
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को न्यायिक मोर्चे पर एक बेहद बड़ी और महत्वपूर्ण राहत मिली है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिखों और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर राहुल गांधी द्वारा दिए गए एक कथित विवादित बयान के मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए वाराणसी की निचली अदालत के उस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने पहले ही इस याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे सुनाते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अर्जी को कानूनी आधार पर पूरी तरह खारिज कर दिया।
#1 जानिए क्या था पूरा मामला और राहुल गांधी के किस बयान पर मचा था बवाल?
यह पूरा विवाद सितंबर 2024 में राहुल गांधी के अमेरिका दौरे के दौरान उनके द्वारा दिए गए एक सार्वजनिक भाषण से शुरू हुआ था। वाशिंगटन डीसी स्थित वर्जीनिया में भारतीय समुदाय (NRI) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा पर टिप्पणी की थी। अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि “भारत में असली लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को कड़ा पहनने और पगड़ी बांधने की आजादी मिलेगी या नहीं? क्या एक सिख भारत के गुरुद्वारे में निर्भीक होकर जा पाएगा?” राहुल गांधी का कहना था कि यह लड़ाई सिर्फ सिखों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सभी धर्मों की आजादी और अस्तित्व से जुड़ी हुई है।
#1 याचिकाकर्ता ने लगाए थे गंभीर आरोप, निचली अदालत के फैसले को दी थी चुनौती
राहुल गांधी के इस बयान के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के वाराणसी में नागेश्वर मिश्रा व अन्य द्वारा एक याचिका निचली अदालत के समक्ष दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि नेता प्रतिपक्ष के इस तरह के बयानों से अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि धूमिल हुई है और ऐसा संदेश गया है जैसे भारत में सिख समुदाय के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है या वे असुरक्षित माहौल में रह रहे हैं। याचिका में राहुल गांधी पर देश में नफरत फैलाने, विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव पैदा करने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश की गुहार लगाई गई थी। हालांकि, वाराणसी की संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कानूनी तथ्यों के आधार पर याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
#1 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) पर गहन विचार-विमर्श के बाद अपना अंतिम निर्णय सुनाया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट माना कि वाराणसी की अधीनस्थ अदालत द्वारा याचिका को खारिज करने का दिया गया फैसला पूरी तरह वैधानिक और न्यायसंगत था। अदालत ने पाया कि याचिका में ऐसा कोई ठोस आधार या अपराध का प्रथम दृष्टया (Prima Facie) प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसके आधार पर आपराधिक मामला दर्ज करने या पुलिस जांच के निर्देश देने का कोई औचित्य बनता हो। कोर्ट द्वारा याचिका निरस्त किए जाने के बाद अब इस मामले में राहुल गांधी के खिलाफ किसी भी तरह की आपराधिक या पुलिस कार्रवाई का रास्ता बंद हो गया है।
#1 फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल और कानूनी राहत
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस अहम फैसले के बाद कांग्रेस खेमे में खुशी और राहत की लहर है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि नेता प्रतिपक्ष देश में समावेशी सोच और सभी वर्गों के अधिकारों की बात कर रहे थे, जिसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था और अदालत के फैसले ने सच्चाई को सामने ला दिया है। वहीं, याचिकाकर्ता पक्ष के लिए यह फैसला कानूनी तौर पर एक बड़ा झटका माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए इस फैसले से स्पष्ट होता है कि राजनीतिक बयानों पर बेवजह मुकदमेबाजी और एफआईआर की अर्जियों पर न्यायपालिका बेहद सख्त और सतर्क रुख अपना रही है।
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