आजकल की आधुनिक जीवनशैली, काम के बढ़ते दबाव और असंतुलित खान-पान का सीधा असर पुरुषों के स्वास्थ्य पर देखने को मिल रहा है। हाल के वर्षों में पुरुषों में शुक्राणुओं की कमी (Low Sperm Count) की समस्या तेजी से बढ़ी है। आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि जो पुरुष सिगरेट, शराब या तंबाकू का सेवन करते हैं, सिर्फ उन्हीं की फर्टिलिटी प्रभावित होती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान और डॉक्टरों का मानना है कि असलियत इससे कहीं ज्यादा अलग और चौंकाने वाली है।
हमारी कुछ ऐसी दैनिक आदतें और छिपी हुई बीमारियां हैं, जो शुक्राणुओं की संख्या को तेजी से घटा सकती हैं। अगर समय रहते इन पर ध्यान न दिया जाए, तो आगे चलकर पिता बनने के सपने में बड़ी रुकावट आ सकती है। आइए जानते हैं स्पर्म काउंट कम होने के असली कारण, लक्षण और इससे बचाव के वैज्ञानिक उपाय।
स्पर्म काउंट कम होने का क्या मतलब है? समझिए मेडिकल टर्म्स
चिकित्सा विज्ञान में वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या के कम या बिल्कुल न होने को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है:
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ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia): विश्व प्रसिद्ध हेल्थ वेबसाइट ‘मेयो क्लिनिक’ (Mayo Clinic) की रिपोर्ट के अनुसार, यदि एक मिलीलीटर वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 1.5 करोड़ (15 Million) से कम हो, तो इसे सामान्य से कम यानी ओलिगोस्पर्मिया माना जाता है।
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एज़ोस्पर्मिया (Azoospermia): यह वह स्थिति है जब वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या पूरी तरह से शून्य (Zero Sperm Count) हो जाती है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण (Natural Conception) की संभावना न के बराबर हो जाती है।
कैसे पहचानें? ये हैं मुख्य लक्षण
कम स्पर्म काउंट का सबसे प्रमुख और बड़ा लक्षण यह है कि बिना किसी गर्भनिरोधक (Contraceptive) के एक साल या उससे अधिक समय तक प्रयास करने के बाद भी पार्टनर गर्भधारण नहीं कर पाती। कई मामलों में पुरुषों में इसका कोई अन्य बाहरी या स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। हालांकि, कुछ पुरुषों को नीचे दिए गए लक्षण महसूस हो सकते हैं:
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हार्मोनल असंतुलन के कारण यौन इच्छा (Libido) में अचानक कमी आना।
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स्तंभन दोष (Erectile Dysfunction/नपुंसकता) की समस्या होना।
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अंडकोष (Testicles) के आसपास दर्द, भारीपन, सूजन या किसी छोटी गांठ का महसूस होना।
धूम्रपान के अलावा स्पर्म काउंट घटने के 7 बड़े कारण
सिगरेट और तंबाकू निश्चित रूप से प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन इनके अलावा निम्नलिखित कारण भी स्पर्म काउंट को शून्य कर सकते हैं:
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मोटापा और बढ़ा हुआ वजन: अत्यधिक वजन बढ़ने से शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर गिर जाता है और एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ जाता है, जो स्पर्म प्रोडक्शन को रोकता है।
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क्रोनिक स्ट्रेस (लगातार तनाव): अत्यधिक मानसिक तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ाता है, जो प्रजनन क्षमता के लिए जिम्मेदार हार्मोन्स के कार्य में बाधा डालता है।
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वैरिकोसेल (Varicocele): यह अंडकोष की नसों में सूजन आने की एक आम बीमारी है, जिससे वहां का तापमान बढ़ जाता है और शुक्राणु नष्ट होने लगते हैं।
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हार्मोनल असंतुलन: थायरॉइड (Thyroid) की समस्याएं, पिट्यूटरी ग्रंथि या अधिवृक्क ग्रंथि में खराबी के कारण शुक्राणुओं का निर्माण प्रभावित होता है।
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संक्रमण (Infections): कुछ गंभीर यौन संचारित रोग (STDs) या अंडकोष में होने वाले संक्रमण स्पर्म के उत्पादन और उनके मार्ग को ब्लॉक कर सकते हैं।
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दवाइयों का साइड इफेक्ट: लंबे समय तक ली जाने वाली कुछ एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉयड या अन्य हैवी मेडिकेशन्स भी स्पर्म काउंट को नुकसान पहुंचाती हैं।
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शराब और नशीली दवाएं: अत्यधिक शराब का सेवन और ड्रग्स का इस्तेमाल सीधे तौर पर शुक्राणुओं की गुणवत्ता और गतिशीलता को खराब कर देता है।
क्या यह समस्या पूरी तरह ठीक हो सकती है?
पुरुषों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि शुक्राणुओं की संख्या कम होने या शून्य होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वे कभी पिता नहीं बन सकते (यानी यह स्थायी बांझपन नहीं है)। चिकित्सा विज्ञान के आधुनिक दौर में सही समय पर जांच और इलाज से इसे ठीक किया जा सकता है:
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जीवनशैली में सुधार: संतुलित पोषक तत्वों से भरपूर आहार लेना, डेली रूटीन में नियमित व्यायाम को शामिल करना और वजन को कंट्रोल में रखना बेहद मददगार साबित होता है।
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तनाव प्रबंधन: पर्याप्त नींद लेना और योग या मेडिटेशन के जरिए तनाव के स्तर को कम करना स्पर्म की गुणवत्ता को सुधारता है।
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आधुनिक चिकित्सा उपचार: आज के समय में डॉक्टरों की सलाह पर सही दवाओं, हार्मोनल थेरेपी और गंभीर मामलों में आईवीएफ (IVF) या आईयूआई (IUI) जैसे आधुनिक असिस्टेड रिप्रोडक्टिव ट्रीटमेंट्स की मदद से माता-पिता बनने का सुख आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
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