पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक भूचाल से गुजर रही है। लगातार तीन बार सत्ता का सुख भोगने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने 25 साल के इतिहास के सबसे भीषण और गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है। लेकिन इस बगावत की जो अंदरूनी कहानी (Inside Story) निकलकर सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है।
पार्टी के तमाम बागी सांसदों और विधायकों का साफ कहना है कि उनकी लड़ाई तृणमूल सुप्रीमों ममता बनर्जी से नहीं है। विद्रोही नेताओं के गुस्से का मुख्य केंद्र ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) हैं। वरिष्ठ नेताओं ने अभिषेक पर ‘अहंकारी रवैया’, ‘भाई-भतीजावाद’ और बाहरी चुनावी एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के इशारों पर अनुभवी नेताओं को अपमानित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
वरिष्ठ नेताओं को किनारे करना और ‘कल्याण बनर्जी’ का खुला आक्रोश
TMC के भीतर पुराने बनाम नए की जंग काफी समय से सुलग रही थी, जो अब पूरी तरह भड़क चुकी है। पार्टी के सबसे वरिष्ठ और कद्दावर नेताओं में से एक कल्याण बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने अपने स्वाभिमान को चोट पहुंचने की बात कहते हुए कहा:
कल्याण बनर्जी का तीखा बयान: “मैंने वकालत और राजनीति के इस पेशे में अपने जीवन के 45 साल बिताए हैं। अभिषेक बनर्जी की इतनी हैसियत नहीं है कि वे मुझे अपमानित या डिक्टेट कर सकें। राजनीति और अनुभव में मैं उनसे बहुत सीनियर हूं। उन्होंने (अभिषेक) पूरी पार्टी को बर्बाद करके रख दिया है। अगर दीदी (ममता बनर्जी) को अभिषेक पर ही निर्भर रहना है, तो वे उनके साथ रहें, मुझे छोड़ दें। लेकिन, अगर वे अभिषेक के इस अहंकारी रवैये से अलग होना चाहती हैं, तो मैं आज भी दीदी के साथ खड़ा हूं।”
बगावत के 3 मुख्य कारण: क्यों विद्रोही बने टीएमसी के दिग्गज?
पार्टी के भीतर विद्रोह की आग सुलगने और सांसदों-विधायकों के सामूहिक इस्तीफे के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण बताए जा रहे हैं:
1. कॉरपोरेट एजेंसी I-PAC का अत्यधिक हस्तक्षेप
अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के भीतर सांगठनिक बदलावों और टिकट बंटवारे के लिए बाहरी पेशेवर एजेंसी आई-पैक (I-PAC) पर अत्यधिक भरोसा जताया। पुराने नेताओं का आरोप है कि आई-पैक के युवा और अनुभवहीन लड़के जमीन पर 30-40 साल से पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने वाले वरिष्ठ नेताओं को आदेश देते थे, जिससे पार्टी के भीतर जमीनी कार्यकर्ताओं की भारी उपेक्षा हुई और असंतोष चरम पर पहुंच गया।
2. ‘अराजक शासन’ और बेलगाम भ्रष्टाचार
राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा देने वाले दिग्गज नेता सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी के भीतर फैले भ्रष्टाचार की पोल खोली है। उन्होंने आरजी कर अस्पताल कांड का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सत्ता कुछ नेताओं के सिर पर चढ़कर बोल रही है। राय ने तीखा हमला करते हुए कहा:
“जिन ईमानदार कार्यकर्ताओं ने मार खाकर और मेहनत से यह पार्टी खड़ी की, उन्हें कोने में धकेल दिया गया। आज दलाल, चोर और अपराधी आगे आ चुके हैं। बंगाल के गांवों में आज सबसे बड़ा और आलीशान घर (जिसमें स्विमिंग पूल और विदेशी पक्षी हैं) किसी आम जनता का नहीं, बल्कि टीएमसी के पंचायत नेता का होता है।”
3. ‘हस्ताक्षर जालसाजी’ और तानाशाही का आरोप
इस पूरे विद्रोह की तात्कालिक चिंगारी तब भड़की जब शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने वाले एक आंतरिक प्रस्ताव पर ‘हस्ताक्षर जालसाजी’ (Signature Forgery) का आरोप लगा। बागी नेताओं का सीधा शक अभिषेक बनर्जी पर है, क्योंकि यह प्रस्ताव उन्हीं के दफ्तर से भेजा गया था। इसके बाद 3 जून 2026 को विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्रनाथ बोस ने 60 बागी विधायकों को विधानसभा में एक प्रमुख विपक्षी समूह के रूप में मान्यता दे दी, जिसका नेतृत्व अब निष्कासित नेता ऋतब्रता बनर्जी कर रहे हैं।
विधानसभा से लेकर संसद तक दरार
अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी का स्वाभाविक राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किए जाने की जिद का नतीजा यह हुआ कि आज टीएमसी हर मोर्चे पर बिखर रही है:
-
संसद में टूट: लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसद एनडीए (NDA) को समर्थन देने वाले पत्र पर दस्तखत कर चुके हैं। यदि यह दावा कानूनी रूप से सही साबित हुआ, तो बागी गुट असली टीएमसी के नाम और सिंबल पर दावा ठोक देगा।
-
राज्यसभा खाली: इसी हफ्ते सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक जैसे कद्दावर राज्यसभा सांसदों ने ममता का साथ छोड़ दिया है।
-
कांग्रेस में विलय की अटकलें: अपनी पार्टी को ताश के पत्तों की तरह ढहता देख ममता बनर्जी ने नई दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की है, जिससे टीएमसी के कांग्रेस में विलय (Merger) की अटकलें भी राजनीतिक गलियारों में तेज हैं।
The News 11 – ताज़ा हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया