
भारतीय राजनीतिक गलियारों और खासकर दक्षिण भारत की सियासत से इस वक्त एक बहुत ही बड़ी और दिलचस्प खबर सामने आ रही है। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के प्रमुख वाई. एस. जगन मोहन रेड्डी (Jagan Mohan Reddy) के हालिया बयानों ने राष्ट्रीय राजनीति में नए कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। पिछले साल 2024 के लोकसभा चुनावों में करारी हार का सामना करने और भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा किनारा किए जाने के बाद अब जगन मोहन रेड्डी अपने राजनीतिक भविष्य के लिए नए विकल्पों की तलाश में जुट गए हैं। इसी बीच, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के चयन से जुड़े कानून पर उनके पछतावे वाले बयान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। क्या 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDI गठबंधन (INDIA Bloc) का हिस्सा बन सकते हैं? आइए विस्तार से विश्लेषण करते हैं कि आंध्र प्रदेश की राजनीति में इस समय क्या नए समीकरण बन रहे हैं और YSRCP की आगामी रणनीति क्या हो सकती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के कानून पर जगन मोहन रेड्डी का पछतावा, दिए बड़े संकेत
हाल ही में YSRCP प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने एक सार्वजनिक मंच पर बड़ा बयान देते हुए स्वीकार किया कि साल 2023 में संसद में लाए गए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के चयन से संबंधित एनडीए सरकार के कानून का समर्थन करना उनकी एक बड़ी ‘गलती’ थी, जिसे लेकर उन्हें अब पछतावा हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न तो मुख्य चुनाव आयुक्त और न ही राज्य चुनाव आयुक्त (SEC) की नियुक्ति सीधे तौर पर सत्ताधारी पार्टी द्वारा की जानी चाहिए।
जगन का यह मानना है कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जाना चाहिए तथा इन तीनों को ही मतदान का पूरा अधिकार होना चाहिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जगन मोहन रेड्डी का यह बयान सिर्फ एक साधारण प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि इसके जरिए उन्होंने अपनी उस पुरानी छवि को तोड़ने की कोशिश की है जिसके तहत उन पर हमेशा से एनडीए सरकार के प्रति ‘नरम’ रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। 2019 से 2024 के बीच संसद के दोनों सदनों में जगन की पार्टी ने कई मौकों पर मोदी सरकार के बिलों का समर्थन किया था, लेकिन 2024 के चुनावों में बीजेपी ने टीडीपी (TDP) के चंद्रबाबू नायडू के साथ हाथ मिला लिया और जगन को दरकिनार कर दिया। अब इस राजनीतिक धोखे के बाद जगन अपने लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं।
YSRCP और कांग्रेस के बीच पुरानी कड़वाहट: क्या संभव है कोई नया राजनीतिक गठबंधन
यदि भविष्य में जगन मोहन रेड्डी के INDI गठबंधन में शामिल होने की बात सामने आती है, तो इसके सामने सबसे बड़ी और ऐतिहासिक बाधा कांग्रेस पार्टी के साथ उनका पुराना और कड़वा इतिहास होगा। इस राजनीतिक अलगाव की नींव साल 2010 में पड़ी थी, जब उनके पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी की एक आकस्मिक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।
पिता के निधन के बाद जब जगन समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी, तब कांग्रेस आलाकमान ने के. रोसैया को कमान सौंप दी थी। इसके अलावा, जगन द्वारा निकाली गई ‘ओदारपु यात्रा’ को लेकर भी कांग्रेस नेतृत्व से उनके मतभेद गहरे हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने 29 नवंबर 2010 को सोनिया गांधी को खुला पत्र लिखकर कांग्रेस से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी YSRCP की स्थापना की और 2019 के विधानसभा चुनावों में 151 सीटों का ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सत्ता पर कब्जा जमाया। हालांकि, 2024 के चुनाव में उनकी पार्टी सिमटकर सिर्फ 11 सीटों पर आ गई। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी आंध्र प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है और इसी रणनीति के तहत जगन की बहन वाई. एस. शर्मीला को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में दोनों दलों के लिए एक मंच पर आना लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो सकता है।
2029 लोकसभा चुनाव: जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस दोनों के लिए ‘करो या मरो’ की चुनौती
अब राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें सीधे तौर पर 2029 के लोकसभा चुनावों पर टिकी हुई हैं, जो जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस दोनों के लिए अस्तित्व की बड़ी लड़ाई साबित होने वाले हैं। राज्य की राजनीति में टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और बीजेपी गठबंधन पूरी तरह से मजबूत स्थिति में हैं, और वे दक्षिणी राज्यों के बीच अपनी पैठ को और अधिक गहरा करने में लगे हुए हैं।
ऐसी परिस्थिति में राजनीतिक जानकारों का यह मानना है कि यदि वाईएसआरसीपी और कांग्रेस के बीच कोई गठबंधन या वैचारिक तालमेल बनता है, तो यह टीडीपी और बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष खड़ा कर सकता है। हालांकि, क्षेत्रीय दलों का यह इतिहास रहा है कि वे आसानी से अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक जमीन छोड़ना नहीं चाहते हैं। यदि दोनों दलों का पूर्ण विलय संभव नहीं हो पाता है, तो चुनाव पूर्व किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सीट-शेयरिंग का विकल्प ही एकमात्र रास्ता बचता है। इसके अलावा, कांग्रेस के पास तीसरा विकल्प यह है कि वह चंद्रबाबू नायडू सरकार के खिलाफ जमीनी स्तर पर मौजूद असंतोष को भुनाते हुए अपने पुराने वफादार वोटबैंक को वापस अपने पाले में खींचे।
आंध्र प्रदेश के आगामी राजनीतिक समीकरण और भविष्य की दिशा
आंध्र प्रदेश की सियासत में फिलहाल उथल-पुथल का दौर जारी है। जगन मोहन रेड्डी द्वारा केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए जा रहे सवाल इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की दिशा में सोच-विचार कर रहे हैं।
भले ही कांग्रेस और जगन के रास्ते अतीत की कड़वाहट के कारण अलग रहे हों, लेकिन राजनीति में ‘कोई भी दुश्मन या दोस्त स्थायी नहीं होता’। 2029 के चुनावी अखाड़े में टीडीपी और बीजेपी के मजबूत रथ को रोकने के लिए यदि क्षेत्रीय क्षत्रप और राष्ट्रीय दल अपनी पुरानी दूरियों को मिटाने में कामयाब होते हैं, तो दक्षिण भारत के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल सकते हैं। देखना यह होगा कि जगन मोहन रेड्डी अपनी अगली चाल क्या चलते हैं और क्या INDI गठबंधन में उनकी एंट्री का रास्ता साफ हो पाता है या नहीं।
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