जब महर्षि पिप्पलाद ने शिवजी से प्रतिशोध में मांगा भयंकर वरदान, फिर कैसे अपने ही वर के चक्रव्यूह में फंस गए उनके प्राण

सनातन धर्म के 18 महापुराणों में शिव महापुराण का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। शिव पुराण में भगवान भोलेनाथ के अनेक अवतारों, उनके परम भक्तों और ब्रह्मांडीय न्याय के रहस्यों से जुड़ी गाथाएं वर्णित हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत रोमांचक और गूढ़ कथा महर्षि पिप्पलाद की है, जिन्हें स्वयं भगवान शिव का अंशावतार भी माना जाता है। पिप्पलाद का जन्म परम तपस्वी महर्षि दधीचि और उनकी पतिव्रता पत्नी सुवर्चा के घर हुआ था। जब देवराज इंद्र और देवताओं की रक्षा के लिए महर्षि दधीचि ने अपने जीते जी अपनी अस्थियों का दान कर दिया ताकि वृत्रासुर का संहार करने वाला वज्र बनाया जा सके, तब उनकी गर्भवती पत्नी सुवर्चा इस महावियोग को सहन न कर सकीं।

पति के देहत्याग के बाद माता सुवर्चा ने अपने गर्भ को योग शक्ति से सुरक्षित निकालकर पीपल (अश्वत्थ) के वृक्ष की कोटर में स्थापित कर दिया और स्वयं सती हो गईं। पीपल के वृक्ष और उसके फलों (पीपल के गूलर या पिप्पली) के रस से उस नवजात शिशु का पालन-पोषण हुआ। इसी कारण उस बालक का नाम ‘पिप्पलाद’ पड़ा। पिप्पलाद बचपन से ही घने जंगलों में बिना माता-पिता के स्नेह के बड़े हुए और पीपल के पत्तों व फलों को खाकर अपना जीवन यापन करते रहे।

अनाथ होने का सत्य जानकर जब क्रोध से भर उठे बालक पिप्पलाद

जैसे-जैसे पिप्पलाद बड़े हुए, उनके भीतर अपने कुल, माता-पिता और अपनी इस अनाथ अवस्था को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई। एक दिन वन में विचरण करते हुए उनकी भेंट देवर्षि नारद और अन्य उच्च कोटि के ऋषियों से हुई। पिप्पलाद ने आदरपूर्वक उनसे अपने माता-पिता के विषय में पूछा। तब ऋषियों ने उन्हें पूरी सत्यता बताई कि कैसे उनके पिता महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं और उनकी माता सती हो गई थीं।

यह सुनकर पिप्पलाद को गर्व तो हुआ, किंतु जब उन्होंने पूछा कि उनके माता-पिता के जीवन में ऐसा दारुण वियोग और अल्पायु मृत्यु का कष्ट किस कारण से आया और वे स्वयं अनाथ क्यों हुए? तब ज्योतिषीय गणना और ग्रहों के विधान का उल्लेख करते हुए उन्हें बताया गया कि यह सब ‘शनिदेव’ की दृष्टि और उनकी अशुभ ग्रह दशा (साढ़ेसाती व ढैय्या) के प्रभाव के कारण घटित हुआ था। यह सुनते ही युवा पिप्पलाद का हृदय प्रचंड क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जल उठा। उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि वे समस्त ग्रहों में क्रूर माने जाने वाले शनिदेव से अपने माता-पिता के वियोग का प्रतिशोध अवश्य लेंगे।

भगवान शिव की घोर तपस्या और प्रतिशोध में मांगा संहारक वरदान

शनिदेव और ग्रहों को दंडित करने की शक्ति केवल देवाधिदेव महादेव की कृपा से ही प्राप्त हो सकती थी। इसलिए बालक पिप्पलाद ने वन में एक पैर पर खड़े होकर भगवान आशुतोष की अत्यंत कठोर और अविचल तपस्या प्रारंभ की। वर्षों तक उन्होंने न कुछ खाया और न जल की एक बूंद ग्रहण की। उनकी कठोर तपस्या से दसों दिशाएं तपने लगीं और देवलोक में खलबली मच गई।

अंततः पिप्पलाद की अनन्य भक्ति और घोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष साक्षात प्रकट हुए। महादेव ने कहा, “हे वत्स पिप्पलाद! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांगो, क्या वरदान चाहते हो?”

