
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मध्य एशियाई राष्ट्र ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक दौरा करने जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के उच्चस्तरीय सूत्रों और कूटनीतिक हलकों से मिली जानकारी के अनुसार, रक्षा मंत्री वहां शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के काउंसिल ऑफ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट (CHG) की 25वीं बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। वर्तमान में जब यूरेशियाई क्षेत्र में नई भू-राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल रही है और वैश्विक सुरक्षा ढांचा नए दौर से गुजर रहा है, तब भारत के शीर्ष नेतृत्व का यह दुशांबे दौरा कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद खास माना जा रहा है। मध्य एशिया के साथ भारत की ऐतिहासिक और सामरिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्री का यह कदम नई दिल्ली की ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति को एक नई गति देने का काम करेगा। दुशांबे पहुंचने पर उनका औपचारिक स्वागत किया जाएगा, जिसके बाद वे एससीओ सदस्य देशों के अपने समकक्ष नेताओं के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ता बैठकों के लंबे दौर में हिस्सा लेंगे।
इस बहुप्रतीक्षित शिखर सम्मेलन के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एजेंडे में सबसे ऊपर क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सख्त अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का मुद्दा रहेगा। भारत लंबे समय से यह मांग उठाता रहा है कि सीमा पार आतंकवाद, उग्रवाद और कट्टरपंथ को पनाह देने वाले ताकतों के खिलाफ एससीओ के सभी सदस्य देशों को एक सुर में बिना किसी दोहरे मापदंड के कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। दुशांबे बैठक में भारत एससीओ के ‘रीजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर’ (RATS) की भूमिका को और अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने पर जोर देगा। अफगानिस्तान में उपजी मौजूदा परिस्थितियों, वहां से संचालित होने वाले आपराधिक नेटवर्क और मध्य एशियाई देशों की सीमाओं पर मंडराते सुरक्षा खतरों को लेकर भी सम्मेलन में विस्तृत चर्चा होगी। भारत यह स्पष्ट संदेश देगा कि यूरेशियाई महाद्वीप में टिकाऊ शांति, विकास और आर्थिक समृद्धि तभी संभव है जब पूरा क्षेत्र आतंकवाद और उग्रवाद के नेटवर्क से पूरी तरह मुक्त हो।
सामरिक सुरक्षा के साथ-साथ दुशांबे दौरे में भारत के लिए दूसरा सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा मध्य एशियाई देशों के साथ सीधी और अबाध कनेक्टिविटी स्थापित करना है। चूंकि पाकिस्तान भारत को मध्य एशिया तक सीधा जमीनी रास्ता देने में बाधाएं उत्पन्न करता रहा है, इसलिए भारत ईरान के रणनीतिक चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए ताजिकिस्तान और अन्य मध्य एशियाई गणराज्यों तक अपनी पहुंच को मजबूत कर रहा है। सम्मेलन में राजनाथ सिंह चाबहार पोर्ट के व्यावसायिक उपयोग को बढ़ाने, व्यापारिक लॉजिस्टिक्स को सरल बनाने और सीमा पार व्यापारिक बाधाओं को दूर करने की पुरजोर वकालत करेंगे। इसके अलावा, भारत ताजिकिस्तान और पड़ोसी देशों के साथ अपनी आर्थिक, तकनीकी, ऊर्जा और रक्षा साझेदारी को और गहरा करने के लिए ठोस समझौतों की रूपरेखा पेश करेगा। ताजिकिस्तान में भारत के सामरिक हित लंबे समय से जुड़े हुए हैं, ऐसे में यह दौरा द्विपक्षीय व्यापारिक व रक्षा सहयोग को एक नए शिखर पर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगा।
एससीओ के इस मुख्य मंच के इतर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रूस, ताजिकिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देशों के वरिष्ठ नेताओं व रक्षा मंत्रियों के साथ उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकें (Bilateral Meetings) भी करेंगे। इन मुलाकातों में रक्षा सामग्री के सह-उत्पादन, संयुक्त सैन्य अभ्यासों, सैन्य तकनीक हस्तांतरण और साइबर सुरक्षा जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में परस्पर सहयोग बढ़ाने पर आम सहमति बनने की पूरी संभावना है। यूरेशियाई क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत का यह कदम क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के दृष्टिकोण से बेहद अहम है। भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकारों का मानना है कि ताजिकिस्तान के साथ भारत के विशेष संबंध न केवल मध्य एशिया में भारत के प्रभाव को मजबूत करते हैं बल्कि पामीर क्षेत्र के करीब भारत की सामरिक उपस्थिति को भी मजबूती प्रदान करते हैं। यह दौरा भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए बहुपक्षीय वैश्विक मंचों पर एक निर्णायक और प्रभावी वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
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