क्या ब्लड बैंक में रखा खून हमेशा रहता है सुरक्षित? जानिए रक्त के अलग-अलग घटकों की असली एक्सपायरी डेट

रक्तदान को महादान कहा जाता है क्योंकि आपके द्वारा दिया गया रक्त किसी गंभीर दुर्घटना, जटिल सर्जरी, कैंसर या थैलेसीमिया से जूझ रहे मरीज को नया जीवन दे सकता है। अक्सर जब लोग ब्लड बैंक में खून दान करते हैं या किसी आपात स्थिति में मरीज के लिए ब्लड यूनिट लेने जाते हैं, तो उनके मन में यह आम धारणा होती है कि ब्लड बैंक में रखे गए खून को कई महीनों या सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान की हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

दवाओं, खाने-पीने की चीजों और पैकेज्ड उत्पादों की तरह इंसानी खून की भी एक तय और बेहद सख्त ‘एक्सपायरी डेट’ (Expiry Date) होती है। वास्तव में दान किया गया रक्त एक ‘लिविंग टिश्यू’ (जीवित ऊतक) होता है, जिसके भीतर जीवित कोशिकाएं निरंतर श्वसन करती हैं और समय के साथ उनकी कार्यक्षमता समाप्त होने लगती है। आधुनिक ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन (रक्त संचरण विज्ञान) के अनुसार पूरे खून (Whole Blood) को सीधे चढ़ाने के बजाय अब उसके अलग-अलग घटकों—रेड ब्लड सेल्स (RBC), प्लेटलेट्स, प्लाज्मा और क्रायोप्रेसिपिटेट—को अलग-अलग करके सुरक्षित रखा जाता है। हर घटक की जीवन अवधि, तापमान और भंडारण की शर्तें एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न होती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस ब्लड कंपोनेंट की कितनी एक्सपायरी डेट होती है और ब्लड बैंक में इसे कैसे सुरक्षित रखा जाता है।

रक्त के अलग-अलग घटकों (Components) की एक्सपायरी डेट: देखें संपूर्ण चार्ट व वैज्ञानिक समयसीमा

जब कोई व्यक्ति 350 या 450 मिलीलीटर रक्तदान करता है, तो ब्लड बैंक की आधुनिक सेंट्रीफ्यूज मशीनों द्वारा उस रक्त को उसके प्रमुख घटकों में विभाजित कर दिया जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि एक यूनिट रक्त से तीन अलग-अलग मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

  • होल ब्लड (Whole Blood): 35 दिन (CPDA-1 एंटीकोगुलेंट के साथ)

  • पैक्ड रेड ब्लड सेल्स (PRBC / लाल रक्त कणिकाएं): 35 से 42 दिन (2°C से 6°C तापमान पर)

  • प्लेटलेट्स (Platelets / RDP व SDP): केवल 5 दिन (20°C से 24°C तापमान और निरंतर हिलते हुए)

  • फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (FFP / तरल प्लाज्मा): 1 वर्ष (-18°C या उससे कम तापमान पर डीप फ्रीजर में)

  • क्रायोप्रेसिपिटेट (Cryoprecipitate / क्लॉटिंग फैक्टर): 1 वर्ष (-18°C या उससे कम तापमान पर)

  • व्हाइट ब्लड सेल्स / ग्रैन्युलोसाइट्स (WBC): केवल 24 घंटे (1 दिन के भीतर उपयोग अनिवार्य)

प्लेटलेट्स की सबसे कम उम्र (सिर्फ 5 दिन): जानिए क्यों 24 घंटे हिलाना पड़ता है प्लेटलेट बैग?

ब्लड कंपोनेंट्स में सबसे नाजुक और सबसे कम शेल्फ लाइफ ‘प्लेटलेट्स’ (Platelets) की होती है। डेंगू, चिकनगुनिया, कैंसर कीमोथेरेपी या लिवर सिरोसिस के मरीजों के लिए प्लेटलेट्स संजीवनी का काम करते हैं, लेकिन इनकी एक्सपायरी डेट दान किए जाने के समय से मात्र 5 दिन (120 घंटे) की होती है।

  • रूम टेम्परेचर पर स्टोरेज: प्लेटलेट्स को फ्रिज में ठंडा नहीं किया जा सकता, क्योंकि कम तापमान (ठंडक) में प्लेटलेट्स की बनावट बदल जाती है और वे काम करना बंद कर देते हैं। इन्हें 20 से 24 डिग्री सेल्सियस के नियंत्रित कमरे के तापमान पर रखा जाता है।

  • प्लेटलेट एजिटेटर (Agitator) का इस्तेमाल: प्लेटलेट्स को एक खास मशीन में रखा जाता है जिसे ‘प्लेटलेट इनक्यूबेटर विद एजिटेटर’ कहते हैं। यह मशीन 24 घंटे प्लेटलेट के बैग को धीरे-धीरे दाएं-बाएं हिलाती रहती है। यदि बैग को हिलाना बंद कर दिया जाए, तो प्लेटलेट्स आपस में चिपककर थक्का (Clump) बना लेते हैं और खराब हो जाते हैं।

  • बैक्टीरियल इन्फेक्शन का खतरा: चूंकि प्लेटलेट्स सामान्य तापमान पर रहते हैं, इसलिए 5 दिन के बाद उनमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। यही कारण है कि दुनिया भर में 5 दिन बाद प्लेटलेट्स को एक्सपायर मानकर उपयोग से बाहर कर दिया जाता है।

लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) और होल ब्लड: 35 से 42 दिनों तक कैसे रहता है सुरक्षित?

