनुकूल नए वस्त्र, कंबल या जूते-चप्पल किसी निर्धन व्यक्ति को दान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है।
दान करते समय इन गलतियों से पूरी तरह बचें
ग्रहण के बाद दान करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है ताकि दान का कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
कभी भी बासी, खराब या बचा हुआ अन्न दान में न दें। दान की जाने वाली वस्तुएं हमेशा शुद्ध, ताजी और उपयोग के योग्य होनी चाहिए। दान देते समय मन में अहंकार या दिखावे का भाव बिल्कुल न लाएं, बल्कि कृतज्ञता और सेवा भाव से दान करें। दान हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके देना चाहिए। इसके अलावा ग्रहण काल के दौरान पका हुआ भोजन मोक्ष के बाद खाने या दान करने से बचना चाहिए; मोक्ष के बाद केवल ताजा भोजन बनाकर ही दान करना या स्वयं ग्रहण करना शास्त्र सम्मत है।
ग्रहण मोक्ष के उपरांत सही मुहूर्त, शुद्ध मन और सूर्यास्त के नियमों का पालन करते हुए किया गया दान जातक के जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकता, ग्रह दोष और रोगों का नाश करके अक्षय सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
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