सनातन परंपरा में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस पवित्र व्रत को रखता है और इसकी पौराणिक कथा सुनता है, उसके कई जन्मों के पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताते हुए इसे संसार रूपी सागर में डूबे प्राणियों के लिए एक तारणहार नौका के समान बताया है।
शिव पूजा में भूल और कुबेर का भयंकर श्राप
पौराणिक कथा के अनुसार, अलकापुरी नगरी में राजाधिराज कुबेर रहते थे, जो परम शिवभक्त थे। उनके महल में हेममाली नाम का एक यक्ष सेवक था, जिसका कार्य रोज मानसरोवर से भगवान शिव की पूजा के लिए ताजे फूल लाना था। हेममाली की पत्नी विशशालाक्षी अत्यंत रूपवान थी। एक दिन हेममाली अपनी पत्नी के प्रेम पास में ऐसा बंधा कि फूल लाने के बाद राजा कुबेर के पास जाने के बजाय अपने घर पर ही रुक गया। दोपहर तक पूजा के फूलों का इंतजार करने के बाद क्रोधित कुबेर ने जब सेवकों से वजह पूछी, तो उन्हें पूरी सच्चाई पता चली। कुबेर ने इसे भगवान शिव की अवहेलना मानकर हेममाली को कोढ़ी होने और अपनी प्रियतमा से दूर होने का भयंकर श्राप दे दिया।
मुनि मार्कण्डेय की शरण और मुक्ति का उपाय
श्राप के प्रभाव से हेममाली तत्काल अलकापुरी से गिर पड़ा और उसका पूरा शरीर भयंकर कोढ़ से पीड़ित हो गया। हालांकि, पूर्व में की गई शिव पूजा के प्रभाव से उसकी याददाश्त सुरक्षित रही। वह तड़पता हुआ पर्वतों में श्रेष्ठ मेरु पर्वत पर पहुंचा, जहाँ उसकी भेंट परम तपस्वी मुनि मार्कण्डेय से हुई। हेममाली ने मुनि के चरणों में गिरकर अपनी भूल और कुबेर के श्राप की पूरी व्यथा सच-सच सुना दी। हेममाली की सत्यवादिता से प्रसन्न होकर ऋषि मार्कण्डेय ने उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का पूर्ण विधि-विधान से व्रत रखने की सलाह दी।
योगिनी एकादशी व्रत का अद्भुत फल
ऋषि के कथनानुसार हेममाली ने पूरी श्रद्धा के साथ योगिनी एकादशी का उत्तम व्रत और पूजन किया। इस महान व्रत के पुण्य प्रताप से उसका कोढ़ पूरी तरह समाप्त हो गया और उसका शरीर पहले की भांति दिव्य और सुंदर हो गया। बाद में वह अपनी पत्नी के साथ पुनः सुखी जीवन व्यतीत करने लगा। शास्त्रों में वर्णित है कि 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वह फल मात्र एक योगिनी एकादशी का व्रत रखने से प्राप्त हो जाता है। इस कथा को पढ़ने और सुनने मात्र से भी वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
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