क्या है ‘बैरीयर लेक’? नेपाल में जिससे आ रही तबाही की दूसरी किस्त, जानिए हिमालय के संकरे रास्तों में क्यों टाइम बम बन जाती हैं ये प्राकृतिक झीलें और कितना है खतरा

नेपाल के रसुवा और भोटेकोशी नदी बेसिन में हाल ही में आई प्रलयंकारी बाढ़ के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें हिमालय के उन ऊंचे शिखरों पर टिकी हैं, जहां तबाही का दूसरा दौर दस्तक देने के लिए तैयार बैठा है। वैज्ञानिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ लगातार एक शब्द का जिक्र कर रहे हैं—’बैरीयर लेक’ (Barrier Lake)। उपग्रह से मिले ताजा आंकड़ों के अनुसार, नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊपरी जलक्षेत्र में मलबे और पत्थरों के जमाव से एक और विशाल बैरियर लेक का निर्माण हो रहा है, जो खतरे के निशान से ऊपर ओवरफ्लो कर रही है। आम लोगों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह बैरियर लेक होती क्या है, यह कैसे बनती है और यह सामान्य झीलों या बांधों की तुलना में लाखों गुना अधिक खतरनाक क्यों मानी जाती है?

क्या होती है ‘बैरीयर लेक’ और कैसे बनती है पहाड़ों में यह मौत की झील?

भूविज्ञान (Geology) और जलविज्ञान (Hydrology) के अनुसार, बैरियर लेक (जिसे लैंडस्लाइड डैम्ड लेक या प्राकृतिक अवरोध झील भी कहा जाता है) कोई मानव-निर्मित जलाशय नहीं होती। जब किसी ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में भीषण भूस्खलन (Landslide), हिमस्खलन (Avalanche) या पहाड़ की पूरी चट्टान टूटकर नीचे गिरती है, तो वह किसी बहती हुई संकरी नदी या नाले के प्राकृतिक रास्ते को पूरी तरह पाट देती है।

लाखों टन मिट्टी, विशाल बोल्डर, गाद और बर्फ का यह विशाल मलबा नदी की घाटी में एक दीवार की तरह खड़ा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप नदी का पानी आगे बहना बंद हो जाता है और उस मलबे के अवरोध के ठीक पीछे भारी मात्रा में जल जमा होने लगता है। कुछ ही घंटों या दिनों में यह जमावड़ा एक विशाल झील का रूप ले लेता है। देखने में यह एक शांत झील जैसी प्रतीत होती है, लेकिन भूगर्भीय रूप से यह घाटी के सिर पर लटकती हुई मौत की तलवार होती है।

क्यों किसी टाइम बम जैसी घातक होती हैं ये प्राकृतिक झीलें?

इंजीनियरों द्वारा बनाए गए सामान्य कंक्रीट के बांधों में पानी के अतिरिक्त दबाव को बाहर निकालने के लिए स्पिलवे (Spillway), फ्लडगेट्स और मजबूत नींव होती है। इसके विपरीत, बैरियर लेक पूरी तरह से असुरक्षित और अस्थिर होती है। इसके अत्यधिक खतरनाक होने के तीन प्रमुख वैज्ञानिक कारण हैं:

पहला कारण है हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर (जल का दबाव)। जैसे-जैसे झील के पीछे अरबों लीटर पानी इकट्ठा होता है, मलबे की कच्ची दीवार पर पीछे से पड़ने वाला दबाव कई गुना बढ़ जाता है।

दूसरा कारण है ओवरटोपिंग (Overtopping)। जब झील का जलस्तर बढ़ते-बढ़ते मलबे के ऊपरी किनारे को पार कर जाता है, तो पानी उसके ऊपर से बहना शुरू करता है। बहता हुआ पानी मलबे की मिट्टी और पत्थरों को तेजी से काटना शुरू कर देता है।

तीसरा कारण है ‘पाइपिंग इफेक्ट’ (Piping Effect)। मलबे के भीतर मौजूद ढीले पत्थरों और रेत के बीच से पानी रिसकर आंतरिक सुरंगें बना देता है। जैसे ही आंतरिक ढांचा खोखला होता है, पूरा प्राकृतिक बांध ताश के पत्तों की तरह सेकंडों में ढह जाता है। इसे भूविज्ञान में ‘लैंडस्लाइड डैम आउटबर्स्ट फ्लड’ (LDOF) कहा जाता है।

