
राजस्थान हाई कोर्ट ने पड़ोसी मुल्कों से अपनी जान और धर्म बचाकर भारत आए हजारों शरणार्थी परिवारों के हित में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित नगर विकास प्राधिकरणों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर राजस्थान के विभिन्न जिलों में शरण लिए हुए विस्थापितों को रियायती दरों पर आवासीय भूखंड उपलब्ध कराए जाएं। अदालत के इस बड़े फैसले से वर्षों से अस्थाई और अभावग्रस्त बस्तियों में बुनियादी सुविधाओं के बिना जीवन यापन कर रहे हजारों हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक शरणार्थी परिवारों में अपने स्थाई घर का सपना पूरा होने की नई उम्मीद जगी है।
जोधपुर स्थित राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने विस्थापित हिंदू पुनर्वास समिति की ओर से दायर महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह जनहितैषी निर्देश पारित किया है। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न, मानवाधिकार हनन और विषम सामाजिक परिस्थितियों के कारण बेघर होकर आए ये परिवार लंबे समय से पुनर्वास और सम्मानजनक आशियाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। खंडपीठ ने राज्य सरकार के सक्षम विभागों और संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे आवश्यक प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरियां लेकर इन निर्देशों को आगामी चार सप्ताह के भीतर प्रभावी ढंग से लागू करना सुनिश्चित करें, ताकि पात्र शरणार्थी परिवारों को समयबद्ध तरीके से राहत मिल सके।
राजस्थान में सीमावर्ती क्षेत्रों के कारण सबसे अधिक विस्थापित आबादी जोधपुर जिले में निवास करती है, जिसे ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने जोधपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और नगर निगम को विशेष कदम उठाने को कहा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष पुरजोर मांग रखी थी कि जोधपुर विकास प्राधिकरण की प्रमुख विनोबा भावे नगर योजना के तहत इन शरणार्थी परिवारों को रियायती दरों पर रिहायशी प्लॉट आवंटित किए जाएं। याचिका में इस बात को भी प्रमुखता से उठाया गया कि शरणार्थी परिवारों की आर्थिक पृष्ठभूमि बेहद कमजोर और दिहाड़ी मजदूरी पर आधारित है, इसलिए वे एकमुश्त बड़ी रकम चुकाने में असमर्थ हैं। अदालत ने इस व्यावहारिक समस्या को स्वीकार करते हुए भूखंडों के आवंटन शुल्क का भुगतान आसान और सुविधाजनक किस्तों में करने की व्यवस्था बनाने पर जोर दिया है।
अदालत ने केवल आवास तक सीमित न रहकर इन परिवारों की अगली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी एक बेहद प्रगतिशील और मानवीय रुख अख्तियार किया है। खंडपीठ ने दो टूक शब्दों में निर्देश दिया कि विस्थापित परिवारों के मासूम बच्चों को केवल आधिकारिक पहचान पत्र या किसी दस्तावेज की अनुपलब्धता के आधार पर सरकारी स्कूलों में प्रवेश देने से कड़ा इनकार नहीं किया जा सकता। शिक्षा के मौलिक अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि दस्तावेज की तकनीकी औपचारिकताएं किसी भी बच्चे की बुनियादी शिक्षा में बाधा नहीं बननी चाहिए। यह निर्देश उन हजारों शरणार्थी बच्चों के लिए एक वरदान साबित होगा जो पहचान पत्र न होने के कारण औपचारिक स्कूली शिक्षा से बाहर रह जाते थे।
सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में राजस्थान के पश्चिमी सीमांत जिलों जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर और राजधानी जयपुर में करीब 30 हजार पाकिस्तानी विस्थापित परिवार रह रहे हैं। इसके साथ ही बांग्लादेश और अफगानिस्तान से संकट के समय शरण लेने पहुंचे विस्थापितों की संख्या भी एक हजार से अधिक दर्ज की गई है। दशकों से नागरिकता, पहचान और पक्के मकान की अनिश्चितता झेल रहे इन विस्थापितों के लिए राजस्थान हाई कोर्ट का यह ताजा आदेश पुनर्वास की दिशा में एक ठोस और निर्णायक कदम साबित होगा, जिससे सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक सुरक्षा और जीवन स्तर में बड़ा सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।
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