नई दिल्ली/लखनऊ: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के सबसे बड़े और अखंड सौभाग्य के पर्व ‘वट सावित्री व्रत’ को लेकर इस साल तारीखों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। आमतौर पर अधिकांश लोग ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को यह व्रत रखते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश (UP), बिहार और मध्य प्रदेश (MP) के कई हिस्सों में पारंपरिक रूप से यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की विशेष तिथियों पर रखा जाता है।
इस साल अधिकमास (मलमास) लगने के कारण शुक्ल पक्षीय वट सावित्री व्रत काफी लेट हो गया है। अगर आपके परिवार में भी शुक्ल पक्ष में बरगद (वट) की पूजा करने की परंपरा है, तो आपके लिए दो बेहद शुभ तिथियां सामने आई हैं, जिनमें सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला उपवास रखकर मंगल कामना करेंगी।
क्यों और कैसे लेट हुआ वट सावित्री व्रत?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या के ठीक बाद से इस साल अधिकमास शुरू हो गया था, जो 15 जून तक चला। अधिकमास के कारण बीच का पूरा एक महीना ठहर गया, जिससे मुख्य ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की शुरुआत अब हुई है। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला यह व्रत इस बार जून के आखिरी हफ्ते तक पहुंच गया है। अलग-अलग लोक परंपराओं के अनुसार इसे बड़ साते (वट सप्तमी) और वट पूर्णिमा के दिन मनाया जाएगा।
नोट कर लें ‘बड़ साते’ और ‘वट पूर्णिमा’ की सही तारीख व मुहूर्त
-
बड़ साते (वट सप्तमी): शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ‘बड़ साते’ कहा जाता है। इस साल यह व्रत आगामी 21 जून 2026, रविवार को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं बड़ (बरगद) के पेड़ की पूजा करेंगी।
-
वट पूर्णिमा व्रत: ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को रखा जाने वाला यह महाव्रत 29 जून 2026, सोमवार को मनाया जाएगा।
शुभ अमृत मुहूर्त: 29 जून को वट पूर्णिमा के दिन पूजा का सबसे उत्तम ‘अमृत मुहूर्त’ सुबह 05:26 बजे से लेकर सुबह 07:00 बजे तक रहेगा। इस दौरान की गई पूजा का फल अक्षय माना जाता है।
अखंड सौभाग्य के इस व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि और महत्व
वट सावित्री व्रत के दिन पौराणिक पतिव्रता नारी सती सावित्री और उनके पति सत्यवान की कथा सुनी जाती है। इस व्रत की मुख्य विधि इस प्रकार है:
-
स्नान और श्रृंगार: व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करती हैं और नए वस्त्र पहनकर पूरा सोलह श्रृंगार करती हैं।
-
वट वृक्ष की परिक्रमा: महिलाएं पूजा की थाली लेकर बरगद (वट) के पेड़ के पास जाती हैं। वहां जल, रोली, अक्षत और मौसमी फल (जैसे आम, लीची, खरबूजा) अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत या कलावा लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है।
-
बायना निकालना: इस पावन दिन पर सुहागिनें निर्जला रहकर उपवास रखती हैं। पूजा संपन्न होने के बाद घर की बुजुर्ग महिलाओं या सास के पैर छूकर उन्हें ‘बायना’ (वस्त्र, मिठाई और सुहाग सामग्री) देकर आशीर्वाद लिया जाता है।
The News 11 – ताज़ा हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया