Galwan संघर्ष के साये में चीन का ‘गुप्त’ परमाणु धमाका? अमेरिका के सनसनीखेज दावे से दुनिया में हड़कंप

नई दिल्ली/जिनेवा: साल 2020 में जब दुनिया कोरोना महामारी से जंग लड़ रही थी और भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी (Galwan Valley) में हालात बेहद तनावपूर्ण थे, क्या उस वक्त बीजिंग ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया था? अमेरिका के एक ताजा और बेहद चौंकाने वाले दावे ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। वाशिंगटन का आरोप है कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय निगरानी को धता बताते हुए एक ऐसा परमाणु परीक्षण किया, जिसका पता लगाना बेहद मुश्किल था।

गलवान झड़प के ठीक 7 दिन बाद हुआ ‘सीक्रेट’ परीक्षण!

अमेरिकी विदेश विभाग के अंडर सेक्रेटरी थॉमस डीनैनो ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण सम्मेलन के दौरान यह विस्फोटक जानकारी साझा की। उन्होंने सोशल मीडिया (X) पर दावा किया कि अमेरिका के पास पुख्ता खुफिया जानकारी है कि चीन ने 22 जून 2020 को एक गुप्त परमाणु परीक्षण किया था।

याद दिला दें कि यह तारीख 15 जून 2020 की उस हिंसक झड़प के ठीक सात दिन बाद की है, जिसमें भारत के 20 जांबाज सैनिक शहीद हुए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि जब पूरी दुनिया का ध्यान एलएसी (LAC) पर केंद्रित था, तब चीन ने इस मौके का फायदा उठाकर अपनी परमाणु शक्ति को परखा।

क्या है ‘डी-कपलिंग’ तकनीक, जिससे दुनिया को रखा अंधेरे में?

अमेरिकी रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस परीक्षण के लिए ‘डी-कपलिंग’ (Decoupling) नामक अत्याधुनिक और शातिर तकनीक का इस्तेमाल किया।

ट्रंप प्रशासन की रणनीति और रूस के साथ जुड़ाव

यह आरोप ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस के साथ होने वाले किसी भी नए परमाणु हथियार समझौते में चीन को भी शामिल करने पर अड़े हैं। अमेरिका का कहना है कि चीन के पास वर्तमान में लगभग 600 परमाणु हथियार हैं और वह तेजी से अपनी ताकत बढ़ा रहा है। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि चीन और पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका को अपनी परमाणु नीति पर पुनर्विचार करना होगा।

चीन और CTBT का खंडन: “बेबुनियाद हैं आरोप”

चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अमेरिका का प्रोपेगेंडा करार दिया है। चीन के राजदूत शेन जियान ने कहा कि अमेरिका ‘चीनी खतरे’ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। वहीं, व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO) ने भी बयान जारी कर कहा है कि उनके सिस्टम में उस दौरान चीन में किसी संदिग्ध परमाणु गतिविधि के संकेत नहीं मिले हैं।

भले ही चीन आरोपों को नकार रहा हो, लेकिन परीक्षण की टाइमिंग और तकनीक को लेकर उठे सवालों ने दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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