वाशिंगटन/तिरुवनंतपुरम: केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल भारत, बल्कि सात समंदर पार अमेरिका में भी हलचल मचा दी है। 140 सीटों वाली विधानसभा में UDF की 102 सीटों पर प्रचंड जीत और वामपंथी गठबंधन (LDF) के महज 35 सीटों पर सिमटने के बाद, भारत के नक्शे से लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया है। इस ऐतिहासिक बदलाव पर अमेरिकी पॉलिसी एक्सपर्ट मार्क डबोविट्ज का एक तीखा बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
“भारतीय वोटर्स से सीखें अमेरिकी”: डबोविट्ज का कटाक्ष
अमेरिकी पॉलिसी एनालिस्ट और ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज’ (FDD) के सीईओ मार्क डबोविट्ज ने केरल के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी नागरिकों को ‘बेवकूफ’ तक कह डाला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा:
“भारत कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर फेंक रहा है, जबकि अमेरिका उन्हें अपने शहरों, राज्यों और कांग्रेस के सदस्यों के रूप में चुन रहा है। हां, हम इतने बेवकूफ हैं।”
डबोविट्ज का इशारा अमेरिका के कुछ शहरों और राजनीतिक हलकों में बढ़ते ‘वामपंथी रुझान’ की ओर था। उन्होंने भारतीय मतदाताओं की सराहना करते हुए कहा कि भारत ने उस विचारधारा को पूरी तरह नकार दिया है, जिसे अमेरिका के कुछ लोग अब अपना रहे हैं।
60 साल बाद लेफ्ट मुक्त हुआ भारत
केरल में लगभग छह दशकों से वामपंथी विचारधारा का दबदबा था। 2026 के इन चुनावी नतीजों के साथ ही भारत में एक युग का अंत हो गया है:
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सूपड़ा साफ: पश्चिम बंगाल (2011) और त्रिपुरा (2018) के बाद अब केरल भी वामपंथ के हाथ से निकल गया है।
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नया रिकॉर्ड: आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी दल की सरकार नहीं है।
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दिग्गजों की हार: मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली सरकार के कई कद्दावर मंत्रियों को इस चुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा।
क्यों ढहा वामपंथ का आखिरी किला?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, केरल में लेफ्ट के पतन के तीन मुख्य कारण रहे:
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विकास की नई चाहत: युवा पीढ़ी अब केवल सब्सिडी और सरकारी पेंशन के भरोसे नहीं रहना चाहती। उन्हें निजी निवेश, स्टार्टअप और नौकरियों के बेहतर अवसर चाहिए।
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आर्थिक संकट: राज्य पर बढ़ता कर्ज और विकास परियोजनाओं की धीमी रफ्तार ने जनता में असंतोष पैदा किया।
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विकल्प की मजबूती: कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने इस बार विकास और बदलाव के मुद्दे पर जनता का भरोसा जीतने में कामयाबी हासिल की।
केरल के इन नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीति अब वैचारिक तुष्टिकरण के बजाय ‘परफॉरमेंस’ और ‘ग्रोथ’ की दिशा में मुड़ चुकी है।
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