असम के रण में हेमंत सोरेन की एंट्री

गुवाहाटी/रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब पूरब की ओर रुख कर लिया है। असम में 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने राज्य के सियासी समीकरणों में हलचल पैदा कर दी है। तिनसुकिया की हालिया रैली में उमड़ी हजारों की भीड़ ने यह साफ कर दिया है कि सोरेन अब सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं रहना चाहते। उनकी नजरें असम के उस निर्णायक ‘आदिवासी और चाय बागान’ वोट बैंक पर हैं, जो दशकों से सत्ता की चाबी अपने पास रखता आया है।

तिनसुकिया की रैली और सोरेन का ‘सॉफ्ट पावर’ दांव

बीते 1 फरवरी को तिनसुकिया के बोरगोलाई में आयोजित 21वीं आदिवासी महासभा में हेमंत सोरेन ने करीब 30,000 लोगों को संबोधित किया। कहने को तो यह अखिल आदिवासी छात्र संघ (AASAA) का कार्यक्रम था, लेकिन सोरेन के भाषण ने इसे पूरी तरह राजनीतिक रंग दे दिया। सोरेन ने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा का वादा करते हुए कहा कि असम के आदिवासियों को भी झारखंड की तर्ज पर कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने सीधे तौर पर पहचान और अस्मिता की राजनीति को हवा देकर स्थानीय भावनाओं को छूने की कोशिश की है।

मजदूरी और अधिकारों का मुद्दा: सोरेन का सीधा प्रहार

हेमंत सोरेन ने चाय बागान श्रमिकों की दयनीय स्थिति को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। उन्होंने तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए कहा कि जहां अन्य राज्यों में चाय श्रमिक 400 से 500 रुपये प्रतिदिन कमा रहे हैं, वहीं असम में यह आंकड़ा महज 250 रुपये पर सिमटा हुआ है। सोरेन का यह बयान उन 35 से 40 विधानसभा सीटों पर बड़ा असर डाल सकता है, जहां चाय बागान मजदूर हार-जीत तय करते हैं। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया को चाय पिलाने वाला यह समुदाय आज भी सबसे ज्यादा शोषित है।

बंद कमरों की बैठकों ने बढ़ाई बेचैनी

जेएमएम की यह सक्रियता अचानक नहीं है। जनवरी के मध्य में झारखंड के मंत्री चमरा लिंडा और सांसद विजय हांसदा के नेतृत्व में एक टीम ने चुपचाप असम का दौरा किया था। दिलचस्प बात यह है कि इस टीम ने सार्वजनिक रैलियों के बजाय कांग्रेस, भाजपा और जय भारत पार्टी के स्थानीय आदिवासी नेताओं के साथ गोपनीय बैठकें कीं। सूत्रों की मानें तो जेएमएम 126 सदस्यीय विधानसभा में से लगभग 40 सीटों पर अपने पैर जमाने की रणनीति पर काम कर रही है।

कांग्रेस के लिए ‘खतरे की घंटी’?

सियासी जानकारों का मानना है कि हेमंत सोरेन की यह ‘एंट्री’ भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। असम का आदिवासी और चाय बागान मजदूर समुदाय पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वोट बैंक रहा है। अगर हेमंत सोरेन इस वोट बैंक में सेंधमारी करते हैं, तो वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है। सोरेन उन्हीं मुद्दों को उठा रहे हैं जिन पर कांग्रेस अब तक अपना हक जताती रही है, ऐसे में इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) के इन दो सहयोगियों के बीच असम में ‘दोस्ताना संघर्ष’ या सीधे टकराव की स्थिति बन सकती है।

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