
दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक ताजा बयान अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में चर्चा का विषय बन गया है। वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा था कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधित होने की आशंका के कारण कच्चे तेल के दाम चढ़ रहे हैं। हालांकि, ट्रंप ने इस धारणा को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया है कि तेल की कीमतों में उछाल के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य जिम्मेदार नहीं है। उनके मुताबिक, वहां से तेल का निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर जारी है। ट्रंप ने कीमतों में हो रही बढ़ोतरी का सीधा ठीकरा रूस-यूक्रेन युद्ध और तेल शोधन (रिफाइनिंग) से जुड़ी घरेलू व वैश्विक समस्याओं पर फोड़ा है।
रूसी रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों को ठहराया मुख्य कारण
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि यूक्रेन द्वारा रूस के ऊर्जा बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे लगातार ड्रोन व मिसाइल हमलों ने वैश्विक बाजार में ईंधन की आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल और डीजल निर्यातकों में से एक है। यूक्रेन के सटीक हमलों के चलते रूस की कई प्रमुख रिफाइनरियों की उत्पादन क्षमता ठप हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में शोधित ईंधन (रिफाइंड फ्यूल) की किल्लत बढ़ गई है। ट्रंप का कहना है कि जब तक रिफाइनिंग कैपेसिटी सामान्य नहीं होगी, तब तक कच्चे तेल के प्रवाह के बावजूद तैयार पेट्रोल और डीजल की कीमतें दबाव में रहेंगी।
अमेरिका की बंद पड़ी रिफाइनरियों और घरेलू राजनीति पर निशाना
अंतरराष्ट्रीय कारणों के साथ-साथ ट्रंप ने अमेरिका की आंतरिक ऊर्जा नीतियों को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले राज्यों (Blue States) में बंद हुई घरेलू रिफाइनरियों को ईंधन की महंगाई का एक बड़ा कारण बताया। उनका आरोप है कि पर्यावरण से जुड़े कड़े नियमों और नीतियों के कारण कई पारंपरिक रिफाइनरियां बंद हो गईं, जिसके चलते अमेरिका अपनी खुद की कच्ची तेल उत्पादन क्षमता का पूरा फायदा पेट्रोल पंपों तक नहीं पहुंचा पा रहा है। आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर बढ़ती महंगाई एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है, और ट्रंप इस स्थिति के लिए पिछली नीतियों और विपक्षी राज्यों के प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक आपूर्ति का गणित
रणनीतिक दृष्टि से हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील ऊर्जा चोकपॉइंट है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आवाजाही होती है। मध्य पूर्व में तनाव के चलते बाजार विश्लेषक लगातार इसके बंद होने या नौवहन में रुकावट की चेतावनी दे रहे थे। लेकिन ट्रंप ने स्पष्ट किया कि जलमार्ग से भारी संख्या में तेल के बैरल बिना किसी बड़ी रुकावट के बाहर आ रहे हैं। इस तरह, उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि समस्या कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की उपलब्धता में नहीं, बल्कि उसे पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल में बदलने वाली वैश्विक रिफाइनरियों की सीमित क्षमता में है।
भारत और वैश्विक उपभोक्ताओं पर इसका क्या होगा असर
कच्चे तेल और ईंधन की ऊंची कीमतों का सीधा असर भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है, जो अपनी कुल तेल खपत का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करती हैं। यदि रिफाइनरियों की कमी और यूक्रेन-रूस संघर्ष के कारण ईंधन उत्पाद महंगे बने रहते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के साथ-साथ तैयार ईंधन के आयात की लागत भी बढ़ेगी। इससे माल ढुलाई और आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक रिफाइनरी क्षमता में सुधार नहीं होता और भू-राजनीतिक संघर्ष थमता नहीं, तब तक ईंधन बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।
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