
श्रावण मास का पावन महीना चल रहा है और शिव भक्तों के लिए यह समय अत्यंत खास होता है। सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त 2026 को पड़ रहा है। इस विशेष दिन पर विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन सोमवार के दिन व्रत कथा पढ़ने या सुनने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस बार सावन के दूसरे सोमवार पर मिथुन राशि में चंद्रमा और मंगल की युति से बेहद शुभ ‘मahalakshmi yog’ (महालक्ष्मी योग) का निर्माण हो रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
संतान प्राप्ति के लिए साहूकार की कथा और भगवान शिव का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक अत्यंत धनवान साहूकार रहता था। उसके पास किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह और उसकी पत्नी हमेशा दुखी रहते थे। पुत्र प्राप्ति की कामना के लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था, शिवजी की पूजा करता था और शाम के समय मंदिर में जाकर दीपक जलाता था। साहूकार के इस सच्चे भक्ति भाव को देखकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभु, यह साहूकार आपका परम भक्त है, आपकी हर, सोमवार को पूजा करता है, आपको इसकी मनोकामना अवश्य पूरी करनी चाहिए।
भगवान शिव ने माता पार्वती को समझाया कि यह संसार कर्मक्षेत्र है और मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है। परंतु माता पार्वती के बार-बार आग्रह करने पर भगवान शिव ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया। शिवजी ने कहा कि इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसे पुत्र का वरदान देता हूं, लेकिन वह बालक केवल 12 वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा और इसके बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी।
12 वर्ष की आयु और काशी यात्रा का रहस्य
भगवान शिव और माता पार्वती का यह संवाद साहूकार छिपकर सुन रहा था। बात जानने के बाद भी साहूकार न तो अधिक प्रसन्न हुआ और न ही दुखी हुआ, बल्कि वह पहले की तरह ही नियमित रूप से भगवान शिव की पूजा और व्रत करता रहा। कुछ समय बाद साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। जब बालक 11 वर्ष का हुआ, तो उसकी माता ने विवाह की बात कही, लेकिन साहूकार ने कहा कि अभी विवाह नहीं होगा, बल्कि वह अपने पुत्र को काशी में विद्या अध्ययन के लिए भेजेगा।
साहूकार ने अपने भांजे के साथ बेटे को बहुत सारा धन देकर काशी के लिए विदा किया और रास्ते में जगह-जगह यज्ञ कराने तथा ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देने को कहा। रास्ते में एक नगर आया जहाँ के राजा की पुत्री का विवाह था, लेकिन जिस राजकुमार से विवाह तय था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने जब साहूकार के सुंदर पुत्र को देखा, तो लालच में आकर साहूकार के बेटे को ही घोड़ी पर बैठाकर राजकुमारी से उसका विवाह संपन्न करवा दिया। विवाह के बाद साहूकार के पुत्र ने राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम जाओगी वह काना है और मैं काशी पढ़ने जा रहा हूं।
पुनर्जीवन और सोमवार व्रत का अद्भुत फल
उधर काशी पहुँचने पर जब लड़के की आयु 12 वर्ष पूरी हुई, तो यज्ञ के दौरान उसकी अचानक तबीयत बिगड़ गई और कुछ ही पलों में उसके प्राण निकल गए। मामा ने विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त कर अपने भांजे के शव के पास विलाप शुरू किया। उसी मार्ग से गुजर रहे भगवान शिव और माता पार्वती ने जब रोने की आवाज सुनी, तो वे वहां प्रकट हुए। माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने अपनी कृपा बरसाई और बालक को पुनः जीवित कर दिया।
शिक्षा समाप्त होने के बाद जब वह लड़का अपनी पत्नी राजकुमारी और मामा के साथ वापस अपने शहर लौटा, तो माता-पिता ने खुशी से अपने प्राण त्यागने का संकल्प पूरा किया और सकुशल पुत्र पाकर धन्य हो गए। धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त सावन सोमवार के दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखता है और इस पौराणिक कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं और अंत में उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।
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