श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का सबसे बड़ा व्यावहारिक दर्शन (Philosophy) है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मानव जीवन के हर पहलू जैसे—कर्म, जीवन-मरण, प्रारब्ध, सुख और दुख के बारे में विस्तार से मार्गदर्शन किया है। महाभारत के युद्ध मैदान में जब अर्जुन अपनों के मोह में फंसकर कर्तव्य से भटक रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें एक परम ज्ञानी और संतुलित व्यक्ति के लक्षण बताए थे। गीता के इस अद्भुत कॉन्सेप्ट को ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा गया है। आज के तनावपूर्ण दौर में, जहां इंसान छोटी-छोटी खुशियों में हवा में उड़ने लगता है और जरा से दुख में डिप्रेशन में चला जाता है, वहां स्थितप्रज्ञ का सिद्धांत जीवन जीने की सबसे बड़ी कला सिखाता है।
गीता का वह अमर श्लोक, जो सिखाता है जीवन का असली बैलेंस
महाभारत के दूसरे अध्याय के 56वें श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन के पूछने पर स्थिर बुद्धि यानी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा कुछ इस प्रकार देते हैं:
श्लोक का सरल अर्थ:
जिस व्यक्ति का मन दुखों के आने पर भी परेशान या विचलित नहीं होता है, जिसे सुखों को भोगने की कोई लालसा (इच्छा) नहीं होती है, और जो पूरी तरह से राग (आसक्ति/मोह), भय (डर) तथा क्रोध (गुस्से) से मुक्त हो चुका है—ऐसा आत्मज्ञानी मननशील मनुष्य ही ‘स्थितप्रज्ञ’ या स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
आखिर ‘स्थितप्रज्ञ’ का असली मतलब क्या है?
अगर साधारण शब्दों में समझें, तो स्थितप्रज्ञ दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘स्थित’ (स्थिर/टिका हुआ) और ‘प्रज्ञा’ (बुद्धि/चेतना)। अर्थात, ऐसा व्यक्ति जिसकी बुद्धि विपरीत से विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी एकदम शांत और स्थिर बनी रहती है।
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दुख से बेअसर: जब जीवन में कोई बड़ी मुसीबत या दुख आता है, तो ऐसा व्यक्ति अंदर से टूटता नहीं है, न ही अपनी किस्मत को कोसता है।
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सुख में निरपेक्ष: जब जीवन में बड़ी सफलता, धन या सुख आता है, तो वह अहंकार में नहीं डूबता और न ही उस सुख के खत्म होने के डर में जीता है।
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भौतिक वस्तुओं से दूरी: ऐसे व्यक्ति को संसार की चमक-धड़क या भौतिक वस्तुओं के प्रति कोई अंधा मोह (Attachment) नहीं होता। यदि उसकी कोई इच्छा पूरी न भी हो, तो उसके मन में कोई गिला-शिकवा या शिकायत नहीं होती।
श्रीकृष्ण के अनुसार स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के 3 मुख्य गुण
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थिर बुद्धि वाले इंसानों की व्याख्या करने के लिए तीन बेहद महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया है, जिन्हें हर इंसान को अपने जीवन में उतारना चाहिए:
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वीतराग (मोह से मुक्ति): ऐसे लोग जो संसार के झूठे सुखों और भौतिक ऐश्वर्यों की अंधी दौड़ या लालसा को पूरी तरह त्याग देते हैं। वे कर्म तो करते हैं, लेकिन उसके फल से चिपकते नहीं हैं।
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वीतभय (भयमुक्ति): ऐसे मनुष्यों के मन में किसी भी बात को लेकर कोई डर नहीं होता। वे जानते हैं कि आत्मा अमर है और जो कुछ भी हो रहा है, वह प्रकृति का नियम है। इसलिए वे पूरी तरह निर्भय होकर जीते हैं।
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वीतक्रोध (क्रोध रहित): जब किसी व्यक्ति की कोई इच्छा पूरी नहीं होती, तो उसे गुस्सा आता है। लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इच्छाओं से ऊपर उठ चुका होता है, इसलिए वह पूरी तरह से शांत और क्रोध रहित होता है।
मन का भटकाव ही है सारे दुखों की जड़
यह एक कड़वा सच है कि जब हमारा मन बाहरी सुखों की लालसा करता है और वे सुख नहीं मिलते, तो इंसान गहरे दुख में डूब जाता है। हमारा मन लगातार संसार के विषय-भोगों के पीछे भागता रहता है। लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति अपनी उच्च आध्यात्मिक चेतना में लीन रहता है। उसके मन में लालच, गुस्सा, ईर्ष्या या शत्रुता जैसी नकारात्मक भावनाएं कभी प्रवेश नहीं कर पातीं। उसे न तो आज की कोई समस्या डरा पाती है और न ही कल का कोई अनजाना डर विचलित कर पाता है। जब मन इन दोनों चिंताओं को छोड़ देता है, तभी व्यक्ति सही मायने में ‘स्थितप्रज्ञ’ बनकर जीवन की हर जंग को जीत लेता है।
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