अयोध्या राम मंदिर में 4 सितंबर को मनेगी भव्य श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: रोहिणी नक्षत्र में संत और गृहस्थ एक साथ मनाएंगे कान्हा का जन्मोत्सव

प्रभु श्रीराम की पावन जन्मभूमि अयोध्या में इस वर्ष योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव यानी ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ अत्यंत अलौकिक और भव्य स्वरूप में मनाया जाएगा। अयोध्या के नवनिर्मित भव्य श्री रामजन्मभूमि मंदिर समेत नगर के सभी प्रमुख मठों, वैष्णव पीठों और मंदिरों में जन्माष्टमी का महापर्व आगामी 4 सितंबर को पूर्ण विधि-विधान के साथ आयोजित होगा। इस वर्ष पंचांग और ज्योतिषीय दृष्टि से अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को लेकर किसी भी प्रकार का संशय अथवा मतभेद नहीं है। ऐसे में कई वर्षों बाद यह सुखद संयोग बना है कि अलग-अलग परंपराओं से जुड़े वैष्णव साधु-संत और गृहस्थ जन एक ही दिन भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य दिवस श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाएंगे।

राम मंदिर और अयोध्या के सभी मठ-मंदिरों में एक ही दिन मनेगा जन्मोत्सव: तारीखों का संशय पूरी तरह समाप्त

आमतौर पर हर वर्ष स्मार्त और वैष्णव परंपरा के अनुसार जन्माष्टमी की तिथियों में एक दिन का अंतर देखने को मिलता था, जिससे श्रद्धालुओं के मन में व्रत की सही तिथि को लेकर भ्रम रहता था। लेकिन वर्ष 2026 में ग्रह-नक्षत्रों की ऐसी शास्त्रसम्मत युति बनी है कि तिथियों का यह संशय पूरी तरह समाप्त हो गया है।

अयोध्या की सनातन परंपरा में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण को एक ही परब्रह्म श्रीहरि विष्णु के दो दिव्य स्वरूप माना गया है। रामनगरी के प्रमुख संतों का कहना है कि जहां प्रभु राम मर्यादा के आदर्श हैं, वहीं भगवान कृष्ण लोक कल्याणकारी लीलाओं के स्वामी हैं। 4 सितंबर को समूची अयोध्या नगरी कृष्णमय वातावरण में डूबी नजर आएगी और राम मंदिर से लेकर कनक भवन, दशरथ महल और लक्ष्मण किला तक कान्हा के स्वागत में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे।

धार्मिक न्यास समिति की बैठक: सावन झूला उत्सव के बाद अब कान्हा के जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां शुरू

श्रावण मास के प्रसिद्ध झूला महोत्सव के संपन्न होने के बाद अब भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां पूरे जोरों पर हैं। अयोध्या का प्रतिनिधि और सर्वोच्च आस्था का केंद्र होने के कारण श्री रामजन्मभूमि मंदिर में जन्माष्टमी के भव्य आयोजन, सुरक्षा, दर्शन व्यवस्था और धार्मिक अनुष्ठानों की रूपरेखा तय करने के लिए धार्मिक न्यास समिति की महत्वपूर्ण बैठक सोमवार को आयोजित की जा रही है। इस बैठक में श्रद्धालुओं के सुगम दर्शन, प्रसाद वितरण और मध्यरात्रि अभिषेक की व्यवस्थाओं पर विस्तृत चर्चा होगी।

राम कुंज कथा मंडप के पीठाधीश्वर एवं न्यास समिति के वरिष्ठ सदस्य जगद्गुरु स्वामी डॉ. रामानंद दास जी महाराज ने पर्व की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारत अनादि काल से उत्सवों और आध्यात्मिक चेतना का देश रहा है। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पावन धरा है, जहां अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान विष्णु ने समय-समय पर विभिन्न स्वरूपों में अवतार लेकर लोक का मंगल और धर्म की रक्षा की है। इसलिए लोक द्वारा लोक कल्याण के लिए अवतरित देवाधिदेव का प्राकट्य उत्सव मनाना अत्यंत स्वाभाविक और सनातन धर्म का मूल कर्तव्य है।

पंचांग और ज्योतिषीय गणना: 3 और 4 सितंबर को अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि के चंद्रमा का महासंयोग

