एक नए जीवन का दुनिया में आना प्रकृति के सबसे खूबसूरत और विस्मयकारी चमत्कारों में से एक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक वयस्क इंसान पानी के भीतर कुछ मिनट भी बिना सांस लिए नहीं रह सकता, तो मां के गर्भ में पूरे 9 महीने तक पानी (Amniotic Fluid) से घिरे रहने के बावजूद नवजात शिशु कैसे जीवित रहता है? वह वहां कैसे सांस लेता है और उसे ऑक्सीजन कहां से मिलती है? विज्ञान के दृष्टिकोण से, गर्भ में पल रहा शिशु हमारी तरह अपनी नाक या फेफड़ों से सीधे हवा नहीं खींचता। इसके बजाय, प्रकृति ने गर्भ के भीतर एक अत्यंत उन्नत और जटिल जैविक प्रणाली (Biological System) विकसित की है, जो जन्म से पहले ही शिशु को सुरक्षित रूप से ऑक्सीजन की आपूर्ति करती है। आइए इस अद्भुत वैज्ञानिक प्रक्रिया के बारे में विस्तार से समझते हैं।
1. प्लेसेंटा (गर्भनाल): मां और बच्चे के बीच जीवन का पहला पुल
गर्भावस्था के दौरान मां के गर्भाशय के भीतर ‘प्लेसेंटा’ (Placenta) नाम का एक अस्थायी अंग विकसित होता है। यह प्लेसेंटा मां और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच एक मजबूत जीवन रेखा या सेतु का कार्य करता है। इसका मुख्य काम मां के शरीर से ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्वों को फिल्टर करके शिशु तक पहुंचाना है। इसके साथ ही, यह शिशु के शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों (Waste Products) और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालने का भी काम करता है।
2. अम्बिलिकल कॉर्ड (नाभि रज्जू): ऑक्सीजन और पोषण का मुख्य मार्ग
प्लेसेंटा सीधे एक बेहद खास नस के जरिए शिशु की नाभि से जुड़ा होता है, जिसे ‘अम्बिलिकल कॉर्ड’ (Umbilical Cord) या नाभि रज्जू कहा जाता है। इस कॉर्ड के भीतर विशेष रक्त वाहिकाएं (Blood Vessels) होती हैं। जब मां सांस लेती है, तो ऑक्सीजन उसके फेफड़ों से होते हुए उसके खून में घुल जाती है। इसके बाद, यही ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त अम्बिलिकल कॉर्ड के माध्यम से सीधे भ्रूण के दिल और पूरे शरीर में पहुंचता है।
3. मां और बच्चे का खून कभी आपस में नहीं मिलता
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे दिलचस्प और हैरान कर देने वाला वैज्ञानिक तथ्य यह है कि गर्भावस्था के दौरान मां और उसके होने वाले बच्चे का रक्त (Blood) कभी भी सीधे तौर पर आपस में मिक्स नहीं होता है। प्लेसेंटा की महीन परतें एक बेहद ही स्मार्ट फिल्टर की तरह काम करती हैं, जो मां के रक्त से केवल ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को सोखकर बच्चे के रक्तप्रवाह में ट्रांसफर करती हैं।
4. फीटल हीमोग्लोबिन (Fetal Hemoglobin): विज्ञान का एक अनोखा चमत्कार
यहां विज्ञान की एक और अद्भुत भूमिका सामने आती है। गर्भ में पल रहे शिशु के शरीर में एक विशेष प्रकार का हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जिसे ‘फीटल हीमोग्लोबिन’ ($HbF$) कहते हैं। यह हीमोग्लोबिन हम वयस्कों में पाए जाने वाले सामान्य हीमोग्लोबिन ($HbA$) की तुलना में ऑक्सीजन को अपनी ओर खींचने और बांधने में कई गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। इसी विशेष खूबी के कारण, शिशु मां के रक्त से बहुत ही आसानी और कुशलता के साथ ऑक्सीजन को अपने भीतर अवशोषित (Absorb) कर लेता है।
5. हवा नहीं, बल्कि पानी के अंदर ही ‘सांस’ लेने की प्रैक्टिस करता है शिशु
भले ही गर्भ में शिशु के फेफड़ों में हवा न जाती हो, लेकिन वह जन्म के बाद बाहरी दुनिया में जीने की तैयारी गर्भ के भीतर ही शुरू कर देता है। गर्भावस्था के 10वें से 12वें सप्ताह (First Trimester) के आसपास, भ्रूण अपने फेफड़ों की मांसपेशियों को सक्रिय करना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में वह अपनी नाक और मुंह के जरिए आसपास मौजूद एम्नियोटिक द्रव (गर्भनाल द्रव) को ही अंदर खींचता है और बाहर निकालता है। यह एक तरह की प्राकृतिक कसरत होती है, जिससे बच्चे के फेफड़ों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और फेफड़े पूरी तरह विकसित हो पाते हैं।
6. जन्म के बाद पहली सांस और बच्चे के रोने का असली वैज्ञानिक कारण
9 महीने तक गर्भ के भीतर पानी में रहने के कारण शिशु के फेफड़े पूरी तरह से संकुचित (Compressed) और तरल पदार्थ से भरे होते हैं। जब बच्चे का जन्म होता है और वह पहली बार बाहरी वातावरण की सूखी हवा के संपर्क में आता है, तो वह तेजी से रोता है। बच्चे का वह पहला रोना वास्तव में उसकी पहली वास्तविक सांस होती है। रोने के साथ ही उसके फेफड़ों में जमा सारा तरल पदार्थ बाहर निकल जाता है, फेफड़ों की छोटी-छोटी वायु थैलियां (Alveoli) खुल जाती हैं और उनमें हवा भर जाती है। इसी पल बच्चे की अपनी स्वतंत्र श्वसन प्रणाली (Respiratory System) जीवन में पहली बार सक्रिय होती है और अम्बिलिकल कॉर्ड का काम हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।
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