
प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के शिक्षा क्षेत्र में फर्जी दस्तावेजों और कूटरचित व्यवस्था के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करने वाले तत्वों के खिलाफ एक बार फिर बेहद सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है। बागपत जिले के शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज में कथित रूप से फर्जी तरीके से हुई सहायक शिक्षक की नियुक्ति से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने याची सुभाष चंद्र त्यागी की विशेष अपील को सिरे से खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि फर्जी नियुक्ति के नाम पर सरकारी खजाने की लूट की छूट किसी भी सूरत में नहीं दी जा सकती। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जब किसी नियुक्ति की आधारशिला ही धोखाधड़ी और छलावे पर टिकी हो, तो कानून के तहत ऐसा कृत्य शुरू से ही अवैध और शून्य होता है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में वैधानिक और नैतिक सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए दोहराया कि “धोखाधड़ी और न्याय कभी भी एक साथ नहीं चल सकते”। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार केवल एक आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि यह एक ‘सार्वजनिक न्यास’ (Public Trust) है। इसमें किया गया कोई भी छल या धोखाधड़ी भारतीय संविधान द्वारा दिए गए समानता और पारदर्शिता के मौलिक सिद्धांतों पर सीधा और गंभीर आघात करती है। जब कोई अयोग्य व्यक्ति फर्जी अभिलेखों के जरिए पद हासिल करता है, तो वह न केवल सरकार के खजाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि किसी योग्य और जरूरतमंद अभ्यर्थी का हक भी छीनता है। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने अपीलकर्ता को किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत देने से इंकार कर दिया।
बागपत के शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज का फर्जीवाड़ा: जानिए कैसे सामने आई धोखाधड़ी की परतें
बागपत जिले के शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज से जुड़ा यह मामला उत्तर प्रदेश के शिक्षा महकमे में फैले कथित फर्जीवाड़े का एक प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है। मामले के विवरण पर नजर डालें तो याची सुभाष चंद्र त्यागी ने दावा किया था कि वह कॉलेज में एक अन्य शिक्षक के अवकाश पर जाने के कारण उत्पन्न हुई रिक्ति (Leave Vacancy) पर सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ था। शुरुआत में उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अंतरिम आदेश प्राप्त कर लिया और उसी अंतरिम आदेश की आड़ में वह वेतन का आहरण करता रहा। हालांकि, जब विभागीय स्तर पर अभिलेखों की गहनता से पड़ताल और जांच शुरू हुई, तो सच्चाई सामने आ गई।
जांच अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए रिकॉर्ड से यह बात स्पष्ट हुई कि जिस शिक्षक के कथित रूप से अवकाश पर जाने के आधार पर सुभाष चंद्र त्यागी की नियुक्ति का दावा किया जा रहा था, उस मूल शिक्षक का नाम वेतन अभिलेखों में कभी दर्ज ही नहीं था। इतना ही नहीं, संबंधित शिक्षक के छुट्टी पर जाने का कोई भी आवेदन या स्वीकृत रिकॉर्ड विद्यालय और विभागीय अभिलेखों में मौजूद नहीं था। इस विभागीय जांच के दौरान ही महकमे में 96 फर्जी नियुक्तियों का मामला भी उजागर हुआ था, जिन पर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की जा रही थी।
‘धोखाधड़ी और न्याय साथ नहीं चल सकते’: हाईकोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार के सिद्धांतों को किया स्पष्ट
अपीलकर्ता सुभाष चंद्र त्यागी ने एकल पीठ के आदेश के खिलाफ विशेष अपील दाखिल कर कोर्ट से राहत की गुहार लगाई थी। उसकी ओर से दलील दी गई थी कि उसने विद्यालय में अपनी सेवाएं दी हैं, इसलिए उसकी सेवा जारी रखी जानी चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की पीठ ने इन तर्कों को पूरी तरह से कानून की मूल भावना के विपरीत मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि विशेष अपील या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाला असाधारण न्यायिक अधिकार क्षेत्र उन व्यक्तियों के लिए कतई नहीं है जो खुद जालसाजी में शामिल रहे हों।
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि फर्जी तरीके से नियुक्त हुए व्यक्ति द्वारा की गई सेवा किसी भी प्रकार की कानूनी वैधता प्राप्त नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का खजाना सार्वजनिक धन से बनता है। इस खजाने का उपयोग केवल विधि द्वारा स्थापित पारदर्शी प्रक्रियाओं के तहत चयनित योग्य नागरिकों के लिए ही किया जा सकता है। फर्जी नियुक्तियों के माध्यम से इस धन का आहरण सार्वजनिक खजाने की सीधी क्षति है।
उत्तर प्रदेश में फर्जी शिक्षकों पर कसता कानूनी शिकंजा: सैलरी रिकवरी और अफसरों पर कार्रवाई का दौर
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में चल रही फर्जी नियुक्तियों की जांच प्रक्रिया को और अधिक बल प्रदान करता है। इससे पूर्व भी हाईकोर्ट ने राज्य के बेसिक शिक्षा विभाग को निर्देश जारी किए हैं कि जाली सर्टिफिकेट या अधिकारियों की मिलीभगत से नौकरी पाने वाले सभी शिक्षकों की व्यापक जांच की जाए। अदालत ने न केवल ऐसी अवैध नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश दिया है, बल्कि फर्जीवाड़े के जरिए प्राप्त की गई पूरी सैलरी की शत-प्रतिशत रिकवरी करने के भी कड़े निर्देश जारी किए हैं।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उन दोषी प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई करने को कहा है जिनकी अनदेखी या संलिप्तता के कारण ये फर्जी नियुक्तियां हुईं। शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी हथियाने वालों को सेवा से बाहर करना और सरकारी धन की वसूली करना आवश्यक माना गया है। बागपत के इस मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी से प्रदेश भर में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हथियाने वाले सिंडिकेट और बिचौलियों के खिलाफ कानूनी शिकंजा और कस गया है।
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