
गर्मियों के मौसम में, तीखा-मसालेदार खाना खाने के बाद या भारी वर्कआउट के बाद प्यास लगना एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है। जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो दिमाग का हाइपोथैलेमस हिस्सा हमें प्यास का अहसास कराता है ताकि हम पानी पीकर हाइड्रेट हो सकें। लेकिन क्या आपके साथ ऐसा होता है कि आप एक के बाद एक गिलास पानी पीते जा रहे हैं, फिर भी आपका गला सूखा हुआ महसूस होता है और प्यास बुझने का नाम नहीं लेती? यदि यह स्थिति लगातार कई दिनों तक बनी रहे, तो इसे केवल सामान्य डिहाइड्रेशन मानकर नजरअंदाज करना भारी भूल साबित हो सकता है। मेडिकल साइंस में लगातार और अत्यधिक प्यास लगने की इस स्थिति को ‘पॉलीडिप्सिया’ (Polydipsia) कहा जाता है, जो शरीर के भीतर पनप रही किसी गंभीर अंदरूनी बीमारी का शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकती है।
डायबिटीज (शुगर) का सबसे प्रमुख और शुरुआती लक्षण
लगातार प्यास लगने का सबसे आम और गंभीर कारण अनियंत्रित ब्लड शुगर यानी डायबिटीज मेलिटस (Diabetes Mellitus) होता है। जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, तो किडनी अतिरिक्त शुगर को फिल्टर करने और पेशाब के जरिए बाहर निकालने के लिए शरीर के टिश्यूज से अतिरिक्त पानी खींचने लगती है। इसके परिणामस्वरूप बार-बार पेशाब जाने (पॉलीयूरिया) की जरूरत पड़ती है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने लगती है और मरीज को लगातार अत्यधिक प्यास महसूस होती है। इसके अलावा ‘डायबिटीज इनसिपिडस’ (Diabetes Insipidus) नामक एक दुर्लभ स्थिति में भी एंटीडाययूरेटिक हार्मोन (ADH) के असंतुलन के कारण किडनी शरीर में पानी को रोक नहीं पाती और मरीज दिनभर में कई लीटर पानी पीने के बाद भी प्यासा महसूस करता है।
किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट और टॉक्सिन्स का जमाव
किडनी शरीर के तरल पदार्थों और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने का मुख्य कार्य करती है। जब किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती या क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) की शुरुआत होती है, तो वह मूत्र को सही तरीके से गाढ़ा (कंसंट्रेट) नहीं कर पाती। इसके कारण शरीर से जरूरी पानी तेजी से बाहर निकलने लगता है और इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम और पोटेशियम का संतुलन बिगड़ जाता है। इस असंतुलन की भरपाई के लिए दिमाग लगातार प्यास का सिग्नल भेजता रहता है।
ड्राई माउथ सिंड्रोम (ज़ेरोस्टोमिया) और लार ग्रंथियों की निष्क्रियता
कई बार प्यास केवल शरीर में पानी की कमी की वजह से नहीं, बल्कि मुंह में लार (Saliva) का निर्माण कम होने के कारण लगती है। इस मेडिकल कंडीशन को ‘ज़ेरोस्टोमिया’ (Xerostomia) कहा जाता है। लार ग्रंथियों के ठीक से काम न करने, अत्यधिक तनाव, तंबाकू या सिगरेट के सेवन, एंटीहिस्टामाइन व ब्लड प्रेशर की कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट अथवा ‘जोग्रेन सिंड्रोम’ (Sjogren’s Syndrome) जैसी ऑटोइम्यून बीमारी के कारण मुंह हर वक्त सूखा रहता है, जिसे लोग बार-बार पानी की प्यास समझ लेते हैं।
एनीमिया (खून की कमी) और अत्यधिक ब्लीडिंग
शरीर में हीमोग्लोबिन और रेड ब्लड सेल्स का स्तर काफी गिर जाने पर कोशिकाएं और अंग ऑक्सीजन की कमी से जूझने लगते हैं। इस कमी को पूरा करने और रक्त संचार की गति को बनाए रखने के लिए शरीर अधिक तरल पदार्थ की मांग करता है। गंभीर एनीमिया के मरीजों में सामान्य से अधिक प्यास लगना, सांस फूलना, चक्कर आना और अत्यधिक थकान होना बहुत आम लक्षण हैं।
थायरॉइड की खराबी और हाइपरकैल्सीमिया
अतिसक्रिय थायरॉइड ग्रंथि यानी ‘हाइपरथायरायडिज्म’ (Hyperthyroidism) में शरीर का मेटाबॉलिज्म बहुत तेज हो जाता है, जिससे पसीना अधिक निकलता है और शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, रक्त में कैल्शियम का स्तर सामान्य से अधिक बढ़ जाना (Hypercalcemia), जो अक्सर पैराथायरॉइड ग्रंथि की गड़बड़ी के कारण होता है, अत्यधिक प्यास और बार-बार पेशाब आने का एक बड़ा कारण बनता है।
डॉक्टर से जांच कब और क्यों करानी चाहिए?
यदि आपकी अत्यधिक प्यास 1 से 2 सप्ताह से अधिक समय तक लगातार बनी हुई है और साथ में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो तुरंत फिजिशियन से संपर्क करना चाहिए:
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बार-बार पेशाब आना, विशेष रूप से रात में कई बार उठना।
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बिना किसी ज्ञात कारण के वजन तेजी से कम होना।
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हर समय आंखों में धुंधलापन या अत्यधिक कमजोरी व थकान महसूस होना।
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मुंह, होंठ और त्वचा का अत्यधिक रूखा हो जाना।
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पर्याप्त पानी पीने के बावजूद चक्कर आना या सिर चकराना।
डॉक्टर आमतौर पर इस स्थिति की जड़ का पता लगाने के लिए फास्टिंग ब्लड शुगर, HbA1c (तीन महीने का शुगर टेस्ट), किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT), सीरम इलेक्ट्रोलाइट्स, यूरिन रूटीन और थायरॉइड प्रोफाइल (TSH) टेस्ट कराने की सलाह देते हैं।
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