‘लिक्विड कंक्रीट’ का सैलाब: सामान्य बाढ़ से कई गुना ज्यादा विनाशकारी

जब कोई बैरियर लेक टूटती है, तो उससे निकलने वाला प्रवाह केवल पानी की बाढ़ नहीं होता। यह अपने साथ मलबे के बांध की लाखों टन मिट्टी, भारी चट्टानें, पेड़ और कीचड़ लेकर दौड़ता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘हाइपर-कंसंट्रेटेड डिब्रिस फ्लो’ या आम बोलचाल में ‘लिक्विड कंक्रीट’ (तरल कंक्रीट) कहा जाता है।

इसका घनत्व सामान्य पानी की तुलना में तीन से चार गुना अधिक होता है। जब यह गाढ़ा और भारी मलबा 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से संकरी पहाड़ी घाटियों में आगे बढ़ता है, तो इसके रास्ते में आने वाले मजबूत आरसीसी पुल, सड़कें, बहुमंजिला इमारतें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स ऐसे टूटते हैं जैसे वे माचिस की तीलियों से बने हों। यही वजह है कि 26 अगस्त को रसुवा में 13 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स देखते ही देखते मलबे में समा गए थे।

नेपाल में क्यों मंडरा रहा है दूसरी तबाही का खतरा? ल्हेंदे खोला का जमीनी सच

नेपाल में हालिया तबाही के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि ल्हेंदे खोला (Lhende Khola) और भोटेकोशी नदी के उद्गम स्थल के पास सीमा पार तिब्बत क्षेत्र में अभी भी कई टन ढीला मलबा फंसा हुआ है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछली आपदा में मलबे का केवल एक हिस्सा बहा था, जबकि नदी के ऊपरी संकरे हिस्से में भूस्खलन का मुख्य ढांचा अभी भी नदी के बहाव को रोके हुए है। चीनी और नेपाली सैटेलाइट्स ने चेतावनी दी है कि ऊपरी हिस्से में लगभग 20 से 30 लाख घनमीटर पानी की एक नई बैरियर लेक बन चुकी है। यदि वहां फिर से कोई छोटा भूकंपीय झटका आता है या तापमान बढ़ने से ग्लेशियर की बर्फ पिघलती है, तो यह झील अचानक फट सकती है, जिससे रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में तबाही की ‘दूसरी किस्त’ आ सकती है।

भारत के सीमावर्ती इलाकों (बिहार और यूपी) पर क्या होगा इसका असर?

हिमालय से निकलने वाली नदियां किसी राजनीतिक सीमा को नहीं मानतीं। नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदियां आगे चलकर नारायणी नदी प्रणाली बनाती हैं, जो भारत के बिहार राज्य में गंडक नदी के रूप में प्रवेश करती है।

यदि नेपाल के ऊपरी कैचमेंट में स्थित बैरियर लेक टूटती है, तो इसका सीधा असर भारत के सीमावर्ती जिलों पर पड़ेगा। भारी मात्रा में पानी और गाद (सिल्ट) सीधे बिहार के पश्चिमी चंपारण (वाल्मीकि नगर बराज), पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान और उत्तर प्रदेश के कुशीनगर व महाराजगंज जिलों की तरफ बढ़ेगा। यही कारण है कि केंद्रीय जल आयोग (CWC) और स्थानीय प्रशासन ने गंडक बराज के सभी फाटकों की स्थिति पर 24 घंटे की निगरानी बैठा दी है।

बैरियर लेक से बचाव की वैज्ञानिक तकनीक और चुनौतियां

ऐसी खतरनाक प्राकृतिक झीलों से निपटने के लिए दुनिया भर में कुछ वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं, लेकिन अत्यधिक ऊंचाई और दुर्गम रास्तों के कारण यह बेहद चुनौतीपूर्ण होता है:

नियंत्रित जल निकासी (Controlled Siphoning): भारी पाइपों और पंपों के जरिए झील के फटने से पहले ही उसके पानी को धीरे-धीरे बाहर निकालना।

आर्टिफिशियल स्पिलवे का निर्माण: विस्फोटकों या भारी मशीनों की मदद से मलबे के एक किनारे पर सुरक्षित नाली (Spillway) बनाना ताकि पानी धीरे-धीरे बह सके और अचानक विस्फोट न हो।

रियल-टाइम अर्ली वार्निंग सेंसर: नदी के ऊपरी बहाव में स्वचालित सेंसर और सायरन लगाना, जो झील के टूटने पर तुरंत निचले इलाकों में चेतावनी अलार्म बजा सकें।

जब तक नेपाल, चीन और भारत मिलकर इन बैरियर लेक्स और ग्लेशियल झीलों की 24 घंटे उपग्रह और भूगर्भीय निगरानी नहीं करते, तब तक हिमालय की तलहटी में बसे करोड़ों लोगों पर यह अदृश्य खतरा हमेशा मंडराता रहेगा।

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