ढाका/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक नतीजों के बाद पड़ोसी देश बांग्लादेश ने तीस्ता नदी जल विवाद को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक दांव चल दिया है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका देश तीस्ता परियोजना के लिए अब और अधिक समय तक भारत के फैसले का इंतजार नहीं कर सकता। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए बांग्लादेश अब चीन की ओर रुख कर रहा है।
चीन दौरे पर तीस्ता प्रोजेक्ट सबसे ऊपर
बांग्लादेशी विदेश मंत्री खलीलुर रहमान जल्द ही तीन दिवसीय बीजिंग यात्रा पर जा रहे हैं, जहाँ वे चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात करेंगे। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा:
“तीस्ता समझौता हमारे देश के लिए अत्यंत आवश्यक है। हम हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकते। चीन दौरे के एजेंडे में तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना (TRMRP) मुख्य रूप से शामिल होगी।”
बंगाल में भाजपा की जीत और बांग्लादेश की चिंता
पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन को लेकर जब रहमान से सवाल किया गया, तो उन्होंने कूटनीतिक सधी हुई प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में नई सरकार की सोच और उनकी कार्ययोजना को पढ़ना उनका काम नहीं है, लेकिन बांग्लादेश को अपने राष्ट्रीय हितों के लिए कदम उठाने होंगे।
विवाद की जड़ क्या है?
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पानी का बंटवारा: बांग्लादेश तीस्ता नदी के पानी में बराबर की हिस्सेदारी मांगता रहा है।
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बंगाल का विरोध: पूर्व की सरकारों की तरह ही पश्चिम बंगाल का स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व पानी साझा करने के प्रस्ताव का विरोध करता रहा है, जिसका तर्क है कि इससे उत्तरी बंगाल के जिलों में सिंचाई और पीने के पानी की किल्लत हो जाएगी।
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अटका हुआ समझौता: 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे के समय समझौता लगभग तय था (37.5% बांग्लादेश और 42.5% भारत), लेकिन अंतिम समय में बंगाल के विरोध के कारण यह टल गया था।
चीन की एंट्री और भारत के लिए रणनीतिक चुनौती
भारत और बांग्लादेश के बीच 54 नदियां साझा होती हैं, लेकिन अब तक केवल गंगा और कुशियारा पर ही आधिकारिक समझौता हुआ है। तीस्ता परियोजना में चीन की भागीदारी भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील हो सकती है।
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चीनी निवेश: बांग्लादेश न केवल तकनीक बल्कि इस प्रोजेक्ट के लिए चीन से कम ब्याज दर पर कर्ज और निवेश भी चाह रहा है।
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रणनीतिक साझेदारी: चीन ने भी बांग्लादेश को अपना “रणनीतिक साझेदार” बताते हुए इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की इच्छा जताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का यह कदम भारत पर दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली और कोलकाता के बीच इस मुद्दे पर क्या तालमेल बैठता है और भारत अपने इस करीबी पड़ोसी को चीन के पाले में जाने से कैसे रोकता है।
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