हनुमत संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त मूर्धन्य आचार्य हरफूल शास्त्री ने पंचांग की सूक्ष्म गणनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग और वृषभ राशि के चंद्रमा में मध्यरात्रि के समय हुआ था। इस वर्ष इन सभी तत्वों का सटीक संयोग 4 सितंबर को ही पूर्ण रूप से घटित हो रहा है।

  • अष्टमी तिथि का मान: अष्टमी तिथि का प्रारंभ 3 सितंबर (गुरुवार) की देर रात 01:33 बजे से हो जाएगा, जो 4 सितंबर (शुक्रवार) की रात 11:13 बजे तक प्रभावी रहेगी।

  • रोहिणी नक्षत्र का संचरण: 3 सितंबर की रात 12:46 बजे कृतिका नक्षत्र समाप्त होकर भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ हो जाएगा, जो 4 सितंबर की रात 11:12 बजे तक विद्यमान रहेगा।

  • चंद्रमा का गोचर: 3 सितंबर की सुबह 07:49 बजे चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में प्रवेश करेंगे और 5 सितंबर के पूर्वाह्न 10:22 बजे तक इसी राशि में संचार करेंगे।

  • 4 सितंबर को व्रत का शास्त्रसम्मत कारण: उदया तिथि के अनुसार 4 सितंबर को सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी और पूरे दिन-रात रोहिणी नक्षत्र व वृषभ राशि के चंद्रमा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों में इस दुर्लभ संयोग को ‘जयंती योग’ कहा गया है, जिसमें व्रत रखने से सहस्त्रों यज्ञों का पुण्यफल प्राप्त होता है।

मध्यरात्रि में मिथुन लग्न में होगा बाल गोपाल का प्राकट्य पूजन: जानें निशिता काल का सटीक समय

आचार्य हरफूल शास्त्री के अनुसार द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ठीक मध्यरात्रि 12:00 बजे हुआ था। 4 सितंबर की रात को बाल गोपाल के प्राकट्य पूजन के लिए मिथुन लग्न का अत्यंत कल्याणकारी समय प्राप्त हो रहा है:

  • मिथुन लग्न पूजन समय: 4 सितंबर की रात 11:50 बजे से देर रात 02:03 बजे तक

  • मध्यरात्रि प्राकट्य क्षण: ठीक रात 12:00 बजे

  • राम मंदिर में महाभिषेक विधान: राम जन्मभूमि मंदिर के गर्भगृह में रात ठीक 12:00 बजे शंखनाद, घंटा-घड़ियाल की ध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाल गोपाल का कामधेनु स्वरूप गाय के कच्चे दूध, दही, देसी घी, शहद और सरयू के पवित्र जल (पंचामृत) से महाभिषेक किया जाएगा।

  • दिव्य श्रृंगार व भोग: अभिषेक के उपरांत प्रभु को पीले पीताम्बरी वस्त्र, मोर मुकुट, वैजयंती माला और रत्नजड़ित बांसुरी अर्पित की जाएगी। इसके बाद ताजे माखन, मिश्री, धनिया पंजीरी और ऋतु फलों का नैवेद्य अर्पित कर महाआरती की जाएगी।

वैष्णव परंपरा के चार अनिवार्य महापर्व और अयोध्या की सांस्कृतिक गरिमा

रामानंद संप्रदाय और वैष्णव परंपरा के नियमों के अनुसार चार प्रमुख तिथियों को विशेष महापर्वों की श्रेणी में रखा गया है, जिन्हें सभी साधक, संत और आश्रम अनिवार्य रूप से मनाते हैं:

  • रामनवमी: चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी (भगवान श्रीराम का प्राकट्योत्सव)

  • जानकी नवमी: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी (माता सीता का प्राकट्य दिवस)

  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव)

  • हनुमान जयंती: वर्ष में दो बार—कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) एवं चैत्र पूर्णिमा

इन चारों पावन अवसरों पर अयोध्या के सभी संत-महात्मा चौबीस घंटे का निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखकर विशेष अनुष्ठान करते हैं और पूरे नगर में सोहर, पद-गायन तथा बधाई गीतों के साथ उत्सव मनाते हैं। धार्मिक न्यास समिति इन मुख्य पर्वों के साथ-साथ लोक परंपरा से जुड़े सभी पारंपरिक पर्वों को भी पूरी भव्यता के साथ आयोजित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

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