क्रोध और बदले की भावना से भरे पिप्पलाद ने बिना सोचे-समझे कहा, “हे त्रिलोकीनाथ! यदि आप मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं, तो मुझे एक ऐसी संहारक शक्ति या दिव्य दृष्टि प्रदान कीजिए, जिससे मैं जिस पर भी दृष्टि डालूं या जिसे दंडित करना चाहूं, वह उसी क्षण भस्म होकर नष्ट हो जाए। मैं अपने माता-पिता के कष्टों के उत्तरदायी का समूल नाश करना चाहता हूँ।” भगवान शिव ने तथास्तु कह दिया और अंतर्ध्यान हो गए।

जब वरदान ही बन गया काल: पिप्पलाद के अपने ही प्राणों पर कैसे मंडराया संकट?

जैसे ही भगवान शिव ने पिप्पलाद को वह संहारक वरदान दिया, पिप्पलाद के शरीर और उनकी तीसरी दृष्टि से एक अत्यंत भयानक, प्रलयंकारी अग्निपिंड रूपी राक्षसी (कृत्या) उत्पन्न हुई। उस भयानक आकृति के मुंह से आग की लपटें निकल रही थीं और उसकी आंखें काल के समान दहक रही थीं। उस संहारक शक्ति ने गरजते हुए पिप्पलाद से पूछा, “मुझे आदेश दो, मैं किसे भस्म करूँ? मुझे किसकी बलि चाहिए?”

पिप्पलाद ने क्रोध में भरकर कहा, “जो मेरे जीवन के समस्त दुखों, अनाथ होने और मेरे माता-पिता की मृत्यु का कारण है, उसे तुरंत जलाकर राख कर दो!”

पिप्पलाद का यह आदेश सुनते ही वह संहारक कृत्या बिजली की गति से पिप्पलाद की ओर ही झपटी और उन्हें ही निगलने व भस्म करने के लिए आगे बढ़ी। यह देखकर पिप्पलाद स्तब्ध रह गए और भय से कांप उठे। उन्होंने पीछे हटते हुए चिल्लाकर कहा, “रुक जाओ! तुम यह क्या कर रही हो? मैंने तुम्हें अपने शत्रु का नाश करने का आदेश दिया है, तुम मुझ पर ही क्यों आक्रमण कर रही हो?”

उस संहारक शक्ति ने उत्तर दिया, “हे पिप्पलाद! सृष्टि के अटल नियमानुसार जीव के दुखों और प्रारब्ध का सबसे बड़ा कारण उसका अपना ही भौतिक शरीर और उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्म होते हैं। तुम्हारी आत्मा इस शरीर में बंधी है और तुम्हारे पूर्व जन्मों के कर्म ही तुम्हारे इस जन्म के वियोग का मूल कारण हैं। इसलिए मेरे संहार के नियम के तहत सबसे पहले तुम्हारा ही यह नश्वर शरीर भस्म होने के योग्य है!” अपने ही वरदान के इस आत्मघाती भंवर में फंसकर पिप्पलाद के प्राण संकट में पड़ गए और वे अपनी जान बचाने के लिए वन में भागने लगे।

भोलेनाथ का दिव्य प्राकट्य और कर्मफल के रहस्य का उद्घाटन

जब पिप्पलाद चारों ओर से अग्नि से घिर गए और उनके प्राण निकलने की नौबत आ गई, तब उन्होंने पूरी व्याकुलता और पश्चाताप के भाव से भगवान शिव को पुकारा। भक्त की पुकार सुनकर भगवान सदाशिव तुरंत प्रकट हुए और उन्होंने अपने त्रिशूल के तेज से उस संहारक कृत्या को शांत कर दिया।

