ज्ञानवापी विवाद पर मध्यस्थता वार्ता पूरी तरह फेल, हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने कोर्ट में कहा- ‘मेरिट पर ही होगा आर-पार का फैसला’

वाराणसी। सुप्रीम कोर्ट की अनूठी पहल पर ज्ञानवापी-शृंगार गौरी विवाद को आपसी सुलह-समझौते और बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिशों को एक बड़ा झटका लगा है। मंगलवार को वाराणसी जिला न्यायालय परिसर में आयोजित की गई हाई-प्रोफाइल मध्यस्थता वार्ता पूरी तरह विफल हो गई। जिला अदालत के मनोरंजन कक्ष में लगभग 35 मिनट तक चली इस बैठक में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने साफ कर दिया कि यह मामला बेहद संवेदनशील और करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए मध्यस्थ (Mediation) के जरिए इसका समाधान संभव नहीं है। दोनों पक्षों ने सर्वसम्मति से कहा कि अब इस मुकदमे का निस्तारण अदालत में मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर ही होगा।

35 मिनट की बैठक में आमने-सामने आए दोनों पक्ष, मध्यस्थता से साफ इनकार

मंगलवार दोपहर निर्धारित समय (1:30 PM) पर ज्ञानवापी विवाद से जुड़ी चार महत्वपूर्ण फाइलों (पत्रावलियों) के साथ दोनों पक्षों के पक्षकार और अधिवक्ता कोर्ट परिसर पहुंचे। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव राजीव मुकुल पांडेय ने जैसे ही फाइलें पेश कीं, वैसे ही तीन सदस्यीय विशेष समिति ने सुनवाई शुरू की।

समिति के सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए पूछा कि क्या इस मामले में आपसी समझौते की कोई गुंजाइश है? इस पर दोनों पक्षों के वकीलों ने कड़ा रुख अपनाया:

  • हिंदू पक्ष का दावा: हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर त्रिपाठी, सुभाषनंदन और मदन मोहन सहित अन्य वकीलों ने दोटूक कहा, “पूरा ज्ञानवापी परिसर हमारा (हिंदू पक्ष का) है। वहां सदियों से हमारे आराध्य के साक्ष्य मौजूद हैं। इस ऐतिहासिक सत्य पर हमें कोई मध्यस्थता या समझौता मंजूर नहीं है।”

  • मुस्लिम पक्ष का रुख: अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकीलों (मो. मुमताज, रईस अहमद और तौहीद खान) ने भी मध्यस्थता का विरोध किया। उन्होंने कहा, “यह प्रकरण अति संवेदनशील है और पूरे समाज की नजरें इस पर टिकी हैं। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस पर अग्रिम आदेशों और नए वाद दाखिल करने पर रोक लगा रखी है, इसलिए मध्यस्थता की कोई संभावना नहीं बचती। इसका फैसला अदालत से ही आना चाहिए।”

मध्यस्थता बैठक में शामिल रही शीर्ष न्यायिक समिति

इस महत्वपूर्ण वार्ता को संपन्न कराने और दोनों पक्षों की राय जानने के लिए एक उच्चस्तरीय न्यायिक पैनल मौजूद था। बैठक की देखरेख और प्रशासनिक ढांचे का विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

समिति के मुख्य सदस्य (Judicial Panel) उपस्थित विशेष नामित जज (SC Nominated) वर्तमान कानूनी स्थिति (Current Status)
आलोक कुमार (अपर जिला जज – षष्ठम्) नेहा सिंह (सिविल जज सीनियर डिविजन – प्रथम) दोनों पक्षों की असहमति के बाद मध्यस्थता प्रक्रिया को बंद कर दिया गया है।
नितिन सिंह (सिविल जज जूनियर डिविजन) संध्या श्रीवास्तव (अपर जिला जज – प्रथम) विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव अब इस पूरी विफलता की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेंगे।
महेंद्र प्रसाद पांडेय (वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व DG) — अब जिला अदालत में नियमित रूप से मुकदमों की सुनवाई मेरिट पर आगे बढ़ेगी।

अब सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी रिपोर्ट, कोर्ट में जारी रहेगी लड़ाई

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव राजीव मुकुल पांडेय ने दोनों पक्षों के तर्कों और दावों को सुनने के बाद आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया कि मध्यस्थता की मेज पर कोई सहमति नहीं बन सकी है। इस बैठक में आए सभी विचारों, आपत्तियों और दोनों पक्षों के बयानों से देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) को लिखित रूप में अवगत कराया जाएगा। इस विफलता के बाद अब ज्ञानवापी परिसर से जुड़े सभी मुकदमों की लड़ाई पूरी तरह से कानूनी रूप से अदालतों में ही लड़ी जाएगी, जहां पूर्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और व्यासजी के तहखाने की पूजा जैसे अहम मोड़ आ चुके हैं।

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