एनीमिया, सड़क दुर्घटना में अत्यधिक खून बहने या प्रसव के दौरान मरीजों को सबसे ज्यादा जरूरत ‘रेड ब्लड सेल्स’ (RBCs) की होती है, जो शरीर के हर अंग तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करती हैं।

  • विशेष प्रिजर्वेटिव्स का कमाल: डोनेशन के दौरान ब्लड बैग में पहले से ही विशेष एंटीकोगुलेंट और पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जैसे CPDA-1 (सिट्रेट, फॉस्फेट, डेक्सट्रोज, एडेनिन) या SAGM (सलाइन, एडेनिन, ग्लूकोज, मैनिटोल)। ग्लूकोज रेड ब्लड सेल्स को जीवित रहने के लिए ऊर्जा देता है और सिट्रेट खून को जमने से रोकता है।

  • कोल्ड स्टोरेज तापमान: आरबीसी और होल ब्लड को 2°C से 6°C के कड़े तापमान पर ‘ब्लड बैंक रेफ्रिजरेटर’ में रखा जाता है।

  • 42 दिन बाद क्या होता है (स्टोरेज लीजन): 35 से 42 दिन बीत जाने के बाद लाल रक्त कोशिकाओं की झिल्ली (Cell Membrane) कमजोर होने लगती है, कोशिकाएं टूटने लगती हैं (Hemolysis) और खून में पोटेशियम व लैक्टिक एसिड का स्तर बढ़ जाता है। ऐसा रक्त यदि मरीज को चढ़ाया जाए, तो वह ऑक्सीजन का वहन नहीं कर पाता और मरीज की किडनी व दिल पर गंभीर दबाव डाल सकता है।

1 साल तक सुरक्षित रहता है प्लाज्मा (FFP) और क्रायोप्रेसिपिटेट: डीप फ्रीजर का तापमान और नियम

खून के पीले रंग के तरल हिस्से को ‘प्लाज्मा’ कहा जाता है, जिसमें पानी, प्रोटीन और रक्त का थक्का जमाने वाले जरूरी क्लॉटिंग फैक्टर्स (फैक्टर VIII, IX, फाइब्रिनोजेन आदि) पाए जाते हैं। बर्न (जलने के शिकार) मरीजों, हीमोफीलिया और अत्यधिक ब्लीडिंग के मामलों में प्लाज्मा चढ़ाया जाता है।

  • माइनस 30 से 80 डिग्री पर डीप फ्रीज: रक्तदान के 6 से 8 घंटे के भीतर प्लाज्मा को रक्त से अलग करके विशेष ‘डीप फ्रीजर’ में माइनस 18°C से माइनस 80°C तक के अत्यधिक कम तापमान पर तुरंत जमा दिया जाता है। इसे ‘फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा’ (FFP) कहते हैं।

  • 1 वर्ष की लंबी लाइफ: इस अति-न्यून तापमान पर प्लाज्मा में मौजूद क्लॉटिंग फैक्टर्स और प्रोटीन्स 1 साल (12 महीने) तक पूरी तरह सुरक्षित और सक्रिय रहते हैं।

  • थॉइंग (Thawing) के बाद 24 घंटे का नियम: जब किसी मरीज को प्लाज्मा चढ़ाना होता है, तब इसे ‘प्लाज्मा थॉअर’ मशीन में 37°C पर पिघलाया जाता है। एक बार पिघलने के बाद इसे 24 घंटे के भीतर मरीज को चढ़ाना अनिवार्य होता है, अन्यथा इसके क्लॉटिंग फैक्टर्स नष्ट हो जाते हैं।

एक्सपायर होने के बाद ब्लड का क्या होता है? जानिए बायो-मेडिकल वेस्ट निस्तारण और सुरक्षा मानक

ब्लड बैंक में ब्लड इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम द्वारा हर यूनिट की एक्सपायरी डेट पर 24 घंटे डिजिटल नजर रखी जाती है। एक्सपायरी डेट समाप्त होते ही वह ब्लड यूनिट सिस्टम में लॉक हो जाती है और उसे तुरंत सुरक्षित स्टोरेज से बाहर निकाल दिया जाता है।

  • कड़े बायो-मेडिकल वेस्ट नियम: एक्सपायर हो चुके खून को कभी भी साधारण नाली या खुले कचरे में नहीं फेंका जा सकता, क्योंकि इससे हेपेटाइटिस बी, सी या अन्य संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा रहता है।

  • ऑटोक्लेविंग और इनसिनरेशन: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और स्वास्थ्य मंत्रालय के नियमों के अनुसार एक्सपायर ब्लड यूनिट्स को पहले उच्च तापमान और दबाव पर ‘ऑटोक्लेव’ (स्टीम स्टेरलाइजेशन) या केमिकल डिसइन्फेक्शन द्वारा पूरी तरह कीटाणुरहित किया जाता है। इसके बाद इसे अधिकृत बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में ‘इंसिनरेशन’ (भस्मीकरण) के लिए भेजा जाता है।

  • नियमित स्वैच्छिक रक्तदान की आवश्यकता: चूंकि प्लेटलेट्स केवल 5 दिन और आरबीसी केवल 42 दिन ही टिकते हैं, इसलिए ब्लड बैंकों में कभी भी महीनों तक खून का स्थायी स्टॉक जमा नहीं किया जा सकता। यही वैज्ञानिक कारण है कि अस्पतालों और ब्लड बैंकों में रक्त की निरंतर उपलब्धता बनाए रखने के लिए नागरिकों द्वारा हर 3 महीने में ‘नियमित स्वैच्छिक रक्तदान’ की अपील की जाती है।

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