भगवान शिव ने भयभीत पिप्पलाद को समझाते हुए कहा, “हे पिप्पलाद! बदला कभी भी न्याय नहीं हो सकता। तुमने क्रोध में आकर बिना कर्म के गूढ़ रहस्य को समझे संहारक वरदान मांग लिया। शनिदेव किसी के शत्रु या मित्र नहीं हैं, वे तो केवल मेरे द्वारा स्थापित सृष्टि के कर्मफल विधान के निष्पक्ष न्यायाधीश हैं। वे केवल वही फल देते हैं जो मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मों द्वारा संचित करता है। तुम्हारे पूज्य पिता दधीचि ने जो देहत्याग किया, वह किसी ग्रह के द्वेष का परिणाम नहीं था, बल्कि वह सृष्टि के उद्धार के लिए किया गया परम पावन महायज्ञ था। उनके इस त्याग से उनका नाम युगों-युगों तक अमर हो गया।”

महादेव के इन ज्ञानोपदेशों को सुनकर पिप्पलाद का अज्ञान और प्रतिशोध का पर्दा हट गया। उन्होंने शिवजी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और वरदान के अहंकार से मुक्त हुए।

शनिदेव और पिप्पलाद का महासंग्राम: क्यों लंगड़ाकर चलते हैं कर्मफल दाता?

शिवजी के समझाने के बाद भी पिप्पलाद के मन में यह प्रश्न था कि क्या न्याय के नाम पर अबोध बालकों को भी प्रताड़ित किया जाना उचित है? पिप्पलाद ने शनिदेव को ललकारा। पौराणिक कथा के अनुसार, जब शनिदेव पिप्पलाद के सामने आए, तो पिप्पलाद ने अपने तपोबल और ब्रह्मदंड से शनिदेव पर भीषण प्रहार कर दिया।

पिप्पलाद का ब्रह्मदंड सीधे जाकर शनिदेव के पैरों पर लगा, जिससे शनिदेव का एक पैर टूट गया और वे मूर्छित होकर गिर पड़े। तब सभी देवताओं और स्वयं भगवान शिव ने हस्तक्षेप किया। पिप्पलाद के तपोबल से प्रभावित होकर और अपनी मर्यादा की रक्षा करते हुए शनिदेव ने पिप्पलाद से क्षमा याचना की और कहा कि वे केवल अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे। उस प्रहार के बाद से ही शनिदेव मंद गति से और लंगड़ाकर चलने लगे, जिसके कारण उन्हें ज्योतिष में ‘शनैश्चर’ (धीरे चलने वाला) भी कहा जाता है।

शनि पीड़ा से मुक्ति: पिप्पलाद और पीपल के वृक्ष का यह पौराणिक रक्षा कवच

युद्ध की समाप्ति पर महर्षि पिप्पलाद ने शनिदेव के समक्ष तीन महत्वपूर्ण शर्तें रखीं, जिन्हें शनिदेव ने सहर्ष स्वीकार किया:

पहली शर्त यह थी कि 16 वर्ष (कुछ ग्रंथों में 12 वर्ष) तक की आयु के किसी भी बालक या अबोध बच्चे पर शनि की वक्र दृष्टि, साढ़ेसाती या ढैय्या का कोई भी अनिष्टकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि बाल्यकाल निष्पाप और अज्ञानता का काल होता है।

दूसरी शर्त यह थी कि जो भी मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष की सेवा करेगा, उसमें जल अर्पित करेगा और संध्या समय दीपक जलाएगा, उसे शनिदेव कभी भी असहनीय कष्ट नहीं देंगे, क्योंकि पीपल के वृक्ष ने ही अनाथ पिप्पलाद को जीवनदान दिया था।

तीसरी शर्त यह थी कि जो व्यक्ति ‘पिप्पलाद कृत शनि स्तोत्र’ या ‘शिव पंचाक्षर मंत्र’ का पाठ करेगा, उसकी कुंडली में स्थित शनि के सभी अशुभ दोष शांत हो जाएंगे और शनिदेव उसके रक्षक बन जाएंगे।

इस प्रकार महर्षि पिप्पलाद आगे चलकर वैदिक काल के महान तत्ववेत्ता और ‘प्रश्नोपनिषद्’ के मुख्य ऋषि बने। शिव महापुराण की यह प्रेरक कथा हमें यह सिखाती है कि क्रोध में लिया गया कोई भी निर्णय स्वयं के विनाश का कारण बन सकता है और प्रकृति का कर्मफल विधान इतना अचूक है कि उससे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।

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